वरिष्ठ शायर एवं समर्थ साहित्यकार रमेश जोशी, चिड़ावा (झुंझुनू) राजस्थान के हैं। इन ग़ज़लों को 1995-2005 के दरमियां रचा/कहा गया है। यहां हमने उनके दीवान “बेगाने मौसम” से उद्धृत किया है। पाठक भी कृपया उस कालखंड को ध्यान में रखते हुए संदर्भों को देखने-समझने की कोशिश करें। संपादक
रमेश जोशी की पांच ग़ज़लें
1
अँधियारों के यार उजाले ।
हैं कितने मक्कार उजाले ।
बार बार आँखें चुँधिया कर
खो जाते हुशियार उजाले ।
चौबारों-छज्जों पर बैठे
करते हैं सिंगार उजाले ।
‘होरी’ की झुग्गी में झाँकें
इतने कहाँ उदार उजाले ।
कल थोड़ा सकुचा कर करते
काले कारोबार उजाले ।
बीच सड़क में लगा रहे हैं
आज ‘मुक्त बाज़ार’ उजाले ।
जो जलते हैं, वे पाते हैं
मिलते नहीं उधार उजाले ।
हम नादाँ थे तुमसे माँगे
ए मेरी सरकार! उजाले ।
2
अन्न बजे और अन्न बजावै ।
अन्न ही सारे नाच दिखावै ।
पलना-लोरी कहने भर को
अन्न ही सोवै, अन्न सुलावै ।
माया की बदनामी झूठी
अन्न ही दुनिया को भरमावै ।
कम्प्यूटर, टी.वी. दिखलाकर
काहे भूखों को भरमावै ।
अन्न मिले तो गाना सूझे
अन्न बिना कुछ भी ना भावै ।
अन्न बिना सब शोर-शराबा
अन्न-ब्रह्म ही अनहद गावै ।
3
आँधी और तूफ़ान आ गये ।
चिर-परिचित मेहमान आ गए ।
घुटन, अँधेरा, दर्द, उदासी
जीने के सामान आ गए ।
उनका नाम लिया तो हम पर
सब के सब इल्ज़ाम आ गए ।
उनके घर के हर रस्ते में
छोटे-बड़े मकान आ गए ।
दो गज़ का अरमान किया तो
कुर्की के फरमान आ गए ।
उन्हें मनाना आसाँ था पर
मन में गरब-गुमान आ गए।
4
आओ उसकी बात करें।
दिन-सी उजली रात करें।
हमसे तुमसे ही दुनिया
हमीं कहें औ’ हमीं सुने ।
जो सब की आँखों का हो
ऐसा कोई ख्वाब बुनें ।
एक ठिकाना ऐसा हो
जिसमें सारा जग रह ले ।
थोड़ी-सी तो उमर बची
जल्दी से सुनलें, कह लें ।
5
आजकल कर्फ्यू शहर में है।
लोग सहमे, डरे हर घर में हैं।
पाँव लटके कब्र में तो क्या
हाथ कुर्सी की कमर में हैं।
जहर-अमृत में नहीं कुछ फर्क
बात तो सारी असर में है।
देख लेना सत्य ही होंगे
ख्वाब जो मेरी नज़र में हैं।
रहनुमा का खौफ़ तबसे है
आदमी जबसे सफर में है।
मंजिलें मुश्किल बहुत,तो क्या
हौसला अब भी बशर में है।
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