मुनेश त्यागी की कविता – हिंदी दिवस के मौके पर 

कविता

हिंदी दिवस के मौके पर

     मुनेश त्यागी

 

माना कि चमन को

ना गुलजार कर सके,

कुछ खार कम तो कर गए

गुजरे जिधर से हम।

 

हक की आवाज उठाई है

बिना खौफ-ओ-लिहाज,

अगर यह बगावत है

तो हमने बगावत की है।

 

वो अंधेरों की तिजारत कर रहे हैं तो करें,

तुम अंधेरी बस्तियों में रोशनी बांटा करो।

 

हर जोर जुल्म की टक्कर में

संघर्ष हमारा नारा है,

हम रुके नहीं हम झुके नहीं

कहता इतिहास हमारा है।

 

अंधेरा बनकर जीने से क्या फायदा,

उजाले बनाकर जिओ तो कोई बात बने।

अकेले अकेले लड़ने से नहीं मिलेगी मंजिल

साथ-साथ मिलकर चलो तो कोई बात बने।

 

वतन को कुछ नहीं खतरा

निजामे-जर है खतरे में,

हकीकत में जो रहजन है

वही रहबर है खतरे में।

 

इतनी सी बात पर ही

छीनी गई रहबरी अपनी,

कि हमसे काफिले

मंजिल पर लुटवाये नहीं जाते।

 

हम फानी नहीं हैं फनाह क्या करेंगे

हमें मारकर वो भला क्या करेंगे ??

हथेली पर जो सिर लिए फिर रहे हों

वो सिर उनका धड से जुड़ा क्या करेंगे?

 

इधर-उधर की बात ना कर

ये बता काफिले क्यों लूटें?

हमें रहजनों से गरज नहीं

तेरी रहबरी का सवाल है?

 

जात धर्म के झगड़े छोड़ो

समता ममता की बात करो,

बहुत रह लिए अलग-थलग

अब मिलकर चलने की बात करो।

 

इस अंधकार के मौसम में

हम चंदा तारे दिनमान बनें,

हिंसा नफरत के आलम में

हम होली और रमजान बनें।

 

नफस नफस, कदम कदम

हैं एक फिक्र दम ब दम,

घिरे हैं हम सवाल से

हमें जवाब चाहिए।

जवाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए

इंकलाब जिंदाबाद, जिंदाबाद इंकलाब।

 

माल-ओ-दौलत ही नहीं

लूट लिए हैं सपने भी,

ऐसे तो रहजन भी नहीं थे

जैसे ये रहबर निकले !!

 

हम मेहनतकश जग वालों से

जब अपना हिस्सा मांगेंगे,

एक खेत नहीं एक देश नहीं

हम सारी दुनिया मांगेंगे।

 

गंगा की कसम जमुना की कसम

यह ताना-बाना बदलेगा,

तू खुद तो बदल तू खुद तो बदल

बदलेगा जमाना बदलेगा।

रावी की रवानी बदलेगी

सतलज का मुहाना बदलेगा,

गर शौक में तेरे जोश रहा

यह जुल्मी जमाना बदलेगा।

 

जो औरतों का अपमान करें

वो तो नहीं हमारे भाई हैं,

बेटी बहूओं को मान मिले

अब यही हमारी लड़ाई है।

 

हम सुभाष और भगत के वारिस हैं

ना तो वो ही डरे थे, ना ही हम डरेंगे,

वो थे इंकलाबी, हम भी हैं इंकलाबी

हम सब हिंदुस्तानी, हम सब भारतवासी।

 

सारे ताने-बाने को बदलो

खुद भी बदलने की बात करो,

हारे थके आधे अधूरे नहीं

पूरे इंकलाब की बात करो।

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