इस्तीफे से आगे का अँधेरा

इस्तीफे से आगे का अँधेरा

रत्ना भदौरिया

आंदोलन हुए।
सड़कें भरीं। आवाजें उठीं। सत्ता के दरवाजे तक दस्तक पहुँची। इस्तीफे भी हुए। कुछ चेहरों को हटाकर यह आभास दिया गया कि व्यवस्था ने अपनी भूल स्वीकार कर ली है। लेकिन सत्ता से बाहर निकलते एक व्यक्ति की परछाईं से कहीं अधिक बड़ा सवाल उन घरों में पड़ा रह गया, जहाँ बच्चे आज भी महंगी फीस के कारण कॉलेज नहीं जा पा रहे हैं।
यहीं से असली प्रश्न शुरू होता है।
अगर आंदोलन के बाद भी शिक्षा गरीब की पहुँच से बाहर है, तो बदला क्या है?
किसी मंत्री का इस्तीफा खबर बन सकता है, इतिहास की एक पंक्ति बन सकता है, राजनीतिक जीत का प्रमाणपत्र बन सकता है; लेकिन उस बच्चे के लिए उसका अर्थ क्या है जिसकी फीस जमा नहीं हुई? उसके लिए सत्ता का चेहरा बदलने और न बदलने में कितना अंतर है?
वह बच्चा किसी विचारधारा का दोषी नहीं है।
उसने कोई अपराध नहीं किया।
उसकी गलती केवल इतनी है कि वह ऐसे घर में पैदा हुआ जहाँ महीने की आय और कॉलेज की फीस के बीच खाई है।
और यही खाई आज हमारी पूरी व्यवस्था का सबसे निर्मम आईना है।
हमने शिक्षा को अधिकार कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन धीरे-धीरे उसे ऐसी वस्तु में बदल दिया जिसके लिए पहले जेब की औकात पूछी जाती है। प्रतिभा दरवाजे पर खड़ी है और फीस भीतर बैठी हुई निर्णायक बनी हुई है।
यह केवल महंगाई नहीं है।
यह केवल फीस बढ़ने का प्रश्न नहीं है।
यह उस सामाजिक ढाँचे का प्रश्न है जिसमें अवसर समान होने का दावा किया जाता है, जबकि अवसर तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग बनाए जाते हैं।
यहीं सामंती मानसिकता अपना नया रूप धारण करती है।
अब जरूरी नहीं कि कोई सामंत किसी गरीब के दरवाजे पर खड़ा होकर कहे—“तुम्हें पढ़ने का अधिकार नहीं।”
अब व्यवस्था उससे अधिक सभ्य भाषा बोलती है।
वह कहती है—
दरवाजा खुला है,
कॉलेज खुला है,
प्रवेश खुला है,
बस फीस भर दो।
और गरीब बच्चा वहीं खड़ा रह जाता है।
दरवाजा खुला होने और रास्ता उपलब्ध होने में जो अंतर है, शायद वही हमारे समय की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना है।
फिर आंदोलन होते हैं।
नारे उठते हैं।
सत्ता पर प्रश्न खड़े होते हैं।
इस्तीफा आता है।
कुछ दिन बहस चलती है।
फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है।
सिर्फ उस घर में सामान्य कुछ नहीं होता जहाँ पिता बच्चे की फीस और घर के राशन के बीच चुनाव करता है।
माँ अपने बच्चे की किताबें समेटकर रख देती है—“अगले साल पढ़ लेना।”
अगला साल!
गरीबी के शब्दकोश में शायद सबसे भयावह शब्द यही है—अगला साल।
क्योंकि गरीब के बच्चे का भविष्य अक्सर इसी “अगले साल” में टलता रहता है, जब तक कि वह पढ़ाई की उम्र से निकलकर मजदूरी की उम्र में नहीं पहुँच जाता।
और तब व्यवस्था बड़ी सहजता से कहती है—
उसने पढ़ाई क्यों नहीं की?
कभी-कभी व्यवस्था अपराध करती है और फिर उसी अपराध का दोष पीड़ित के माथे पर लिख देती है।
हमने आंदोलनों को जीत मानना सीख लिया है, लेकिन यह पूछना भूल गए कि आंदोलन के बाद आम आदमी की जिंदगी में क्या बदला। हमने इस्तीफे को उत्तर मान लिया, जबकि वह केवल एक घटना है। उत्तर तो तब होगा जब किसी गरीब घर का बच्चा फीस के कारण शिक्षा से बाहर न हो।
सत्ता बदलने और व्यवस्था बदलने के बीच यही सबसे गहरी दूरी है।
चेहरे बदल सकते हैं।
कुर्सियाँ बदल सकती हैं।
बयान बदल सकते हैं।
नीतियों के नाम बदल सकते हैं।
लेकिन यदि शिक्षा अब भी धन की चौखट पर खड़ी है, यदि अवसर अब भी आर्थिक हैसियत से तय होते हैं, यदि गरीब की प्रतिभा अब भी फीस के सामने पराजित होती है—तो भीतर बैठी व्यवस्था अभी भी वही है।
फासीवादी और सामंती संरचनाएँ केवल डंडे से नहीं टिकतीं। वे असमानता को सामान्य बनाकर भी टिकती हैं। जब समाज यह मानने लगे कि महंगी शिक्षा स्वाभाविक है, बेरोजगारी स्वाभाविक है, गरीब का पीछे रह जाना स्वाभाविक है—तब दमन को किसी हथियार की आवश्यकता नहीं रहती।
सबसे खतरनाक शासन वह नहीं जो हर आवाज को दबा दे।
सबसे खतरनाक वह है जो धीरे-धीरे लोगों को यह विश्वास दिला दे कि उनकी आवाज से कुछ बदलता ही नहीं।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि कितने आंदोलन हुए।
सवाल यह है कि उन आंदोलनों ने उस बच्चे तक क्या पहुँचाया जो आज भी कॉलेज के बाहर खड़ा है?
कितने इस्तीफों के बाद उसकी फीस कम हुई?
कितने भाषणों के बाद उसके हाथ में किताब आई?
कितनी राजनीतिक जीतों के बाद उसके घर में यह भरोसा पैदा हुआ कि उसका भविष्य उसकी गरीबी से छोटा नहीं है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे पास नहीं हैं, तो हमें अपनी जीत का शोर थोड़ा कम करके उस बच्चे की चुप्पी सुननी चाहिए।
क्योंकि इतिहास केवल यह दर्ज नहीं करेगा कि किसने इस्तीफा दिया।
इतिहास यह भी पूछेगा—
उस समय जब एक पीढ़ी शिक्षा से बाहर की जा रही थी, तब हमने सत्ता के चेहरे गिने थे या व्यवस्था की दीवारें तोड़ी थीं?
और शायद सबसे कठोर प्रश्न यही रहेगा—
क्या सचमुच व्यवस्था पर असर पड़ा था,
या व्यवस्था ने केवल अपना चेहरा बदलकर हमें फिर से विश्वास दिला दिया कि बदलाव हो चुका है?

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