कविता
जै सनातन! जै सनातन! दे दनादन! दे दनादन!!
ओमसिंह अशफ़ाक
1.
सन्तो राष्ट्रवाद की आई आंधी
उड़ गए नेहरू, उड़ गए गांधी
ना याद किसी को लाल बहादुर
नहीं बचा कोई गुलजारी नंदा
राष्ट्रवाद की ‘भगवा-आंधी’ में
फल-फूल रहा है चंदा-धंधा!
जै सनातन! जै सनातन!
दे दनादन! दे दनादन!!
2.
एक आया था अन्ना हजारे
हम साथ चले थे उसके सारे
पर वो भी निकला संघी-भाई
अनशन करके सत्ता खाई
फिर जा बैठ्या पुराने ठिए
संघ के बल़ गए घी के दिए!
जै सनातन! जै सनातन!
दे दनादन! दे दनादन!!
3.
एक ठो म्हारा राष्ट्रवाद है
एक ठो 56 इंची सीना
चीन देश-भीतर घुस आया
फिर भी ना कहीं गिरा पसीना
कई हजार मील दाबली धरती
बैठग्या ऊपर ठोक कै सीना !
जै सनातन! जै सनातन!
दे दनादन! दे दनादन !!
4.
पहली खेप थी राष्ट्रवाद की-
खूब पिटे मजदूर-किसान
‘आंगनवाड़ी-आशा’ ना बख्शी
किए कर्मचारी भी लहू-लुहान!
पिटे शंकराचार्य बीच सड़क में
वे बोल रहे थे जय श्री राम!
जै सनातन! जै सनातन!
दे दनादन! दे दनादन!!
5.
कुंभ में मर गए हिंदू-भाई
परिजनों को भी लाश न थ्याई
योगी भोगी संघी बजरंगी
मिलबांट के सब ने खाई मलाई
मठाधीश और सत्ताधीश का
गाढ़ा प्यार छना मेरे भाई!
जय सनातन जय सनातन!!
दे दनादन! दे दनादन!!
6.
जब अमरीका की बारी आई
ट्रम्प ने तुरुप फेंक दी भाई
हाथ हथकड़ी पैरों में बेड़ी
कमर की मुस्क बांध ली भाई
हम ला पटके अमृतसर अंदर
ना “राष्ट्रवाद” कहीं दिया दिखाई!
जै सनातन! जै सनातन!!
दे दनादन! दे दनादन !!
