डॉ रीटा अरोड़ा की लघु कथा – सिर्फ गलतियाँ नहीं

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघु कथा

सिर्फ गलतियाँ नहीं

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“शर्मा जी, आजकल बच्चे हमारी सुनते कहाँ हैं?”

“कह दो कुछ… तुरंत कहते हैं- ‘बस पापा, रहने दीजिए!’”

“सही बात है… हमारा मुँह ही बंद कर देते हैं।”

“तो करें क्या?”

“उनकी गलतियाँ बताना छोड़ दें?”

“नहीं… गलत को गलत तो बताना होगा।”

“बस यही तो हमसे चूक होती है।”

“कैसे?”

“हम कहते हैं- ‘यह मत करो, वह गलत है।’”

“फिर?”

“फिर… सही क्या करें, यह नहीं बताते।”

शर्मा जी चुप हो गए।

वर्मा जी बोले-

“बच्चों को रास्ते की गड्ढे तो दिखा देते हैं…”

“लेकिन रास्ता कैसे पार करना है?”

“वही तो!”

“हम कहते हैं- ‘गुस्सा मत करो।’”

“पर खुद?”

“खुद गुस्से में बोलते हैं।”

“कहते हैं- ‘रिश्तों में सम्मान रखो।’”

“और घर में?”

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

शर्मा जी धीरे से बोले-

“शायद बच्चे हमारी बातें नहीं… हमारा व्यवहार सीखते हैं।”

“बिल्कुल।”

“लेकिन हर बात मान लेना भी तो सही नहीं।”

“संस्कार का मतलब यही तो है- गलत को रोकना और सही का रास्ता दिखाना।”

“और संतुलन?”

“वह भी दिखाना पड़ेगा… समझाना नहीं।”

शर्मा जी मुस्कुराए-

“मतलब बच्चों को सिर्फ यह न बताएं कि क्या गलत है…”

वर्मा जी ने बात पूरी की-

“बल्कि अपने व्यवहार से यह भी दिखाएँ कि सही कैसे जिया जाता है।”

कुछ पल की चुप्पी के बाद शर्मा जी बोले-

“शायद संस्कार देने की सबसे बड़ी पाठशाला… हमारा अपना जीवन है।”

“और सबसे प्रभावी किताब?”

वर्मा जी मुस्कुराए-

“हमारा व्यवहार।”

~

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

इसे भी पढ़ें

डॉ. रीटा अरोड़ा की लघु कथा – रिश्तों की दिशा

Comments

Your email address will not be published.

0