सामान्तर सिनेमा का सुनहरा दौर

सामान्तर सिनेमा का सुनहरा दौर

गुरमीत अंबाला

1970-80 दशक भारतीय हिंदी सिनेमा के लिए एक ऐसा दौर रहा है, जिसमें मसाला फिल्मों के साथ ही कुछ ऐसी सामाजिक फिल्में बनती थी जिसमें समाज की कड़वी सच्चाइयों को पटल पर रखा जाता था ,जिसे उस दौर में समान्तर सिनेमा कहा जाता था (Parallel Cinema)कहा जाता है।

ये फिल्में कमर्शियल मसाला फिल्मों से बिल्कुल अलग थीं। इनमें समाज की कड़वी सच्चाई, राजनीति, जातिवाद, भ्रष्टाचार और इंसानी मनोविज्ञान को बिना किसी दिखावे के, बेहद संजीदगी से दिखाया जाता था।

आइए इसी श्रेणी (पैरेलल सिनेमा) की कुछ सबसे बेहतरीन और क्लासिक फिल्मों के बारे में जानते हैं।

मंथन (1976): श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित यह फिल्म गुजरात के श्वेत क्रांति (दुग्ध सहकारिता आंदोलन) पर आधारित है। दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म को बनाने के लिए गुजरात के 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये का योगदान दिया था।

आक्रोश (1980):* गोविंद निहलानी की इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह एक आदिवासी व्यक्ति की कहानी है जिस पर अपनी ही पत्नी की हत्या का झूठा आरोप है, और यह व्यवस्था के क्रूर चेहरे को बेनकाब करती है।

जाने भी दो यारो (1983): हालाँकि यह एक कॉमेडी फिल्म है, लेकिन इसका मिजाज पूरी तरह ‘मंडी’ जैसा है। यह राजनीति, मीडिया और बिल्डरों के भ्रष्टाचार पर किया गया हिंदी सिनेमा का सबसे तीखा और बेहतरीन व्यंग्य है।

सलीम लंगड़े पे मत रो – 1989):** सईद अख्तर मिर्जा की यह फिल्म मुंबई के अंडरवर्ल्ड, बेरोज़गारी और अल्पसंख्यकों के मुद्दों को बहुत गहराई से छूती है।

धारावी (1991): सुधीर मिश्रा द्वारा निर्देशित यह फिल्म एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी ‘धारावी’ के बैकड्रॉप में एक टैक्सी ड्राइवर (ओम पुरी) के बड़े सपने देखने और उसके टूटने की कहानी है।

अंकुर (1974): श्याम बेनेगल की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म थी। इसमें सामंतवाद, जातिवाद और ग्रामीण भारत में महिलाओं के शोषण को बेहद संजीदगी से दिखाया गया है। शबाना आज़मी ने इस फिल्म से अपने करियर की शुरुआत की थी।

निशांत (1975):* ‘दामुल’ की तरह ही यह फिल्म भी ग्रामीण इलाकों में शक्तिशाली जमींदारों के अत्याचार और उनके खिलाफ पनपने वाले आक्रोश की कहानी है।

बाज़ार (1982):* सागर सरहदी की यह फिल्म हैदराबाद में गरीब लड़कियों की ‘बिक्री’ (कांट्रैक्ट मैरिज) जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाती है। इसका संगीत और अभिनय (स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह) लाजवाब है।

मिर्च मसाला (1987): केतन मेहता की यह फिल्म औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश राज) के समय एक गाँव की महिलाओं के आत्मसम्मान और एकजुटता की कहानी है, जो एक अत्याचारी सूबेदार के खिलाफ खड़ी होती हैं। स्मिता पाटिल का किरदार इसमें अमर है।

इजाज़त (1987): गुलज़ार द्वारा निर्देशित यह फिल्म इंसानी रिश्तों, अधूरी मोहब्बत और यादों के ताने-बाने को बुनती है। पैरेलल सिनेमा में यह रिश्तों की सबसे परिपक्व फिल्मों में से एक है।
इस दौर में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, प्रकाश झा (जिन्होंने ‘दामुल’ बनाई थी), सईद अख्तर मिर्जा और केतन मेहता इस दौर के समानान्तर सिनेमा के प्रमुख निर्देशक थे।

कलाकारों में ओम पुरी,अमरीष पूरी, नसीरुद्दीन शाह,स्मिता पाटिल,शबाना आजमी,गिरीश कर्नाड ,पंकज कपूर आदि बहुत से उभरते कलाकार थे जिसमें से ज्यादातर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पढ़े या अन्य रंगमंच से जुड़े थे इन सभी का अभिनय बेहद सशक्त ,दमदार,स्वाभाविक होता था।

इसके अलावा कथा,मंडी, दिल्ली टाईम्स,उत्सव,मिर्च मसाला, अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है,एक रुका हुआ फैसला,गिद्ध आदि भी उस दौर की देखने लायक फिल्में हैं जो आज भी संवेदनशील दर्शक को बांध कर रख सकती है।

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