मेहमान चले गए, दिल्ली फिर दिखाई देने लगी

कभी आदेश बाहर से आता था, अब कई बार भीतर से उठता है। कभी कोई सत्ता हमारी सीमाएँ तय करती थी, अब अनेक बार हमारी इच्छाएँ, भय और पूर्वाग्रह स्वयं हमारे चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हैं।

मेहमान चले गए, दिल्ली फिर दिखाई देने लगी

रत्ना भदौरिया

 

ब्रिक्स सम्मेलन खत्म हुआ और दिल्ली ने धीरे-धीरे अपनी चमक उतारनी शुरू कर दी। फूलों की कतारें सिमट गईं, सजी हुई सड़कें फिर अपनी धूल में लौट आईं और जिन चेहरों को कुछ दिनों के लिए पर्दों के पीछे कर दिया गया था, वे फिर शहर की तस्वीर में दिखाई देने लगे।

झुग्गियाँ फिर मुँह बाये खड़ी हैं।

फुटपाथ फिर किसी के घर हैं।

सड़क किनारे वही भूख है।

शिक्षा व्यवस्था फिर अपनी खामोशी में रो रही है और पेट पकड़े लोग फिर उसी शहर की सड़कों पर लौट आए हैं, जिसे कुछ दिन पहले दुनिया के सामने चमकता हुआ दिखाया गया था।

जब मैंने दिल्ली की उस असाधारण सजावट पर सवाल उठाया था तो कुछ लोगों ने कहा था—“मेहमाननवाज़ी के लिए दिल्ली को सजाया गया था।”

बिल्कुल, मेहमाननवाज़ी हमारी संस्कृति का हिस्सा है। मेहमान का सम्मान होना चाहिए। शहर सुंदर दिखे, साफ दिखे, व्यवस्थित दिखे—इसमें आपत्ति कैसी?

आपत्ति बस इतनी है कि जिस सुंदरता को कुछ दिनों के लिए पैदा किया जा सकता है, उसे स्थायी क्यों नहीं बनाया जा सकता?

अगर सड़कें कुछ दिनों में चमक सकती हैं तो वर्षों से कीचड़ में जीते लोग क्यों नहीं निकल सकते?

अगर व्यवस्था कुछ दिनों के लिए चुस्त हो सकती है तो आम दिनों में वह इतनी लाचार क्यों रहती है?

अगर दुनिया को दिखाने के लिए शहर का चेहरा बदला जा सकता है तो अपने नागरिकों के लिए उसकी तकदीर क्यों नहीं बदली जा सकती?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि विकास आखिर किसके लिए है?

क्या विकास वह है जो कैमरे में सुंदर दिखाई दे, या वह जो किसी गरीब के घर में चूल्हा जलाए?

क्या आधुनिक शहर का अर्थ चमकती सड़कें हैं, या ऐसा विद्यालय जहाँ किसी बच्चे को शिक्षा के लिए संघर्ष न करना पड़े?

क्या विश्वस्तरीय आयोजन की सफलता फूलों, रोशनी और साफ किए गए रास्तों से तय होगी, या उस नागरिक से जो रोज अपने जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए व्यवस्था के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है?

कुछ दिनों की सजावट ने दिल्ली को सुंदर नहीं बनाया था, उसने सिर्फ दिल्ली के उन हिस्सों को छिपा दिया था जिन्हें हम देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं।

और अब जब मेहमान लौट गए हैं, शहर फिर अपने आईने के सामने खड़ा है।

आईना झूठ नहीं बोलता।

उसमें चमकती इमारतों के साथ वे झुग्गियाँ भी हैं जिन्हें विकास की तस्वीर में जगह नहीं मिलती। उसमें बड़े-बड़े दावों के साथ वह बच्चा भी है जिसकी किताबें अभी अधूरी हैं। उसमें बढ़ते शहर के साथ वह परिवार भी है जिसके लिए दो वक्त की रोटी आज भी किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से बड़ी खबर है।

शायद एक दिन इन झुग्गियों के भी दिन फिरेंगे।

शायद एक दिन शिक्षा व्यवस्था को रोने के बजाय मुस्कुराने का अवसर मिलेगा।

शायद एक दिन सड़क पर निकला आदमी पेट नहीं, अपने अधिकार और अपने भविष्य की बात करेगा।

लेकिन वह दिन केवल सजावट से नहीं आएगा।

फूल कुछ दिनों तक शहर को सुंदर बना सकते हैं, व्यवस्था नहीं।

रोशनी कुछ रातों तक सड़कों को चमका सकती है, जीवन नहीं।

दिल्ली को मेहमानों के लिए सजाना अच्छी बात है, मगर उस दिल्ली को सजाना ज्यादा जरूरी है जिसमें हम रोज रहते हैं।

क्योंकि असली मेहमाननवाज़ी तब होगी, जब दुनिया से आए मेहमानों को दिखाने के लिए गरीबी को पर्दे के पीछे न करना पड़े—बल्कि गरीबी ही इतनी कम हो जाए कि पर्दे की जरूरत न रहे।

और तब दिल्ली केवल सम्मेलन के दिनों में नहीं, हर दिन खूबसूरत दिखाई देगी।

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