जीवनसाथी पर अधिकार नहीं, विश्वास चाहिए
पति-पत्नी का रिश्ता अनुशासन का नहीं, समानता, सम्मान और संवाद का रिश्ता है
डॉ रीटा अरोड़ा
“तुम हर बात में बहस क्यों करती हो?”
पति की आवाज़ कुछ ऊँची थी।
पत्नी कुछ क्षण चुप रही। फिर धीमे से बोली, “मैं बहस नहीं कर रही… बस अपनी बात कह रही हूँ।”
पति ने बीच में ही कहा, “पहले मेरी सुन लो…”
पत्नी चुप हो गई।
बहस वहीं समाप्त हो गई, लेकिन संवाद भी वहीं रुक गया।
शायद यह दृश्य किसी एक घर का नहीं, हजारों परिवारों का है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर दो लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। रिश्ते टूटते एक दिन में नहीं, संवाद के धीरे-धीरे समाप्त होने से टूटने लगते हैं।
भारतीय परिवारों में पुरुष को बचपन से निर्णय लेने वाला, परिवार का संरक्षक और अनुशासन बनाए रखने वाला माना गया है। यह भूमिका आवश्यक भी है। किंतु समस्या तब आरम्भ होती है, जब वही व्यवहार वह अपने जीवनसाथी के साथ भी अपनाने लगता है।
व्यवहार विज्ञान कहता है कि प्रत्येक संबंध की अपनी अलग मनोवैज्ञानिक संरचना होती है।
पिता और पुत्र का संबंध मार्गदर्शन का संबंध है। वहाँ अनुभव, आयु और उत्तरदायित्व का अंतर होता है। इसलिए अनुशासन की भूमिका स्वाभाविक है। लेकिन पति-पत्नी का संबंध दो परिपक्व व्यक्तियों का संबंध है। यहाँ कोई शिक्षक नहीं, कोई विद्यार्थी नहीं; कोई अधिकारी नहीं, कोई अधीनस्थ नहीं। यहाँ दोनों समान गरिमा के साथ जीवन की यात्रा के सहभागी हैं।
यही कारण है कि पति-पत्नी के बीच हर विषय पर एकमत होना न तो संभव है और न ही आवश्यक।
दो अलग-अलग परिवारों में पले-बढ़े, अलग संस्कारों, अलग अनुभवों और अलग जीवन-दृष्टि वाले दो व्यक्तियों का हर बात पर एक जैसा सोचना कैसे संभव हो सकता है?
व्यवहार विज्ञान भी यही कहता है कि **मतभेद संबंधों की कमजोरी नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तित्वों के अस्तित्व का प्रमाण हैं।**
समस्या विचारों के अलग होने से नहीं, बल्कि तब शुरू होती है जब असहमति को अहं से जोड़ दिया जाता है।
अक्सर देखा जाता है कि पति अपने बोलने को अधिकार और अपने निर्णय को अंतिम सत्य मान लेता है, जबकि पत्नी के बोलने को बहस, अवज्ञा या ज़िद समझ लिया जाता है।
यहीं से संवाद धीरे-धीरे शक्ति-प्रदर्शन में बदलने लगता है।
जब किसी संबंध में अपनी बात मनवाना, सामने वाले को समझने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए, तब मतभेद संघर्ष का रूप लेने लगते हैं। यदि समय रहते संवाद, धैर्य और आत्मसंयम का स्थान क्रोध और अहं ले लें, तो विवाद केवल कटु शब्दों तक सीमित नहीं रहते। कई परिवारों में यह भावनात्मक, मानसिक और दुर्भाग्यवश कभी-कभी शारीरिक हिंसा तक भी पहुँच जाते हैं।
व्यवहार विज्ञान स्पष्ट करता है कि हिंसा प्रायः नियंत्रण की इच्छा, अनियंत्रित क्रोध और अहं के कारण आती हैं।
ऐसी परिस्थितियाँ दांपत्य जीवन में अक्सर देखने को मिलती हैं। पत्नी अपनी बात कहना चाहती है, लेकिन कई बार उसे पूरा बोलने का अवसर ही नहीं मिलता। उसकी असहमति को बहस, उसके तर्क को ज़िद और उसके प्रश्नों को अवज्ञा समझ लिया जाता है। धीरे-धीरे संवाद का स्थान निर्णय लेने लगता है और साझेदारी का स्थान अधिकार।
सोचने वाली बात यह है कि क्या अपनी बात रखना बहस है?
क्या अलग राय रखना अवज्ञा है?
घर तब कोर्ट-कचहरी नहीं बनता, जब दोनों अपनी बात रखते हैं। घर तब अदालत बनने लगता है, जब एक व्यक्ति स्वयं ही न्यायाधीश भी बन जाए, वकील भी और अंतिम निर्णय सुनाने वाला भी।
मानव व्यवहार का एक मूल सिद्धांत है कि *हर व्यक्ति सम्मानपूर्वक सुने जाने की मूलभूत आवश्यकता रखता है।* जब किसी एक व्यक्ति को अपनी बात पूरी कहने का अवसर ही न मिले, तो वह स्वयं को सुना हुआ नहीं, बल्कि दबाया हुआ महसूस करता है। यही भावनात्मक दूरी की शुरुआत होती है।
एक और रोचक तथ्य व्यवहार विज्ञान बताता है।
जब कोई व्यक्ति किसी निर्णय को अपने अधिकार या प्रतिष्ठा से जोड़ लेता है, तब उसके लिए अपनी बात बदलना कठिन हो जाता है। उसे लगता है कि यदि उसने अपना निर्णय बदल दिया, तो उसकी स्थिति कमज़ोर पड़ जाएगी। परिणामस्वरूप, सही बात समझ लेने के बाद भी वह अपने निर्णय से पीछे नहीं हट पाता।
दुर्भाग्य से कई दांपत्य संबंधों में चर्चा का उद्देश्य समाधान नहीं, स्वयं को सही सिद्ध करना बन जाता है।
जबकि परिपक्वता अपनी बात पर अड़े रहने में नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने में है कि- *”हो सकता है, इस विषय पर तुम्हारा दृष्टिकोण भी उतना ही उचित हो जितना मेरा।”*
रिश्तों में यू-टर्न लेना हार नहीं, बल्कि संबंध को प्राथमिकता देने का साहस है।
एक लोकप्रिय पुस्तक *Men Are from Mars, Women Are from Venus* यह विचार प्रस्तुत करती है कि स्त्री और पुरुष अनेक परिस्थितियों को अलग दृष्टिकोण से देख सकते हैं। यह अंतर किसी की श्रेष्ठता या हीनता का नहीं, बल्कि सोच और अनुभव की विविधता का प्रमाण है।
यदि पति-पत्नी इस सहज सत्य को स्वीकार कर लें कि हर विषय पर दोनों का एकमत होना आवश्यक नहीं है, तो अनेक विवाद जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं।
दांपत्य में शांति तब नहीं आती, जब एक व्यक्ति चुप हो जाए।
शांति तब आती है, जब दोनों एक-दूसरे को बोलने का अवसर दें।
शांति तब नहीं आती, जब केवल एक का निर्णय लागू हो।
शांति तब आती है, जब निर्णय किसी एक की जीत और दूसरे की हार न बनकर, रिश्ते की भलाई के लिए लिया जाए।
जीवनसाथी हमारी प्रतिछाया नहीं होता। वह अपनी अलग सोच, अनुभव, संवेदनाएँ और आत्मसम्मान लेकर हमारे जीवन में आता है। उसे बदलना प्रेम नहीं है। उसे समझना और स्वीकार करना प्रेम है।
व्यवहार विज्ञान कहता है कि मनुष्य आदेश से अपना व्यवहार बदल सकता है, लेकिन उसका मन केवल सम्मान, विश्वास और स्वीकार्यता से बदलता है।
आख़िरकार, सुखी विवाह वह नहीं जहाँ कभी मतभेद न हों।
सुखी विवाह वह है, जहाँ मतभेद के बाद भी संवाद जीवित रहे, सम्मान बना रहे और कोई भी निर्णय अहं की जीत या हार का प्रश्न न बने।
थोड़ा-सा धैर्य…
थोड़ा-सा संवाद…
थोड़ा-सा विश्वास…
थोड़ा-सा व्यक्तिगत स्पेस…
और इतना-सा स्वीकार कि *”मैं हमेशा सही नहीं हो सकता, और तुम्हारा दृष्टिकोण भी मेरे अनुभवों को समृद्ध कर सकता है।”*
क्योंकि जहाँ *”मैं“* बड़ा हो जाता है, वहाँ *”हम”* छोटा पड़ जाता है।
और जिस दिन पति-पत्नी यह समझ लेते हैं कि जीवनसाथी पर अधिकार नहीं, विश्वास चाहिए; आदेश नहीं, संवाद चाहिए; और जीत नहीं, रिश्ता बचाना अधिक महत्वपूर्ण है- उसी दिन घर में शांति लौटने लगती है।
