जसवीर त्यागी की कविताएं- रंग स्वाधीनता चाहते हैं और बच्चों का सवाल
रंग स्वाधीनता चाहते हैं
रंग दूसरे रंगों से मिलना चाहते हैं
जीना चाहते हैं रंग
दूसरे रंगों के संग
रखना चाहते हैं मेल-मिलाप
नहीं खड़ा होना चाहते
किसी दूसरे रंग के खिलाफ
लेकिन,कुछ चतुर-चालाक सिरफिरे लोग
रंगों की वास्तविक रंगत को उतारकर
रंगना चाहते हैं उन्हें अपने ही रंग में
और बिठा देना चाहते हैं
रंगों की आज़ादी पर पहरा
जानकर अपने अस्तित्व का संकट
रंगों का उड़ने लगता है रंग
और किसी अनहोनी की आशंका से घिर जाने पर
लाल-पीले हो उठते हैं रंग
वे किसी की अधीनता नहीं चाहते
जीना चाहते हैं रंग
अपना सहज स्वाभाविक ढंग
जब प्रकृति ने ही उन्हें
दिया है अलग-अलग रंगों में जीवन
फिर क्यों एक ही रंग की
काल-कोठरी में हो जाएं कैद-दफन?
क्यों कुछ कुविचारी?
डालना चाहते हैं रंग में भंग
रंग जीना चाहते हैं बनकर रंगारंग
रंग नहीं चाहते होना बेरंग
नहीं चाहते दुनिया हो बदरंग
रंग अपनी ही दुनिया में रहना चाहते हैं
रंग भी स्वाधीनता से जीना चाहते हैं।
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बच्चों का सवाल
सुबह की सैर से घर की ओर लौटते हुए
राह में पाँच-छह साल के तीन बच्चे मिले
तीनों के साथ चार श्वान शिशु
सब बाल-क्रीड़ाओं में मग्न
मुझे नज़दीक आता देख
एक बच्चे ने कहा-
अंकल क्या आपने
इन पिल्लों की मम्मी को कहीं देखा है?
बच्चों का सवाल
गीली मुल्तानी मिट्टी-सा नरम था
मैंने कहा-बेटा मैंने तो देखा नहीं
अपनी निक्कर को
ऊपर की तरफ चढ़ाते हुए
दूसरा बच्चा बोला-
देखिये अंकल
इन पिल्लों की मम्मी
इन्हें अकेला छोड़कर कहीं चली गयी है
ये इतने छोटे बच्चे
अपनी मम्मी के बिन कैसे रहेंगे?
इन्हें मम्मी की याद आती होगी
बच्चों का सवाल
बच्चों की तरह सरल न था
वह हमारे समय का
एक बड़ा चुनौती भरा सवाल था
जो लोग बच्चों को
सिर्फ़ बच्चा समझते हैं
वे लोग जीवन को
कितना कम समझते हैं।
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