सामाजिक सरोकार
बंद फ्लैट और डरा हुआ बचपन
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आधुनिक समाज में सामाजिक माता-पिता के पतन और पालन-पोषण के अकेलेपन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, नीचे पार्क में सब खेल रहे हैं… मैं भी चला जाऊँ?” – आठ वर्षीय आर्यन ने स्कूल बैग उतारते ही पूछा।
माँ ने बालकनी से नीचे झाँका। कुछ बच्चे खेल रहे थे, पर अनजान चेहरों और खाली बेंचों को देखकर वह ठिठक गईं।
“नहीं बेटा, अकेले मत जाना। घर में ही खेल लो।”
आर्यन ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गया। उसने मोबाइल उठाया और सोफे पर बैठ गया।
गाँव से आई दादी यह दृश्य देख रही थीं। उन्होंने धीमे से कहा, “हमारे समय में बच्चे पार्क में नहीं, पूरे मोहल्ले की निगाहों में खेलते थे। तब डर कम नहीं था, पर बच्चे अकेले भी नहीं थे।”
यहीं से आज के बचपन की सबसे बड़ी पीड़ा शुरू होती है – बच्चे घरों में सुरक्षित हैं, लेकिन समाज से दूर होते जा रहे हैं।
हमारे घर पहले से अधिक सुरक्षित हो गए हैं। ऊँची इमारतें हैं, डिजिटल लॉक हैं, सीसीटीवी कैमरे हैं और हर सोसायटी में सुरक्षा गार्ड भी हैं। लेकिन इन सबके बावजूद माता-पिता पहले से अधिक चिंतित हैं और बच्चे पहले से अधिक अकेले। यह विरोधाभास केवल जीवनशैली का बदलाव नहीं, बल्कि समाज की बदलती संरचना का संकेत है।
कुछ दशक पहले तक बच्चे केवल अपने परिवार के नहीं, पूरे मोहल्ले की जिम्मेदारी होते थे। यदि कोई बच्चा गिर जाता तो उसे उठाने वाला पहला व्यक्ति उसका पिता ही हो, यह जरूरी नहीं था। पड़ोसी, दुकानदार, राह चलते लोग और रिश्तेदार भी उतनी ही आत्मीयता से उसकी देखभाल करते थे। बच्चों के लिए पूरा समाज एक विस्तृत परिवार की तरह काम करता था।
समाजशास्त्र में इस व्यवस्था को ‘एलोपेरेंटिंग’ (Alloparenting) या ‘सामाजिक माता-पिता’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि किसी बच्चे के पालन-पोषण में केवल उसके जैविक माता-पिता ही नहीं, बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची, पड़ोसी, शिक्षक और पूरा समुदाय सहभागी बनता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि हाथी, चिंपैंज़ी और व्हेल जैसे सामाजिक जीवों में भी बच्चों की सामूहिक देखभाल की परंपरा मिलती है। अर्थात बच्चों को मिलकर बड़ा करना केवल संस्कृति नहीं, बल्कि प्रकृति का भी नियम है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति भी यही थी। संयुक्त परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं थे, वे भावनात्मक सुरक्षा कवच थे। दादी कहानियाँ सुनाती थीं, ताऊ अनुशासन सिखाते थे, बुआ दुलार करती थीं और पड़ोसी भी आवश्यकता पड़ने पर अभिभावक बन जाते थे। बच्चा रिश्तों की गर्माहट में बड़ा होता था। उसे यह भरोसा होता था कि यदि कभी कोई समस्या आएगी तो मदद करने वाले कई हाथ मौजूद हैं।
लेकिन समय बदला।
औद्योगिकीकरण बढ़ा।
रोज़गार शहरों में केंद्रित होने लगे।
संयुक्त परिवार छोटे-छोटे फ्लैटों में बदल गए।
धीरे-धीरे बच्चों के आसपास मौजूद वह सामाजिक सुरक्षा तंत्र कमजोर पड़ता गया। अब माता-पिता ही सब कुछ हैं – कमाने वाले भी, शिक्षक भी, मित्र भी और चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रहरी भी। पालन-पोषण अब साझी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि दो लोगों का अकेला संघर्ष बन गया है।
यहीं से आधुनिक माता-पिता की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है।
आज अधिकांश माता-पिता हर समय किसी न किसी चिंता में रहते हैं। बच्चा स्कूल पहुँचा या नहीं? किससे बात कर रहा है? इंटरनेट पर क्या देख रहा है? सुरक्षित है या नहीं? जब जिम्मेदारियाँ बाँटने वाले लोग कम हो जाते हैं, तब मानसिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि आज ‘पैरेंटल बर्नआउट’ अर्थात पालन-पोषण से जुड़ी मानसिक थकान एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है।
इसका सबसे गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है।
पहले बच्चा स्कूल से लौटकर दादी की गोद में बैठ जाता था।
आज वह मोबाइल की स्क्रीन के सामने बैठ जाता है।
पहले शामें गली के खेलों से भर जाती थीं।
आज वे वीडियो गेम और सोशल मीडिया में बीत रही हैं।
धीरे-धीरे स्क्रीन ने उस खालीपन को भरना शुरू कर दिया है, जिसे कभी रिश्ते भरते थे। मोबाइल और टैबलेट कई घरों में ‘डिजिटल बेबीसिटर’ बन चुके हैं। वे बच्चों को कुछ समय के लिए व्यस्त तो रख देते हैं, लेकिन अपनापन, संवाद और भावनात्मक सुरक्षा कभी नहीं दे सकते।
एक और बदलाव हमारी भाषा में भी दिखाई देता है। पहले बच्चे हर बड़े व्यक्ति को किसी रिश्ते से पुकारते थे – चाचा, ताऊ, मौसी, बुआ या दादी। यह केवल संबोधन नहीं था, बल्कि सामाजिक विश्वास का प्रतीक था। आज महानगरों में वर्षों तक साथ रहने वाले पड़ोसी भी एक-दूसरे का नाम नहीं जानते। जब रिश्तों की भाषा कमजोर पड़ती है, तो भरोसे की संस्कृति भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
यह लेख पुराने समय का महिमामंडन नहीं करता। हर दौर की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। आज शहर बेहतर शिक्षा, चिकित्सा और अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं कि हम सामाजिक जुड़ाव खो दें। आधुनिक जीवन और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आवश्यकता केवल संतुलन बनाने की है।
हमें अपने बच्चों के लिए फिर से एक ‘आधुनिक गाँव’ बनाना होगा।
यदि दादा-दादी साथ नहीं रहते, तो उनसे नियमित बातचीत हो।
पड़ोसी केवल फ्लैट नंबर न रहें, परिचित चेहरे बनें।
बच्चे केवल ट्यूशन और मॉल तक सीमित न रहें, बल्कि पार्क, पुस्तकालय, खेल और सामुदायिक गतिविधियों का हिस्सा बनें।
सोसायटियों में बच्चों के सामूहिक खेल, कहानी सत्र और परिवारों के बीच संवाद जैसी छोटी-छोटी पहल भी इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें हर खाली समय मोबाइल से भरने की आदत छोड़नी होगी। बच्चों को मिट्टी में खेलने दीजिए, साइकिल चलाने दीजिए, दोस्तों से झगड़ने और फिर सुलह करना भी सीखने दीजिए। जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीखें किताबों से नहीं, अनुभवों से मिलती हैं।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमारे बच्चों के पास कितने महँगे खिलौने हैं।
प्रश्न यह है कि उनके पास कितने भरोसेमंद लोग हैं।
प्रश्न यह नहीं कि वे कितनी सुरक्षित इमारत में रहते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या उस इमारत में कोई ऐसा भी है जो उन्हें नाम से पहचानता हो।
क्योंकि बचपन केवल सुविधाओं से नहीं खिलता।
वह अपनत्व से खिलता है।
वह विश्वास से बढ़ता है।
हो सकता है आज गाँव पहले जैसे न रहे हों, लेकिन यदि हम अपने शहरों, अपार्टमेंटों और मोहल्लों में फिर से विश्वास, संवाद और सहभागिता की संस्कृति विकसित कर सकें, तो बच्चों का बचपन भी पहले जैसा निडर हो सकता है।
क्योंकि बच्चे केवल अपने माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं होते।
वे पूरे समाज का भविष्य होते हैं।
डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल हैं।

इस लेख की तरह डा. रीटा अरोड़ा के प्रायः सभी लेखों में मौलिक दृष्टि, तार्किकता और उपयोगीता मौजूद रहती है।
इस लेख में चर्चित समस्या का हल मुख्य रूप से “रोजगार की नीति” से जुड़ा है:
1. यदि गांव-देहात में सरकारें “पर्याप्त व उपयुक्त” रोजगार सृजन/स्थापना करें तो गांवों से शहरों की तरफ लोगों का विस्थापन रुक सकता है।
2. गांव में मोहल्लेदारी और सामूहिकता का जीवन निर्मित होने में सदियां लगी हैं। इसके लिए शहर सदियों तक इंतजार नहीं कर सकते हैं। चारदीवारी की घेराबंदी और पुलिस के भरोसे सुरक्षा हो नहीं सकती है।
3. आबादी का पलायन रोकने के लिए शहरों वाली सब सुविधा गांव में उपलब्ध हो हो जाएं तो लोग शहरों की तरफ नहीं आएंगे।
4. बेहतरीन शिक्षा, रोजगार, बिजली, पानी, सड़क और संचार यह सब गांवों की प्राथमिक जरूरते हैं।
5. सुरक्षा का गांव में कोई खास मुद्दा नहीं है। गांव अपनी सुरक्षा खुद कर लेते हैं। क्योंकि सब एक दूसरे से परिचित होते हैं।