भारत में असहमति के लिए जगह कम हो रही
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइंया ने सख्त कार्रवाइयों पर उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने चेतावनी दी है कि भारत में असहमति या विरोध के लिए जगह कम हो रही है और विरोध करने वाले छात्रों को अक्सर गिरफ्तारी और जमानत न मिलने जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यहां नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल का चौथा लेक्चर देते हुए कहा कि दुर्भाग्य से, सामान्य गतिविधियों को भी अपराध माना जा रहा है।
अधिकारियों की जरूरत से ज्यादा सख्त कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए जज भुइयां ने गंगा में नाव पर इफ्तारी करने के लिए युवाओं की गिरफ्तारी का जिक्र किया। उन्होंने पूछा कि गंगा में चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। क्या ऐसी गतिविधि के लिए लोगों को गिरफ्तार किया जा सकता है और तीन महीने तक जमानत देने से इनकार किया जा सकता है?
जस्टिस उज्जल भुइयां ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं का भी जिक्र किया, जो पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता जताने के बावजूद अपराधियों की तरह खदेड़ दिए जाते हैं। उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया जिनमें कैंपस में गिरफ्तार छात्रों को जमानत मिलने से पहले 30-40 दिन तक जेल में रहना पड़ता है, उन्हें शिक्षण संस्थानों से सस्पेंड कर दिया जाता है और वे लंबी कानूनी लड़ाइयों में फंस जाते हैं।
उन्होंने जमानत की उन सख्त शर्तों की आलोचना की जिनसे लोग खुद पर पाबंदियां लगाने (सेल्फ-सेंसरशिप) लगते हैं। जस्टिस भुइयां ने ऐसे मामलों का जिक्र किया जिनमें आरोपियों के भागने का कोई खतरा न होने के बावजूद उन्हें पासपोर्ट जमा करने का आदेश दिया गया और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से रोका गया।
