नोखा में लाल झंडे की अनहोनी

नोखा में लाल झंडे की अनहोनी

(चुनावी भुवन, मार्कण्डेय-सूत्र और वामपंथी शुद्धतावाद)

अरुण माहेश्वरी

राजस्थान में हाल में हुए नगर निकायों के चुनावों में बीकानेर जिले की नोखा नगरपालिका का परिणाम हमें किसी साधारण चुनावी उलटफेर से कहीं अधिक दिलचस्प और मानीखेज भी लगता है। नगरपालिका के कुल 45 वार्डों में से सीपीआई(एम) के चुनाव-चिह्न पर लड़े उम्मीदवारों ने 29 सीटें जीत लीं। भाजपा को 13 और निर्दलियों को तीन सीटें मिलीं; कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल सकी। जाहिर है कि बहुमत के लिए केवल 23 सदस्य चाहिए थे, इसलिये वहां सीपीआई(एम) के नाम पर नगरपालिका का बोर्ड बनना निश्चित है। राजस्थान में किसी कम्युनिस्ट पार्टी का किसी शहरी निकाय में इस प्रकार स्पष्ट बहुमत पाना अपने-आप में एक ऐतिहासिक, बल्कि किसी को भी अनहोनी सी घटना लग सकती है।

लेकिन जब हम इस चुनाव परिणाम की गहराई में पैठते हैं तो पहली नजर में ही पाते हैं कि इस जीत की असली कहानी सीपीआई(एम) के आकस्मिक वैचारिक-सांगठनिक विस्तार की कहानी नहीं है। यह वास्तविकता में तो नोखा में पहले से स्थापित एक स्थानीय राजनीतिक मंच, ‘नोखा विकास मंच’, और उसके नेता कन्हैयालाल झंवर की चुनावी शक्ति की कहानी है।

कन्हैयालाल झंवर नोखा के एक पुराने और प्रभावशाली स्थानीय नेता हैं। वे 2008 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नोखा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जा चुके हैं और राजस्थान सरकार में संसदीय सचिव भी रहे हैं। उनका ‘विकास मंच’ सालों से नोखा की स्थानीय राजनीति में सक्रिय है। उनका बेटा नारायण झंवर तीन बार नगरपालिका अध्यक्ष रह चुका बताया जाता है। इस प्रकार, यहां पहले ही एक प्रकार का संगठन खड़ा हुआ, जनाधार तैयार हुआ और उम्मीदवारों का स्थानीय समूह बना और ऐन चुनाव के पहले सिर्फ इन सब पर सीपीआई(एम) का चुनाव-चिह्न, अर्थात् उसकी छाप लग गई ।

इस खबर पर स्थानीय अखबारों की भाषा भी इस बात की पुष्टि करती है । राष्ट्रीय अखबार तो इस चुनाव परिणाम को सीधे “सीपीआई(एम) की ऐतिहासिक विजय” कहते हैं, लेकिन नोखा और बीकानेर की स्थानीय रिपोर्टों में इसे हर जगह “सीपीआई(एम)/विकास मंच” की जीत बताया जा रहा हैं। चुनाव के पहले की एक स्थानीय रिपोर्ट में भी साफ कहा गया था कि विकास मंच की कमान “पिता-पुत्र” के हाथों में है। नवभारत टाइम्स और ओम एक्सप्रेस जैसे अखबारों की रिपोर्टों में इस फर्क को साफ देखा जा सकता है । इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले चुनाव में विकास मंच ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चुनाव-चिह्न पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, वहीं इस बार वही स्थानीय ढांचा सीपीआई(एम) के चिह्न पर मैदान में आया।

इस प्रकार, यदि एक पंक्ति में कहें तो कह सकते हैं कि सीपीआई(एम) ने नोखा को नहीं जीता, कन्हैयालाल झंवर के विकास मंच ने सीपीआई(एम) का चुनाव-चिह्न लेकर नोखा जीता। फिर भी कानून की भाषा में अब सभी 29 विजयी उम्मीदवार सीपीआई(एम) के पार्षद कहलाएँगे और बोर्ड सीपीआई(एम) का माना जाएगा।

हमारी नजर में, चुनावी राजनीति में नाम, चिह्न, संगठन और वास्तविक जनाधार के बीच का यह विच्छेद ही नोखा के इस अनोखे से लग रहे प्रयोग को काफी अर्थपूर्ण बना देता है।

‘मार्कण्डेय’ सूत्र

हम यहां जिस सूत्र की बात कर रहे हैं, यह मार्कण्डेय पुराण के ऋषि मार्कण्डेय का सूत्र नहीं है । नोखा की घटना ने हमें अपने वरिष्ठ मित्र, दिवंगत कथाकार मार्कण्डेय भाई की वर्षों पहले कही गई एक पते की बात की याद दिला दी है। इलाहाबाद में एक बार चर्चा के बीच उन्होंने कहा था कि अगर मुझे जिम्मा दे दिया जाए, तो मैं पलक झपकते पूरे उत्तर प्रदेश में सीपीएम के झंडे लहरवा दूंगा । उनका फ़ॉर्मूला बहुत सीधा था : प्रत्येक गाँव, कस्बे, जिले और विधानसभा क्षेत्र में उन प्रभावशाली और महत्वाकांक्षी लोगों की सूची बनाइए जिन्हें कांग्रेस, भाजपा या दूसरी बड़ी पार्टियां उनके जनाधार के अनुरूप टिकट अथवा स्थान नहीं देती हैं। उनकी बाकी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को फिलहाल ताक पर रखकर सिर्फ उन्हें सीपीएम का चुनाव-चिह्न सौंप दो। देखते-देखते उत्तर प्रदेश के हर हिस्से में लाल झंडे थामे लोग घूमते हुए दिखाई देने लगेंगे।

सवाल है कि क्या नोखा में लगभग इसी प्रकार के एक फ़ॉर्मूले का प्रत्यक्ष प्रयोग नहीं हुआ है? जिस शहर में सीपीआई(एम) का कोई उल्लेखनीय कार्यालय अथवा सांगठनिक ढाँचा नहीं था, वहाँ आज उसके नाम का बोर्ड बनने जा रहा है। यह इसलिये संभव हुआ है क्योंकि पार्टी ने किसी स्थानीय प्रभावशाली शक्ति को अपने अनुशासन में ढालने से पहले ही उसे अपना चिह्न उपलब्ध करा दिया। एक स्थानीय नेता को एक मान्यताप्राप्त दल का चुनाव-चिह्न मिल गया और दल को रातोंरात 29 पार्षदों का एक पूरा स्थानीय आधार।

यदि भारत में चल रहे चुनावी कारोबार की गहराई से पड़ताल करें तो पाएंगे कि सीपीआई(एम) की इस उपलब्धि में बहुत अधिक आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं देखी जानी चाहिए । कांग्रेस और भाजपा तो दशकों से यही करती रही हैं। आम आदमी पार्टी सहित नए दलों ने भी दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट, किंतु प्रभावशाली नेताओं को अपने चिह्न पर चुनाव लड़ाकर कई इलाकों में रातोंरात अपना विस्तार किया है। प्रायः सभी चुनाव-केंद्रित दल पहले विचारधारा को नहीं, उपलब्ध जनाधार देखते हैं। वे मानते हैं कि संगठन केवल कार्यालय, सदस्यता सूची और पार्टी-कक्षाओं से नहीं बनता; स्थानीय समाज में पहले से उपस्थित रिश्तों, जातीय समीकरणों, प्रतिष्ठा, संसाधनों और नेतृत्व की आकांक्षाओं को अपने भीतर समेटने से भी बना करता है।

वामपंथी पार्टियाँ अधिकांशतः ऐसे उपायों से इस बिनाह पर बचती रही हैं कि इसमें पार्टी की वैचारिक पहचान और सांगठनिक अनुशासन के कमजोर होने का खतरा रहता है। वे उपलब्ध जनाधार को अपने भीतर शामिल करने के बजाय पहले उसे विचारधारा और संगठन के साँचे में ढालना चाहती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जब तक संगठन विचारधारा की शुद्ध शर्तों पर तैयार होता है, चुनाव का समय और राजनीतिक अवसर दोनों हाथ से निकल चुके होते हैं।

चुनावी भुवन और उसका दबाव

यहां हमें हमारे समय के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू की बात याद आती है जिनकी स्थापनाओं पर अभी हम काम कर रहे हैं । वे फ्रांस में सन् ’68 के छात्रों के कैंपस विद्रोह की विफलता के बाद की अजीबो-गरीब उलझी हुइ बौद्धिक परिस्थिति का चित्र खींचते हुए लिखते हैं कि “ वह अजीब सी विरोधाभासी परिस्थिति थी। जनमत पर चुनावी, भ्रष्ट प्रतिनिधित्व के ‘लोकतंत्र’ का बोलबाला था, तो ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ सिमटकर व्यापार और उपभोग की स्वतंत्रता रह गया था। … बाजारवाद और संसदवाद का यह गठबंधन, जिसे मैं ‘पूंजी-संसदवाद’ (capitalo-parliamentarism) कहता हूँ, इस प्रकार काम कर रहा था मानो पूरे विश्व के लिए यही एकमात्र विकल्प बचा हो।”(Being and Event, Bloomsbury, Author’s Preface, p. xiv-xv)

संसदीय लोकतंत्र अर्थात् पूँजी-संसदीय व्यवस्था—capitalo-parliamentarism। बाद्यू के अनुसार, चुनाव नागरिकों को सत्य-प्रक्रिया (truth-procedure) के प्रमाता में नहीं, मतों की गणना में बदल देता है। अलग-अलग राजनीतिक संभावनाएँ अंततः संख्याओं, सर्वेक्षणों, जनमत और राज-सत्ता के प्रबंधन के भीतर समा जाती हैं। इस व्यवस्था का मूल सिद्धांत होता है, जो दिखाई दे रहा है और जितने लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है, वही राजनीतिक रूप से अस्तित्ववान है।

इसीलिये, बाद्यू की राजनीति की अवधारणा इस परिघटना के विपरीत किसी घटना (event) से उत्पन्न नई संभावना के प्रति निष्ठा पर आधारित है। ऐसी राजनीति राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त स्थानों, मतों और प्रतिनिधित्व की गणना से अपनी सत्यता प्राप्त नहीं करती। उसका प्रमाता चुनावी बहुमत का प्रतिनिधि मात्र नहीं होता; वह उस संभावना का धारक होता है जिसे मौजूदा व्यवस्था पहले असंभव बताती थी। वह वर्तमान में मानो किसी अघटन के अंदर से, अनायास ही पैदा हुए तूफानी घटनाक्रमों से पैदा होती है । कहना न होगा, यहीं पर बाद्यू का वह कथित ‘शुद्धतावाद’ भी नजर आता है जिसमें माना जाता है कि राजनीति को राज्य और चुनाव से एक दूरी बनाए रखनी चाहिए।

हमारे सामने बाद्यू की इस दृष्टि की शक्ति स्पष्ट है। यह हमें इस बात के प्रति सावधान करती है कि चुनाव जीतना किसी सत्य का प्रमाण नहीं है। नोखा के 29 पार्षदों का सीपीआई(एम) के चिह्न पर जीतना अपने-आप में उन्हें कम्युनिस्ट नहीं बना देता। किसी स्थानीय प्रभुत्वशाली समूह को लाल झंडा सौंप देने से वर्ग-संघर्ष, समानता और सामाजिक मुक्ति की सत्य-प्रक्रिया पैदा नहीं हो जाती। उलटे, संभव है कि पार्टी का नाम स्थानीय निहितस्वार्थों के उन्हीं हितों का आवरण बन जाए जिन्हें बदलने के लिए कम्युनिस्ट राजनीति का जन्म हुआ था।

लेकिन बाद्यू के शुद्धतावाद की सीमा भी यहीं पर प्रकट होती है। चुनाव को केवल भ्रष्ट गणना कहकर उससे बाहर खड़े रहने पर राजनीति शुद्ध तो रह सकती है, लेकिन प्रभावी नहीं। जिस भुवन में सत्ता, संसाधन और जन-स्वीकृति चुनावों के माध्यम से हासिल होते हैं, उस भुवन में प्रवेश किए बिना उसके भीतर राजनीति की कोई नई सत्य-प्रक्रिया कैसे पैदा होगी?

सत्य भुवन से बाहर किसी निष्कलंक आकाश में निवास नहीं करता। वह इसी भुवन में मौजूद किसी दरार, असंगति अथवा उन संभावनाओं से पैदा होता है जिन्हें अब तक खंगाला नहीं गया है। यदि संसदीय जनतंत्र हमारा वास्तविक राजनीतिक भुवन है, तो लोकप्रियता, चुनाव-चिह्न, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय नेतृत्व उसके अपने अस्तित्व के नियम हैं। इन नियमों को आत्मसात करना सत्य से विश्वासघात नहीं; इस संसार में सत्य के प्रकट होने की शर्तों को समझना है।

चुनाव चिह्न ही सब कुछ नहीं है

इसलिए हमें लगता है कि नोखा का प्रयोग न तो बिना शर्त अनुकरणीय है और न केवल अवसरवाद कहकर खारिज करने योग्य। असली प्रश्न यह नहीं है कि विकास मंच के लोगों को सीपीआई(एम) का चिह्न क्यों दिया गया। असल प्रश्न यह है कि अब सीपीआई(एम) इस विजय के साथ क्या करती है।

क्या पार्टी विजयी पार्षदों की स्थानीय लोकप्रियता को समानता, पारदर्शिता और जनभागीदारी की किसी नई नगरपालिका राजनीति में बदल पाएगी? क्या नगरपालिका के साधनों का न्यायपूर्ण वितरण होगा? क्या सफाईकर्मियों, असंगठित मजदूरों, महिलाओं, दलितों और गरीब बस्तियों को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक स्थान मिलेगा? क्या नगरपालिका के ठेकों, जमीन और निर्माण से जुड़ी पुरानी निहित स्वार्थों पर टिकी स्थानीय संरचनाओं को चुनौती दी जाएगी? अथवा सीपीआई(एम) का चिह्न केवल विकास मंच के पुराने सत्ता-संबंधों की नई वैधानिक पोशाक बनकर रह जाएगा?

सीपीआई(एम) के सांसद अमरा राम ने इस चुनाव के बारे में कहा है कि नोखा को निष्पक्ष शासन और संसाधनों के समान वितरण का नमूना बनाया जाएगा। कहना न होगा, यही इस पूरे प्रयोग की वास्तविक परीक्षा की कसौटी है। अभी पार्टी ने सत्य पैदा नहीं किया है; उसने केवल उस स्थल पर प्रवेश पाया है जहाँ सत्य-प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

हमारे मार्कण्डेय भाई वाला फ़ॉर्मूला पार्टी को तेजी से फैला सकता है, पर वह अपने-आप कम्युनिस्ट राजनीति नहीं पैदा करता। वह दरवाजा खोलता है, उस दरवाजे से भीतर प्रवेश करके परिस्थिति को बदलना पार्टी का काम है। स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति को पार्टी का चिह्न देना पहला कदम हो सकता है, लेकिन यदि अंततः वही व्यक्ति पार्टी को अपना स्थानीय चिह्न बना ले, तो प्रयोग उलटी दिशा में चला जाएगा।

तीसरा रास्ता क्या है?

संसदीय लोकतंत्र में पहली दृष्टि में तो हमें दो ही विकल्प दिखाई देते हैं—या तो संसदीय जनतंत्र में लोकप्रियता के नियम को अपना लीजिए, या क्रांतिकारी प्रतिबद्धता के नाम पर उसमें रहते हुए भी उससे अलग बने रहिए। लेकिन नोखा से हमें तीसरे रास्ते की संभावना भी दिखाई देती है : चुनावी भुवन में प्रवेश करना, उसकी उपलब्ध शक्तियों का उपयोग करना, और प्रवेश के बाद उन्हीं शक्तियों को किसी नई राजनीतिक प्रक्रिया में रूपांतरित करने का संघर्ष करना। यही तो क्रांतिकारी राजनीति में संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति का मूलमंत्र है ।

एकता और संघर्ष का यह रास्ता शुद्धतावादी दूरी और निरंकुश अवसरवाद के बीच का रास्ता है। इसमें पार्टी अपना चिह्न किसी को सौंपकर निष्क्रिय नहीं हो जाती; वह उस चिह्न से निर्वाचित समूह को एक नई सामूहिक राजनीति में पुनर्गठित करती है। पार्टी लोकप्रियता को स्वीकारती है, लेकिन लोकप्रियता को ही सत्य नहीं मानती। वह चुनाव जीतती है, पर चुनावी जीत को सत्य-प्रक्रिया का अंत नहीं, उसका संभावित आरंभ मानती है। राजनीति में सक्रिय ऐसा कौन होगा जो चुनावों में उम्मीदवारों की शुद्ध लोकप्रियता और विपुल संसाधनों के आधार पर उनकी जीत के उदाहरणों को न देख चुका होगा!

नोखा में अभी लाल झंडा जरूर लहराया है, किंतु यह तय होना बाकी है कि विकास मंच सीपीआई(एम) में शामिल हुआ है या सीपीआई(एम) विकास मंच में। इस प्रश्न का उत्तर चुनाव-परिणाम से नहीं, आने वाले नगरपालिका शासन के चरित्र से मिलेगा।

फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नोखा ने वामपंथ के सामने एक असुविधाजनक, किंतु जरूरी प्रश्न रख दिया है—क्या सांगठनिक शुद्धता के नाम पर लोकप्रियता से दूरी बनाए रखना वास्तव में सिद्धांतनिष्ठता है, अथवा संसदीय राजनीति में अपनी असमर्थता को किसी सद्गुण के रूप में पेश करने का शुद्ध नैतिक आवरण? सत्य के प्रति निष्ठा यदि संसार में कोई प्रभाव ही उत्पन्न नहीं करें, तो वह धीरे-धीरे निष्ठा नहीं, आत्म-संतोष या जिसे चीन में आक्यूवाद कहा जाता है कि भौतिक जगत में पराजय को आत्मिक जगत के समर में विजय मान कर जीने का राजनीति का तरीका बन जाता है।

अरुण माहेश्वरी के चतुर्दिक ब्लाग से साभार

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