जन्मदिन 6 जुलाई पर विशेष
संजीव : कहानी का वह रसायनज्ञ, जो मनुष्य को बचाने के लिए कथा लिखता है
त्रिभुवन
संजीव का जन्म 6 जुलाई, 1947 को हुआ यानी स्वतंत्र भारत के लगभग साथ-साथ। यह तारीख़ भी अपने भीतर एक संकेत रखती है। एक तरफ़ देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो रहा था, दूसरी तरफ़ समाज अपने भीतर जाति, वर्ग, भूख, विस्थापन, श्रम, स्त्री की उपेक्षा, बाज़ार, सत्ता और सामंती अवशेषों की अनेक बेड़ियाँ ढो रहा था। संजीव की कहानियाँ उसी अधूरे भारत की कहानियाँ हैं। ऐसे भारत की, जिसे संविधान ने नागरिक तो बना दिया, लेकिन जीवन ने अब भी बराबरी नहीं दी।
संजीव को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि वे केवल कहानीकार नहीं, भारतीय समाज के रसायनज्ञ हैं।
यह संयोग नहीं कि वे जीवन के लंबे हिस्से में रासायनिक प्रयोगशाला से जुड़े रहे। रसायनज्ञ पदार्थों की भीतरी प्रतिक्रियाएँ देखता है; संजीव समाज की भीतरी प्रतिक्रियाएँ देखते हैं। बाहर से शांत दिखने वाला गाँव, कस्बा, परिवार, मज़दूर-जीवन, आदिवासी इलाक़ा, स्त्री का मौन, किसान का टूटना, समुद्र का डर, पहाड़ का अकेलापन—इन सबके भीतर कौन-सी अदृश्य गैसें बन रही हैं, कौन-सा अम्ल रिस रहा है, कौन-सा विस्फोट अभी हुआ नहीं है पर होगा—संजीव उसे कथा में पकड़ लेते हैं।
उनकी कथा-दृष्टि का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे मनुष्य को केवल भावुकता में नहीं बचाते, वे उसे उसकी पूरी सामाजिक परिस्थिति में बचाते हैं। उनकी कहानियों में एक दुर्लभ करुणा और असाधारण रूप से खोए हुए रिश्तों की बेचैनी है, लेकिन संवेदना का पाखंड नहीं। करुणा है, लेकिन करुणा की चिकनी-चुपड़ी सजावट नहीं। वे भाषा में फूल नहीं सजाते, वे भाषा से मिट्टी खोदते हैं। उनकी कथा-भूमि में किसान है, मज़दूर है, स्त्री है, आदिवासी है, मछुआरा है, बूढ़ा है, बच्चा है, भूखा है, बेघर है, अपमानित है, और वह भी है जिसे सभ्य समाज ने कभी ठीक से देखा ही नहीं।
संजीव की कहानियाँ केवल पढ़ी हुई चीज़ें नहीं हैं; वे पाठक को उन अनपढ़े, अनकहे, दबे हुए हिस्सों की तरफ़ धकेलती हैं, जिन्हें समाज ने जान-बूझकर नहीं पढ़ा। मैं बहुत बार जिस तरह किताबों को पढ़ने-न-पढ़ने, जानने-न-जानने और व्याख्या के छल-प्रपंच पर विचार करता हूँ तो लगता है कि संजीव की कहानियाँ पूछती हैं—हमने भारत को सचमुच पढ़ा भी है या केवल उसके राष्ट्रगीत, चुनावी नारे और विकास-रिपोर्टें पढ़ी हैं?
संजीव की कथा में एक तरह की जासूसी भी है, लेकिन यह अपराध-कथा वाली जासूसी नहीं। यह मनुष्य की नियति की जासूसी है। वे पता लगाते हैं कि किसी गाँव की स्त्री आखिर मौन क्यों है? कोई मज़दूर क्यों टूटता है? कोई आदिवासी क्यों अदृश्य कर दिया जाता है? किसान के भीतर गुस्सा है या पराजय? एक आदमी अपनी ज़मीन से कटने के बाद सिर्फ़ भूगोल खोता है या आत्मा भी खो देता है? संजीव की कहानी में अपराधी कोई एक व्यक्ति नहीं होता; अपराधी पूरा समाज, पूरा ढाँचा, पूरी व्यवस्था भी हो सकती है। यही उन्हें साधारण कहानीकारों से अलग करता है।
आधुनिक और क्लासिक साहित्य वाली आलोचनात्मक पद्धति से देखें तो संजीव हिन्दी कहानी की परंपरा में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुल हैं। वे प्रेमचंद की सामाजिक चिंता से जुड़े हैं, रेणु की आंचलिक संवेदना से भी, मुक्तिबोध की वैचारिक बेचैनी से भी और समकालीन कथा की संरचनात्मक बेचैनी से भी। पर वे किसी की नक़ल नहीं हैं। वे अपनी कथा-भूमि स्वयं निर्मित करते हैं। उनके यहाँ गाँव केवल दृश्य नहीं, इतिहास है; श्रम केवल घटना नहीं, सभ्यता है; स्त्री केवल पात्र नहीं, मनुष्य की पराजित लेकिन अदम्य चेतना है।
संजीव की कहानी का बड़ा कमाल यह है कि वे स्थानीय को विश्व-स्तर का बना देते हैं। कोई पहाड़ी मज़दूर, कोई मछुआरिन, कोई बूढ़ी औरत, कोई किसान, कोई दलित जीवन, कोई उपेक्षित समुदाय—वे सब केवल भारतीय पात्र नहीं रह जाते, वे विश्व-साहित्य के पात्र बन जाते हैं। यही बड़े कहानीकार की पहचान है। छोटा लेखक अपने गाँव को गाँव ही रहने देता है; बड़ा लेखक अपने गाँव में पूरी पृथ्वी दिखा देता है। संजीव यही करते हैं।
संजीव की कहानियाँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहानी का अंत केवल लेखक की कलम से लगाया गया पूर्ण विराम नहीं है। उनकी अनेक कहानियाँ पढ़कर लगता है कि असली कहानी तो पन्ने के बाद शुरू होती है। अगर उस पात्र ने दूसरा निर्णय लिया होता तो? अगर समाज ने उसे थोड़ा सहारा दिया होता तो? अगर व्यवस्था क्रूर न होती तो? अगर प्रेम बचा रहता तो? अगर ज़मीन न छीनी जाती तो? अगर नदी, पहाड़, समुद्र और जंगल मनुष्य के साथ धोखा न खाते तो?
संजीव का कथ्य अक्सर ऐसे बिंदु पर पहुँचता है जहाँ पाठक कहानी के भीतर एक वैकल्पिक जीवन खोजने लगता है। यही उनकी ताक़त है। वे पाठक को निष्क्रिय दर्शक नहीं रहने देते। वे पाठक से कहते हैं—अब तुम बताओ, इस समाज का अंत क्या होगा? यह मनुष्य बचेगा या नहीं? यह स्त्री मरेगी या जी उठेगी? यह किसान आत्महत्या करेगा या विद्रोह करेगा? यह आदिवासी जंगल छोड़ेगा या इतिहास से टकराएगा?
यहाँ उनकी कहानी केवल साहित्य नहीं रहती; वह नैतिक परीक्षा बन जाती है।
समाजशास्त्रीय आलोचना-फलक से देखें तो संजीव उन लेखकों में हैं जो साहित्य को समाज से काटकर नहीं देखते। उनकी कहानियाँ सत्ता-संबंधों को पहचानती हैं। वे समझती हैं कि कहानी केवल सुंदर वाक्यों की व्यवस्था नहीं है, वह सामाजिक शक्तियों का दस्तावेज़ भी है। जाति कैसे बोलती है, वर्ग कैसे दबाता है, बाज़ार कैसे मनुष्य को माल में बदलता है, पितृसत्ता कैसे स्त्री की देह और श्रम को चुपचाप निगलती है, राजनीति कैसे लोकजीवन को अपने भाषणों में इस्तेमाल करती है—संजीव इन सबको अपनी कथा में पकड़ते हैं।
उनकी कहानियों में समकालीन भारत का सामाजिक भूगोल फैलता है। वहाँ गाँव है, कस्बा है, पहाड़ है, समुद्र है, जंगल है, श्रम है, प्रेम है, असुरक्षा है, हिंसा है, विस्थापन है और मनुष्य की गरिमा बचाने का अनवरत संघर्ष है। संजीव की कथा-दृष्टि इसलिए बड़ी है क्योंकि वह केवल दु:ख की रिपोर्टिंग नहीं करती; वह दु:ख के कारणों की खोज करती है। वह केवल आँसू नहीं दिखाती; वह उन सामाजिक हथेलियों को भी दिखाती है, जिन्होंने आँखों में आँसू भरे।
आज जब कहानी कई बार शहरी मध्यवर्गीय आत्ममुग्धता, भाषा की चमक और बाज़ारू संवेदना में फँस जाती है, संजीव हमें याद दिलाते हैं कि कहानी का असली धर्म मनुष्य की खोज है। मनुष्य को उसकी समग्रता में देखना—उसकी भूख, उसकी देह, उसकी स्मृति, उसकी जाति, उसकी बोली, उसकी शर्म, उसका प्रतिरोध, उसका प्रेम, उसका अपराधबोध, उसकी हँसी और उसकी आख़िरी उम्मीद—यह आसान काम नहीं है। संजीव इसे वर्षों से कर रहे हैं।
उनकी कहानियाँ पढ़ना भारत के उन हिस्सों में जाना है, जहाँ टीवी कैमरे देर से पहुँचते हैं, जहाँ अख़बार अक्सर छोटी ख़बर बनाकर लौट आते हैं, जहाँ नेता चुनाव के समय जाते हैं और समाजशास्त्री कभी-कभी शोध-पत्र के लिए। संजीव वहाँ कथा लेकर जाते हैं। वे मनुष्यों को “केस स्टडी” नहीं बनाते; उन्हें जीवन देते हैं। यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है।
उनकी भाषा पर विशेष बात करनी चाहिए। संजीव के पास भाषा की कला है, लेकिन वे भाषा को अपने लेखकीय रचनाकौशल का बाज़ारू प्रदर्शन नहीं बनाते। उनकी भाषा पात्रों, भूगोल और परिस्थिति से निकलती है। वहाँ देशज शब्द हैं, लोक की लय है, बोलियों की धड़कन है और साथ ही आधुनिक विवेक की कसावट भी। वे कथा को सजाते नहीं; उसे उसके स्वाभाविक रंग, गंध और ताप के साथ सामने रखते हैं। उनकी कुछ कहानियां इतना मुग्ध करती हैं कि आप उनके प्रभाव से मुक्त हो ही नहीं सकते।
उनके इस असर को देखें तो हिन्दी के कई कहानीकारों से वे कहीं अधिक प्रभावी साबित हाेते हैं।
संजीव की कहानियों में स्त्री-पात्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वे करुणा की वस्तु नहीं हैं, वे चेतना की वाहक हैं। वे टूटती हैं, लेकिन केवल टूटती नहीं; वे समाज की असल क्रूरता को उजागर करती हैं। वे अपने मौन से भी बोलती हैं। संजीव जानते हैं कि भारतीय समाज में स्त्री की उपेक्षा केवल घरेलू घटना नहीं, सभ्यता का नैतिक पतन है। इसी कारण उनकी स्त्रियाँ पाठक के भीतर देर तक रहती हैं।
इसी तरह आदिवासी, किसान, मज़दूर और हाशिये के पात्र उनके यहाँ किसी नारे के हिस्से नहीं बनते। वे जीवित लोग हैं। उनमें दोष भी हैं, स्वप्न भी हैं, मोह भी हैं, डर भी हैं, संघर्ष भी है। संजीव की प्रामाणिकता यहीं है कि वे अपने पात्रों को विचारधारा के पोस्टर में नहीं बदलते। वे विचार को जीवन से जन्म देते हैं।
इस समय के हिन्दी कहानीकारों की सूची बनाते हुए अगर संजीव को अग्रिम पंक्ति में न रखा जाए तो यह आलोचना की भूल होगी। वे उन दुर्लभ कथाकारों में हैं जिनके यहाँ अनुभव की व्यापकता, सामाजिक दृष्टि की गहराई, भाषा की विश्वसनीयता, कथात्मक कौशल और मनुष्यता की बेचैनी एक साथ मिलती है। वे केवल अपने समय के कथाकार नहीं, अपने समय के साक्षी हैं।
संजीव की कहानियाँ हमें यह भी सिखाती हैं कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, मनुष्य को बचाने की चेष्टा है। जब विकास मनुष्य को पीछे छोड़ देता है, जब सत्ता नागरिक को आँकड़ों में बदल देती है, जब बाज़ार जीवन को माल बना देता है, जब समाज अपने सबसे कमजोर लोगों से नज़र चुराता है—तब संजीव जैसे लेखक ज़रूरी हो जाते हैं। वे हमें बताते हैं कि कहानी अभी मरी नहीं है, क्योंकि मनुष्य अभी पूरी तरह पराजित नहीं हुआ है।
संजीव का जन्मदिन इसलिए केवल एक लेखक का जन्मदिन नहीं है; यह हिन्दी कहानी की उस परंपरा का भी उत्सव है जो मनुष्य को केंद्र में रखती है, जो व्यवस्था से सवाल करती है, जो भूले हुए चेहरों को आवाज़ देती है और जो साहित्य को जीवन की गहरी ज़िम्मेदारी मानती है।
संजीव को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ। वे हमारे समय के उन बड़े कहानीकारों में हैं जिनकी कहानियाँ पढ़कर लगता है कि हिन्दी कहानी केवल लिखी नहीं जा रही, वह अपने समय की आत्मा का तापमान भी दर्ज कर रही है। और यह काम कोई छोटा लेखक नहीं कर सकता। यह वही लेखक कर सकता है जिसके पास अनुभव की पृथ्वी, भाषा की आग, करुणा की नमी और मनुष्यता को बचाने का दीर्घ धैर्य हो। संजीव के पास यह सब है—इसीलिए वे हमारे समय के सचमुच बड़े कहानीकार हैं।
