ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं
निरंकुश राज के संकट न्यारे !
मोदी राज के संकट न्यारे !
दुखी गरीब हुए घणे सारे !
घर-धरती बेच भेज्जे अमरीका,
इब हथकड़ियां में वापस आरहे !
धरती भी गई रुज़गार गाया इब,
न्यू संकट के घणे बादल़ छारे !
होता रुज़गार जो म्हारे देश में,
क्यों सात समुन्दर लांघते प्यारे !
भई नौजवानों की फ़िक्र छोड़कै,
बेकंडै धन ये तो कुंभ पै लारे !
मरे कितने कुंम्भ में,टेशन पै कितने?
कुछ भी तो ना भेद बता रे !
कुटुंब-कबील्ला फिरै लाश ढूंढता,
दिके ये तो झूठ्ठे दे रहे लारे !
ना सही सूचना देता कोई –
कौण-कौण परलोक सिधारे !
भाई धक्के खाकै बैठ रहेंगें,
‘तिकड़म-साजिश’ जाणै ये सारे !
‘कुंभ और मंदिर’ तो बणे बहाने,
जन-धन पै ये तो नीत डिगारे !
सारा देश कर्जे में फंस गया,
दो सेठ और नेता मौज उड़ारे !

लंदन(UK) से युवा एडवोकेट श्री भारतेंदु इंदल की कवि के व्हाट्सएप पर ये टिप्पणी प्राप्त हुई है:
“Beautifully written and expressed”
-Adv.Bhartendu indal, London, UK
प्रखर बुद्धिजीवी, कहानीकार, व्यंग्यकार, लेखक श्री कुलबीर मलिक जी की यह टिप्पणी कवि के व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई है। हम उनका धन्यवाद करते हैं और अपने सभी लेखकों व पाठकों की सुविधा के लिए टिप्पणी यहां प्रस्तुत करदी है :
“Well explained.Common men’s aspirations and dreams are just fodders for the political mill! ”
-Kulbir Malik, formarly joint commissioner, taxation department, Government of Haryana.