कविता
आदमजात
ओमसिंह अशफ़ाक
छोटे-से आँगन में घर के
रोपे थे मैंने तीन पौधे-
शहद-सा मीठा आम
करेला-सा कड़वा नीम
और इमली-सा खट्टा नींबू ।
पर मेरा मिज़ाज तीनों से
भिन्न निकला-
पौधों को खाद-पानी दिया
नुलाई-गुड़ाई की
और अब वे पेड़ बन गए-
छाया और फल भी देने लगे ।
मैंने चाहा उनको सीमित रखना
अपने आँगन में
पर वे तो पड़ौसियों के घर में छतराने लगे
और वक्त-बे-वक्त इतराने लगे ।
यदा-कदा पेड़ों पर तितलियाँ
और चिड़ियाँ भी आने लगीं
न जाने उनसे क्या-क्या
हँसने-बतियाने लगीं ।
मैं ठहरा दुनियादार आदमी
जान को पहले ही सौ-सौ झंझट थे-
पेड़ों की यह अश्लील हरकत
मुझसे बर्दाश्त न हुई-
आखिर एक दिन साफ कह दिया कि
मुझे ऐसी उदारता पसन्द नहीं।
खाद-पानी मैं दूँ
नुलाई-गुड़ाई मैं करूँ
देखें-भालू मैं- छाया और फल
पड़ौसी बरतें-खायें- मुफ़्त में ऐश उड़ाएं ?
पेड़ों ने मशविरा किया-
मेरी नस्लो-जात की चर्चा की
देश-काल का विवरण लिया
आजकल के हालात पर तबसरा किया
और घनघोर चुप्पी साध ली ।
मैंने सोचा चलो जो हुआ,सो हुआ
इनको नसीहत तो मिली
आइन्दा ऐसी हरकत नहीं करेंगें
पर अगले मौसम में उनकी उद्दडंता
और बढ़ गई ।
पड़ौसी के आँगन में आम की शाखा
फलों से लद गई-
नींबू दूसरे पड़ौसी की तरफ़ पसर गया
और नीम ने अपनी छतरी
तीसरे पड़ौसी की तरफ फेर दी ।
ऐसी चुप्पा-मार मारी कि
मेरे हिस्से तीन अदद आम
और फ़कत कंटीली डार आयी ।
मेरे गुस्से का ठिकाना न रहा
मैंने कुल्हाड़ी उठायी और
तेजी से नीम के तने पर जा चलायी ।
तभी कड़वा नीम बेहद मीठी आवाज में
आम और नींबू से बोला
मानों किसी प्रागैतिहासिक घटना का भेद खोला-
शोक मत करो भाई !
धीरज धरो-
मैंने उस दिन कहा था न-
यह कुरुक्षेत्र है-
यहाँ तेग-तलवार का पुराना प्रचलन है ।
चलो- यहाँ न सही कहीं और उगेंगे
अपना स्वभाव थोड़े ही तजेंगे ?
**
मेरे ऊपर उस दिन सौ घड़े
पानी पड़ गया
और लाज का मारा तो-
धरती में गड़ गया
(27 जून’ 2000)
——————————
