12 जुलाई जयंती पर विशेष
जन कवि पाब्लो नेरुदा
गुरमीत अंबाला
मर जाता है वह धीरे धीरे-
मर जाता है वह धीरे-धीरे
करता नहीं जो कोई यात्रा
पढ़ता नहीं जो कुछ भी
सुनता नहीं जो संगीत
हँस नहीं सकता जो ख़ुद पर।
मर जाता है वह धीरे-धीरे
नष्ट कर देता है जो ख़ुद अपना प्यार
छोड़ देता है जो मदद करना ।
मर जाता है वह धीरे-धीरे
बन जाता है जो आदतों का दास
चलते हुए रोज़ एक ही लीक पर
बदलता नहीं जो अपनी दिनचर्या
नहीं उठाता जोखिम जो पहनने का नया रंग
नहीं करता जो बात अजनबियों से ।
मर जाता है वह धीरे-धीरे
करता है जो नफ़रत जुनून से
और उसके चक्रवाती जज्बातों से
उनसे जो लौटाते हैं चमक आँखों में
और बचाते हैं अभागे हृदय को ।
मर जाता है वह धीरे-धीरे
बदलता नहीं जो जीवन का रास्ता
असन्तुष्ट होने पर भी अपने काम से या प्रेम से
उठाता नहीं जो जोखिम अनिश्चित के लिए निश्चित का
भागता नहीं जो ख़्वाबों के पीछे
नहीं है अनुमति जिसे भागने की
लौकिक मंत्रणा से ज़िन्दगी में कम से कम एक बार ।
जियो आज जीवन ! रचो आज !
उठाओ आज जोखिम
मत दो मरने ख़ुद को आज धीरे-धीरे
मत भूलो ख़ुश रहना !!
ऐसी कविताएं लिखने वाले पाब्लो नेरुदा विश्व की 12जुलाई को जयंती है। उन्हें साहित्य के प्रभावशाली कवियों में जाना जाता है। उनकी कविताओं में प्रेम, प्रकृति,मानवीय संवेदनाओं,सामाजिक न्याय ,राजनीतिक चेतना,जीवन में जोश दृष्टिगोचर होता है।
पाब्लो नेरुदा का जन्म 12 जुलाई 1904 को चिली में हुआ था। उन का जन्म ऐसे देश में हुआ जहाँ प्राकृतिक संपदा तो बहुत थी, लेकिन उसके लाभ समान रूप से लोगों तक नहीं पहुँच रहे थे। कहने को एक गणतंत्र था , चुनाव होते थे पार्टियां सत्ता में आती जाती थी,लेकिन व्यवस्था मुख्यतः बड़े पूंजीपतियों , सामंतों के पास थी जो इस देश की मुख्य संपदा खनन उद्योग से जुड़े थे। जो सरकार को अपनी पूंजी और ताकत से अपने अनुरूप चलाते थे।
खनन पर आधारित व्यवस्था में खदानों में काम करने वाले श्रमिकों को कम वेतन, लंबे कार्य घंटे और खराब परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था।अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ा अंतर था।ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित थीं। धीरे धीरे मजदूरों का आक्रोश आंदोलनों में बदलता जा रहा था।
संवेदनशील पेरूल नेरुदा यह सब देखते हुए कर बड़ा हो रहा था। यही सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ उनके साहित्य और राजनीतिक विचारों की महत्वपूर्ण प्रेरणा बनीं। वे लगातार इस पर लेखन करने लगे और चर्चित होने लगे,उस समय की सरकार ने उन्हें चेतावनी दी कि वो सत्ता विरुद्ध लिख रहे,जो उनके लिए उचित नहीं होगा,लेकिन वे अपनी गति से चलते रहे।
1970 में चिल्ली में चुनाव हुए और समाजवादी तथा कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गई , सालवा आलंदे राष्ट्रपति बन गए क्योंकि मजदूर वर्ग सत्ता से प्रताड़ित हो रहा था उसने अपने आक्रोश को चुनावों में दिखा दिया। पाब्लो नेरुदा स्वयं समाजवादी , कम्युनिस्ट विचारधारा के थे उन्होंने सत्ता परिवर्तन को समर्थन दिया।
वे इतने लोकप्रिय थे कि उन्हें राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों में देखा जाता था लेकिन उन्होंने अपना नाम वापस लेकर अलेंदे का समर्थन किया।
अलेंदे के राष्ट्रपति बनने के बाद, 1970 में नेरूदा को फ्रांस में चिली का राजदूत नियुक्त किया गया।उन्होंने पेरिस में रहकर चिली का प्रतिनिधित्व किया और सांस्कृतिक तथा राजनयिक संबंधों को मजबूत करने का कार्य किया।
लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने 1972 में राजदूत पद से इस्तीफा दे दिया और चिली लौट आए।
लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार ने आम जनता के लिए सुधारों की घोषणा कर दी ,जिस से पूंजीवादी और सामंती ताकतों को भविष्य में अपनी सत्ता कभी न लौटने की शंका बन गई।
ऐसी ताकतों ने1973 में अमेरिका के सहयोग से चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट दिया और अगस्तो पिंचैट ने सैन्य बल से सत्ता पर कब्जा कर लिया।
चिल्ली में फिर दुर्दिनों की शुरुआत हो गई ,जिसमें पाब्लो नेरुदा को भी प्रताड़ित करना शुरू कर दिया क्योंकि वे अपनी कविताओं के माध्यम से जन आंदोलन को शक्ति दे रहे थे।
उन्हें जेल में डाल दिया गया ,वे पहले से ही खराब स्वास्थ्य से जूझ रहे थे इस प्रकार जनता के लिए जूझते कवि पाब्लो नेरुदा 23 सितंबर1973 में इस जहां को अलविदा कर गए,उनके चाहने वाले सैन्य सरकार पर उन्हें शहीद करने के आरोप लगाते हैं।
पाब्लो नेरूदा एक कवि ही नहीं एक सांसद, राजनयिक थे ।
उनकी प्रतिष्ठा,राजनीतिक सक्रियता दोनों उन्हें चिल्ली देश ही नहीं विश्व भर में एक संवेदनशील कवि और राजनयिक के रूप में स्थापित करती है।
उनकी कृतियां हैं
1.Twenty Love Poems and a Song of Despair(प्रेम और विरह कविताएं),
2.Canto General( लेटिन अमेरिका के इतिहास,प्रकृति और संघर्ष का महाकाव्य),
3.Residence on Earth The Capital Verses Elemental Odes,
दुनियां की सभी प्रमुख भाषाओं में उनकी कविताएं विश्व भर में पढ़ी और सराही जाती हैं।
ऐसे जन कवि को उनकी जयंती पर नमन।

लेखक – गुरमीत अंबाला
