जसवीर त्यागी की पतंग की डोर और अन्य कविताएं
पतंग और डोर
मैं आत्मीयता के आसमान में
उड़ने वाली एक पतंग हूँ
जिसकी डोर हो तुम
और तुम ही
जिसका आसमान हो।
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सार्थकता
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फल की सार्थकता
सदा पेड़ पर लगे रहने में नहीं
उपयुक्त अवसर पर
पेड़ से टूट जाने में है
फल का पेड़ से अलग होना
पेड़ से दूरी नहीं है
फल की स्वाधीनता है
स्वाधीन होना
सार्थकता का प्रथम स्वप्न-सोपान है।
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रिश्ता
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पेड़ आसमान की ओर मुँह कर
ताकते रहते हैं
आसमान भी नीचे की ओर
टकटकी लगाए रहता है
पता नहीं
पेड़ और आसमान के बीच
क्या गुफ़्तगू चलती है?
जब भी
जानने की कोशिश करो
दोनों मौन होकर
बतियाने लगते हैं।
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|| पतंग ||
बिजली के ऊँचे तारों में
अटकी है एक पतंग
हवा चलती है
फड़फड़ाती है पतंग
बच्चे पतंग को देखते हैं
जो उनकी पहुँच से बहुत परे है
तारों में लटकी हुई पतंग उड़ती है
बच्चों के सपने में।
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खुशियों की खुशबू
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सुबह-सुबह
एक अनमोल दृश्य देखा
बारात सज रही थी
बारातियों के चेहरों पर
उमंग और उत्साह की लहरें उफान पर थीं
उनकी बातचीत के मैदान में
मस्ती भरे शब्द खेल रहे थे
रंग-बिरंगी पोशाकों की पतंग
उड़ रही थीं आत्मीयता के आसमान में
बहुत सारी ग्रामीण स्त्रियाँ
दूल्हे को घेरे कोई लोकगीत गा रही थीं
गीत के बोल
खुशियों की खुशबू से महक रहे थे
स्वर में मिश्री-सी मिठास थी
दूल्हे के चेहरे पर
ताजा खिले पुष्प-सी पवित्रता और चमक थी
दुनिया की तमाम अनमोल इच्छाओं में
किसी अपने को
दूल्हे रूप में देखना भी शुमार है
कभी-कभी कोई सुबह
मीठे दूधिया रसीले सिंघाड़े-सी होती है।
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