ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं
निरंकुश राज के संकट न्यारे !
मोदी राज के संकट न्यारे !
दुखी गरीब हुए घणे सारे !
घर-धरती बेच भेज्जे अमरीका,
इब हथकड़ियां में वापस आरहे !
धरती भी गई रुज़गार गाया इब,
न्यू संकट के घणे बादल़ छारे !
होता रुज़गार जो म्हारे देश में,
क्यों सात समुन्दर लांघते प्यारे !
भई नौजवानों की फ़िक्र छोड़कै,
बेकंडै धन ये तो कुंभ पै लारे !
मरे कितने कुंम्भ में,टेशन पै कितने?
कुछ भी तो ना भेद बता रे !
कुटुंब-कबील्ला फिरै लाश ढूंढता,
दिके ये तो झूठ्ठे दे रहे लारे !
ना सही सूचना देता कोई –
कौण-कौण परलोक सिधारे !
भाई धक्के खाकै बैठ रहेंगें,
‘तिकड़म-साजिश’ जाणै ये सारे !
‘कुंभ और मंदिर’ तो बणे बहाने,
जन-धन पै ये तो नीत डिगारे !
सारा देश कर्जे में फंस गया,
दो सेठ और नेता मौज उड़ारे !
