चुप्पी का साहित्य
रत्ना भदौरिया
चुप्पी साधे बैठे साहित्यकारों और पत्रकारों से एक प्रश्न है—
विशेषतः उन साहित्यकारों से, जो बड़ी निश्चिंतता से यह कहते हैं कि साहित्य का राजनीति से कोई संबंध नहीं; साहित्य को राजनीति से दूर रहना चाहिए।
ठीक है—
साहित्य किसी राजनीतिक दल की पताका नहीं, किसी सत्ता का मुखपत्र नहीं, किसी विचारधारा का विज्ञापन भी नहीं।
लेकिन क्या साहित्य को अपने समय की राजनीतिक निर्ममता से भी अनभिज्ञ रहना चाहिए?
जब सत्ता की कठोरता नागरिक के अधिकारों पर अपना भारी हाथ रखती है,
जब असहमति की आवाज़ को सुनने के बजाय उसे दबाने की कोशिश होती है,
जब भ्रष्टाचार व्यवस्था के भीतर किसी अदृश्य फफूँद की तरह फैलता जाता है,
जब शोषण मनुष्य के श्रम से लेकर उसके स्वप्न तक को निगलता जाता है,
जब अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरे नौजवानों के प्रश्नों का उत्तर संवाद नहीं, लाठियों की भाषा में दिया जाता है—
तब साहित्यकार की संवेदना किस अँधेरे में चली जाती है?
क्या उसे केवल इतना दिखाई देता है कि मौसम बदल रहा है?
क्या उसे प्रेम की आँखों में उतरता हुआ चाँद दिखाई देता है,
लेकिन उस माँ की आँखों में जमा हुआ भय नहीं, जिसका बेटा अपने भविष्य की माँग लेकर सड़क पर खड़ा है?
क्या उसे नदी की कल-कल सुनाई देती है,
लेकिन उन सड़कों पर उठती हुई भीड़ की बेचैनी नहीं, जहाँ हजारों युवा अपने हिस्से का जीवन माँग रहे हैं?
क्या उसे टूटते हुए सितारे दिखाई देते हैं,
लेकिन टूटते हुए सपने नहीं?
यदि साहित्य मनुष्य के भीतर उतरने की कला है,
तो फिर मनुष्य के सार्वजनिक जीवन में घटती हुई पीड़ा उसके लिए इतनी दूर की चीज़ कैसे हो सकती है?
राजनीति से दूरी समझ में आती है,
अन्याय से दूरी कैसे समझी जाए?
साहित्य को सत्ता का विरोध करना आवश्यक नहीं,
पर क्या सत्ता के हाथों मनुष्य के अपमान को देखकर भी वह मौन रह सकता है?
क्या तटस्थता का अर्थ यह है कि
जिसके हाथ में शक्ति है और जिसके हाथ में केवल प्रश्न—
दोनों को समान दूरी से देखा जाए?
क्या एक ओर लाठी हो और दूसरी ओर खाली हाथ उठे हुए अधिकारों के प्रश्न,
तो साहित्य दोनों के बीच खड़ा होकर केवल इतना कह दे—
“मैं किसी पक्ष में नहीं हूँ”?
और यदि वह ऐसा करता है,
तो क्या वह वास्तव में निष्पक्ष है,
या केवल अपनी सुविधा की सुरक्षित दीवार के भीतर खड़ा है?
