आस्था के अंधकार,उसके पाखंडों को अपने तर्क से ध्वस्त करते हैं कबीर !
मंजुल भारद्वाज
कबीर भारत में साहित्य का सूर्य हैं। आस्था के अंधकार,उसके पाखंडों को अपने तर्क से ध्वस्त करते हैं। प्रखर दिव्य दृष्टि से भारत की रूह को उजागर करते हैं । तीखा और सीधा सवाल उनकी रचना का प्राण है। काश भारत तुलसी को नहीं कबीर को साध पाता !
इसके साथ साथ सवाल यह भी है कि आज के साहित्यकार क्या कबीर की तरह सत्ता,धर्मांधता,समाज के पाखंडियों से सीधे सवाल पूछते हैं?
जब दुनिया अस्पताल का निर्माण कर रही है और विज्ञान की ओर देख रही है वहां टच स्क्रीन मोबाइल पर झूठी व्हाट्स यूनिवर्सिटी का बोलबाला है।
क्या अमेरिका के राष्ट्रपति ने किसी चर्च की आधारशिला रखी? क्या सऊदी अरब के शाह ने मस्जिद की मीनार का शिलान्यास किया? पर भारत में एक यह प्रपंच चल रहा है। और साहित्यकार मौन हैं या बेअसर !
पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़ … काकर पाथर जोड़ के मस्जिद लियो चुनाय .. मुल्ला बांग दे बहारो भयो खुदाय !
सदियों पहले एक जुलाहा भारत की रूह बुन गया और हम उसे संभाल भी नहीं पा रहे !

लेखक- मंजुल भारद्वाज
