सांस्कृतिक थानेदारी

सांस्कृतिक थानेदारी

रणबीर सिंह दहिया

जैसे पड़ोस के देश में फतवे जारी करके महिलाओं के अधिकार छीनने का काम किया गया इसी तरह का काम भारत में भी शुरू हो गया लगता है। पहला फतवा – लड़कियां क्या पहने और क्या नै पहने। दूसरा फतवा- लड़कियां किस तरह के मुकाबल्यों से दूर रहैं। तीसरा फतवा – लड़के-लड़कियां शादी के बाद क्या करें और क्या न करें। चौथा – लोग हैप्पी बर्थ डे करना भूल जाएं। पांचवां फतवा – हैप्पी न्यू ईयर कोई नहीं करेगा और और भी कई बात।

भारतीय संस्कृति को बचाने के नाम पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने सौंदर्य प्रतियोगितायों पर रोक लगादी थी। हमारे गांव में सत्तू है उसने कहा , बहोत बढ़िया बात करी। इन औरतों की अकल अब ठिकाने पर आयेगी। हुक्के पर बैठे हुए पांच चार बुजर्गों ने भी तुरंत हां में हां मिलाई। अंदर सत्तू की बहू भी सुन रही थी ये सारी बात। जब बाकी के लोग चले गये तो उसने सत्तू अंदर बुला लिया और बोली क्या बात करो थे?

वो बोल्या – कुछ बात ना थी। राजबाला बोली – बात तो थी। थाम यू पी के चीफ मिनिस्टर को सराहो थे कि सौंदर्य प्रतियोगिता डंडे के जोर पर बन्द करके बहोत ही अच्छा काम किया है उसने। सत्तू थोड़ा सा बेचैन हो कर कहने लगा- जब क्या झूठ है यहै? ठीक तो किया है उसने। थाम ही तो कहया करती कि ये ब्यूटी कम्पीटीशन नहीं होने चाहियें।

राजबाला बोली – इन ब्यूटी कम्पीटीशनों का विरोध जनता की जागरूकता बढ़ाकर के और सारी जनता को साथ ले कर और महिलाओं की स्वतंत्र पहचान का सम्मान करने के आधार पर किया जाना चाहिये। ये फतवे जारी करके तो महिला के अधिकार कुचलने का काम होगा।

सत्तू ने कहा – मेरी तो समझ में आती नहीं तेरी बात। बिना डन्डे के कौन मानै था। राजबाला ने कहा – इसी सरकार यू पी की जिसके कई मंत्री बलात्कार अर महिलावां की गेल्यां जोर जबरदस्ती करने समेत विभिन्न अपराधां के आरोपी हों उनसे ये उम्मीद कैसे करी जा सकती है कि वा ऐसी संस्कृति को समझेगी और उसकी रक्षा करेगी जो महिलाओं को शक्ति सम्पन्न बनाती हो। बढ़ती गरीबी के चलते, अपराधियों को दी जाने वाली हिमायत के चलते, महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की बढ़ोतरी के चलते, ऐसे प्रतिबन्धों का क्या मतलब है?

सत्ते ने कहा – तो क्या एक संस्था ने कानपुर में महिलावां पर जो ड्रेस कोड जारी किया था वो गलत था क्या? राजबाला ने कहा – और क्या वो ठीक था? साथ में बदेशी कम्पनियों के निवेश को अपनी तरफ खींचने के लिए कुछ सरकार इन ब्यूटी कम्पीटीशनों को खुला प्रोत्साहन देती हैं, तो गलत है। महिलाओं के शरीर को सामान के रूप में दिखाने वाले इन ब्यूटी कम्पीटीशनों का विरोध होना चाहिये।

फिर इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि औरत की अपनी स्वतन्त्रता को सम्मान न दिया जाये। उस को बाहर जाने की भी इजाजत ना हो, उसको घर में कैद करने के फतवे जारी कर दिये जायें। सत्तू फिर कहने – तेरी बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आई।

राजबाला ने कहा – सौंदर्य प्रतियोगिताओं का विरोध करने वाले दो तरह के लोग हैं। एक तो वे लोग हैं जो महिला के अच्छा पहनने और खाने पर भी एतराज करते हैं, इन लोगां को उनके शरीर को टी.वी. पर एडवरटाइज में दिखाने पर कोई गुरेज नहीं, ये लोग औरत के सती होने को अच्छा मानते हैं, औरत की मनू की धारणा को ठीक मानते हैं।

जिसमें कहा गया है शूद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़ण के अधिकारी, ये वे लोग हैं जो बाल विवाह के हिमायती हैं। जिनने भंवरी बाई के बाल विवाह का विरोध करने पर उसको सबक सिखाने के लिए उसकी अस्मत लूट ली थी। ये लोग विधवा विवाह के भी हिमायती नहीं हैं।

सत्तू ने कहा – दूसरी तरह के कौनसे लोग हैं? राजबाला ने कहा – इन पहले वालों के बारे में हो गया पूरा ज्ञान? ये लोग रुढ़िवादी विचारों वाले हैं जो महिला की गुद्दी पीछे मत बताते हैं। ये वोह लोग हैं जो महिला को समाज में बराबर का दर्जा देने को लेकर बिल्कुल सहमत नहीं हैं।

सत्तू का मुंह लाल हो गया । उसने कहा जब चाहे ये बेशक रूढ़िवादी कहे जाते हों फेर बात तो इनकी ठीक ही लगयी है। राजबाला ने कहा – महिलाओं के मुद्दे पर तूं तूं नहीं घणखरा गांव इस रूढ़िवाद का शिकार है। जिससे भी बात करो वही घूंघट का हिमायती मिलेगा। औरत को तो आगे लाकर बहुत से लोग खुश नहीं। पर अब औरत इन बातों को समझने लगी हैं और वे तुम्हारे रोकी रुकेंगी नहीं।

इन फतवे देने वालों का वे डटके मुकाबला करेंगी और समाज के वे दूसरी कान्ही वाले लोग इनकी हिम्मात में खड़े होंगे। सत्ते ने टोक दिया – एक ढाल के इंसानों का तो तमने जिकरा कर दिया पर उन दूसरी ढाल के इंसानों की तसवीर तो खींची ही नहीं।

राजबाला ने कहा- पहलम ढाल के इंसानों से ठीक उलटे विचारों के इंसान हैं इस दूसरे पाले में। सती प्रथा का विरोध करें, बाल विवाह का विरोध करें, विधवा विवाह के हिमायती, महिला पुरुष के बराबर के अधिकार चाहने वाले। ये लोग औरत को एक चीज के रूप में नहीं देखते। ये डण्डे के दम पर औरतों को सीधी करने की बात नहीं करते। आई कुछ समझ में कि नहीं?

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