क्यों हमने इस उपन्यास के दो अध्यायों के बाद ही उसे छोड़ दिया!

क्यों हमने इस उपन्यास के दो अध्यायों के बाद ही उसे छोड़ दिया!

अलका सरावगी के उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें” के अधूरे पठन पर एक टिप्पणी

−अरुण माहेश्वरी

अलका सरावगी के उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें” के पहले अध्याय “कोई बीसेक बरस बाद प्रेम” के बमुश्किल बारह पन्नों के बाद जब उसके दूसरे अध्याय “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” पढ़ा तो हमारा धीरज जवाब दे गया। हम आगे और इस उपन्यास को पढ़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा सके ।

इन दो अध्यायों ने ही स्पष्ट कर दिया कि अलका सरावगी जिस उपन्यास-दृष्टि के संकट से अपने आरंभिक लेखन से जूझती रही हैं, समय के साथ उससे बाहर नहीं निकलीं; बल्कि इस उपन्यास में वह संकट और अधिक गहरा होकर सामने आता है। इस उपन्यास के प्रारंभ में ही यह नजर आने लगा कि लेखिका ज़िद की हद तक अपने पात्रों को कभी बोलने नहीं देती; वह खुद उनके भीतर बैठकर लगातार खुद ही बोलती रहती है।

यह वह स्थिति है जिसे मनोविश्लेषण की भाषा में कहा जा सकता है कि विश्लेष्य (analysand) की जगह विश्लेषक (analyst) स्वयं बोलने लगें । और, जिस क्षण ऐसा होता है, उसी क्षण विश्लेषण समाप्त हो जाता है; केवल आरोप, संकेत और पूर्वग्रह शेष रह जाते हैं ।

उपन्यास के पहले अध्याय, “कोई बीसेक बरस बाद प्रेम”, में सुनील बोस उर्फ़ मोहम्मद दानियाल की कहानी है । एक ऐसा व्यक्ति जिसने मुस्लिम लड़की दीबा से विवाह किया, परिवार से कट गया, बीस साल बाद माँ के पास लौटा और फिर माँ की भयावह आत्महत्या का सामना किया।

जाहिर है कि यह कथा गहरी मानवीय करुणा की माँग करती थी। पर लेखिका इसे पात्रों की भीतरी आवाज़ से नहीं, अपने बाहरी व्याख्यात्मक चाबुक से चलाती है। “सच बोलो…”, “क्या तुम सिर्फ़ माँ के दिल की सोचकर गए थे?”, “क्या एक अदद विलेन के बिना कहानी पूरी नहीं होती?” जैसे कोष्ठकों में बार-बार आने वाले वाक्यों से पुलिसिया पूछताछ के लहजे में लेखक का हस्तक्षेप कथा के खुलने की संभावनाओं को लगातार बंद करता जाता है। कहना न होगा, पात्र के अचेतन को सुनने के बजाय उस पर अर्थ का आरोपण विश्लेषण को चौपट करने के लिए काफी होता है।

उपन्यास के दूसरे अध्याय, “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” में तो यह दोष जैसे सिर पर चढ़ कर बोलने लगता है। इसके पात्र बोड़ो बाबू को कम्युनिस्ट सिद्ध करने के लिए लेखिका कुछ बाहरी चिह्नों का प्रयोग करती है, जैसे वे ‘गणशक्ति’ (सीपीआईएम का बांग्ला दैनिक मुखपत्र), रूसी साहित्य पढ़ते हैं, यूनियन की बैठकों में जाते हैं, पूजा से चिढ़ते हैं और मुसलमानों के इलाके में घर बनाते हैं। मानो कम्युनिस्ट होना कोई ऐतिहासिक, वर्गीय और वैचारिक चेतना न होकर अख़बार, चश्मा, गंभीर चेहरा, दाढ़ी और कुछ आदतों का जोड़ मात्र हो।

इसमें दूसरा और सबसे गंभीर उदाहरण बाबरी मस्जिद प्रकरण का है। यह इस अंश का सबसे निर्णायक दृश्य भी है। बिना किसी पूर्ववर्ती मानसिक प्रक्रिया, किसी वैचारिक संकट, किसी सामाजिक दबाव या किसी व्यक्तिगत अनुभव की तैयारी के एक जीवन-भर का ‘कम्युनिस्ट’ अचानक टीवी पर बाबरी मस्जिद गिरते देखकर उछल-उछलकर ताली बजाने लगता है!

यदि लेखक वास्तव में यह दिखाना चाहता कि किसी कम्युनिस्ट के भीतर सांप्रदायिक चेतना दबे रूप में मौजूद होती है, तो उसे उस चेतना के बनने की प्रक्रिया दिखानी चाहिए । साहित्य में आकस्मिक घटनाएँ भी असंभव नहीं होतीं; पर आकस्मिकता तभी विश्वसनीय बनती है जब उसका मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार कथा के भीतर निर्मित किया गया हो । पर यहाँ तो केवल एक दृश्य है, जो इसलिए उपस्थित है कि पाठक चौंक जाए और निष्कर्ष निकाल ले कि कम्युनिस्ट भी अंततः भीतर से हिंदुत्ववादी ही निकलते हैं।

इसे आलोचना की भाषा में, साहित्यिक अन्वेषण नहीं, वैचारिक युक्ति (device) कहते हैं। लेखक ऐसे ही चरित्रों पर सवार होकर बोला करता है।

तीसरा उदाहरण मुसलमानों के बीच घर बनाने की घटना को भी लिया जा सकता है। लेखिका इसे बार-बार इस प्रकार रखती है कि जैसे यह कम्युनिस्टों की कोई हास्यास्पद नैतिक नुमाइश हो। जबकि बंगाल में विशेषकर वामपंथी ट्रेड यूनियन आंदोलन के इतिहास में मिश्रित आबादी वाले इलाक़ों में रहना कोई असाधारण घटना नहीं थी। अनेक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता वास्तव में उन्हीं मज़दूर बस्तियों में रहते थे जहाँ हिन्दू-मुस्लिम साथ रहते थे। इससे किसी भोले आदर्शवाद का उपहास करना स्वयं इतिहास की अज्ञानता का परिचायक है।

बोड़ो बाबू का चरित्र वास्तव में कहीं अधिक जटिल हो सकता था। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, एक असफल पिता, एक मूक पति, एक वैचारिक मनुष्य, एक दुख से टूटा हुआ इंसान—इन सबके बीच का तनाव एक बड़े उपन्यास का आधार बन सकता था। लेकिन लेखिका को ऐसी जटिलता पसंद नहीं हैं। वह उसे सरल बनाती हैं, फिर उस सरलता पर व्यंग्य करती हैं। इस प्रकार चरित्र का नहीं, चरित्र के कैरिकेचर का निर्माण करती है।

चौथा उदाहरण बोस और दीबा के विवाह का है। ऊपर से तो उपन्यास मानो अंतर-धार्मिक विवाह का समर्थन करता दिखाई देता है, पर उसके पूरे भाव-संयोजन में यह विवाह लगातार “समस्याग्रस्त”, “बेमेल”, और “त्रासद” रूप में उपस्थित होता है। सुनील का मोहम्मद दानियाल बनना प्रेम का विस्तार नहीं, लगभग सामाजिक दुर्घटना जैसा दिखाई देता है। अंततः पाठक के भीतर यह भाव पैदा होता है कि ऐसी शादियाँ स्वभावतः विफल होती हैं। इस प्रकार, लेखक बिना प्रत्यक्ष घोषणा किए पूरे भाव-संयोजन का प्रभाव वही पड़ता है कि जिसे आज का हिंदुत्ववादी सामाजिक विमर्श लगातार प्रचारित कर रहा है।

कोलकाता का चित्रण भी इसी प्रकार सुनी-सुनाई सूचनाओं का कोलाज है—मटियाबुर्ज, वाजिद अली शाह, दर्जी, मुस्लिम बस्ती, बंगाली उच्चारण, रवीन्द्र-संगीत, गणशक्ति, यूनियन, बाबरी, CAA—सब कुछ मौजूद है, पर किसी की ऐतिहासिक आत्मा नहीं है। शहर यहां महज एक दृश्य-सामग्री है, जीवित अनुभव नहीं।

इस दूसरे अध्याय का शीर्षक है, “इनसान बनाने का प्रोजेक्ट” । पर वास्तव में यहां किसी मनुष्य का निर्माण नहीं होता। यहाँ पहले से तय वैचारिक निष्कर्षों के अनुसार मनुष्य की एक आकृति गढ़ी जाती है। चरित्र का स्थान रूढ़ छवि (stereotype) ले लेती है।

इस प्रकार के लेखन की बुनियादी विफलता का कारण यही होता है कि लेखक पात्रों पर विश्वास नहीं करता। वह पहले निष्कर्ष तय करता है, फिर पात्रों से वैसा व्यवहार करवाता है जिससे निष्कर्ष सिद्ध हो जाए। फलतः बोड़ो बाबू चरित्र नहीं, कम्युनिस्ट का कैरिकेचर बन जाते हैं; बोस प्रेमी नहीं, भ्रमित पहचान का नमूना बन जाता है; दीबा स्वतंत्र स्त्री नहीं, तनाव का कारण बन जाती है; माँ करुणा की जगह भावुकता का यंत्र बन जाती है। उपन्यास अपने पात्रों का उपन्यास नहीं रहता; यह लेखिका की पूर्वधारणाओं का आख्यान, बन जाता है।

अच्छा उपन्यास अर्थ को आरोपित नहीं करता, उसे जन्म लेने देता है। पर यहां मनुष्य नहीं, मनुष्य पर बनी-बनाई राय बोलती है। और जब राय कथा पर हावी हो जाती है, तब साहित्य मर जाता है—केवल टिप्पणी ही बचती है।

“कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन” के दो अध्यायों तक आते-आते ही हमारे लिए उपन्यास को आगे पढ़ना कठिन हो गया। इसका कारण भाषा या कथन-कौशल नहीं था। अलका सरावगी इन पहलुओं को निभा लेती हैं। पर हमारे तई समस्या उनके लेखन की मूलभूत दृष्टि की संरचना में है । उनके लेखन पर हमारा यह अनुभव नया भी नहीं है।

लगभग तीस वर्ष पहले जब हमने उनके चर्चित उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ की तुलना प्रभा खेतान के ‘पीली आँधी’ से करते हुए एक टिप्पणी लिखी थी, तब भी हमने पाया था कि दोनों लेखिकाएँ लगभग एक ही सामाजिक संसार, एक ही मारवाड़ी परिवेश और एक ही कलकत्ता को आधार बनाती हैं; लेकिन प्रभा खेतान के यहाँ वही संसार जीवित मनुष्यों, उनके श्रम, उनकी महत्वाकांक्षाओं, उनकी विफलताओं और इतिहास की ठोस प्रक्रियाओं से बनता है, जबकि अलका सरावगी के यहाँ वही संसार धीरे-धीरे एक विचारधारात्मक आख्यान में बदल जाता है। इतिहास अपनी जटिलता में नहीं आता; किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष का बयान बन जाता है।

उस समीक्षा में हमने लिखा था कि कलिकथा का दोष उसका इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि इतिहास का विकृतिकरण है। उसमें स्वतंत्रता आन्दोलन, बंगाल का सामाजिक जीवन, मारवाड़ी समुदाय, गांधीवादी, सुभाषवादी, सांप्रदायिक तनाव—सब कुछ इस प्रकार संयोजित होता है ताकि अंततः एक निर्मित “मारवाड़ी अस्मिता” का आख्यान तैयार हो सके। इसके विपरीत पीली आँधी में माधो बाबू जैसे पात्र अपने कर्म, अपने व्यापार, अपने समय और अपने अंतर्विरोधों से बनते हैं। उनकी अस्मिता विचारधारा से आरोपित नहीं होती; जीवन से अर्जित होती है।

आज कलकत्ता : कॉस्मोपॉलिटन दिल और दरारें के केवल दो अध्याय पढ़कर ही हममें फिर वही पुरानी अनुभूति लौट आई।

यहाँ भी कलकत्ता अपने बहुस्तरीय ऐतिहासिक यथार्थ में नहीं, कुछ चुने हुए प्रसंगों और सुनी-सुनाई स्मृतियों के सहारे उपस्थित होता है। शहर की वह जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया, जिसमें बंगाली, मारवाड़ी, अंग्रेज़, चीनी, यहूदी, बिहारी मजदूर, शिक्षित मध्यवर्ग, उद्योगपति, ट्रेड यूनियन, अकाल, विभाजन, नक्सलबाड़ी और उदारीकरण—सब मिलकर आधुनिक कलकत्ता का निर्माण करते हैं—वह लगभग अनुपस्थित है। उसकी जगह घटनाओं के ऐसे सरलीकृत रेखाचित्र हैं जिनमें लेखक की वैचारिक धारणा अधिक दिखाई देती है, शहर का वास्तविक जीवन कम।

यथार्थवादी साहित्य की पहली शर्त होती है कि लेखक अपने पात्रों और इतिहास, दोनों से कुछ सीखने के लिए तैयार हो। विचार उसके अनुभव से निकले, अनुभव विचार की कठपुतली न बने। यहाँ हमें बार-बार उलटी प्रक्रिया दिखाई देती है। जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं, पात्र बोलते कम हैं, लेखक की धारणाएं उनके माध्यम से अधिक बोलती हैं। इतिहास खुलता नहीं, समझाया जाता है। स्मृति खोज नहीं करती, प्रमाण जुटाती है।

यही कारण है कि दूसरे अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते हमारे भीतर यह विश्वास नहीं बचा कि आगे का पाठ इस पहली छाप को बदलेगा। अनुभव ने उलटे यही बताया कि ‘कलिकथा वाया बाईपास’ के समय अनुभूति के जिस उथलेपन को हमने पहचाना था, वही उनके और भी कुछ परवर्ती उपन्यासों की भांति फिर से एक नए शीर्षक और नए प्रसंग के साथ उपस्थित हो गया है।

विचारधारा अपने-आप में लेखक को यथार्थ के प्रति अंधा नहीं बनाती। हर बड़ा लेखक किसी-न-किसी विचारधारा या विश्वदृष्टि से संचालित होता है । वह यथार्थ की खोज का उपकरण होती है, लेखक की दृष्टि को पैना बनाती है। लेकिन जब विचारधारा यथार्थ पर आरोपित निष्कर्ष बन जाती है, तब वह लेखक को यथार्थ के प्रति अंधा कर देती है। लेखक तब जीवन से सीखना बंद कर देता है; वह जीवन से केवल अपने लिए प्रमाण जुटाने लगता है।

यथार्थवादी साहित्य की पहली शर्त यह नहीं कि लेखक विचारधारा से मुक्त हो; बल्कि यह कि उसकी विचारधारा यथार्थ की खोज का साधन बने, उसका विकल्प नहीं। और यदि वह आरोपित विचारधारा प्रतिक्रियावादी हो, तो वह मनुष्य को उसके कर्म, संघर्ष और इतिहास से काटकर पूर्वनिर्धारित पहचानों में बदल देती है। वहाँ साहित्य अपनी सबसे बड़ी शक्ति, मानव-मुक्ति की कल्पना को ही खो देता है।

इसी कारण ‘कलकत्ता : कॉस्मोपॉलिटन, दिल और दरारें’ के केवल दो अध्यायों के बाद ही हमें आगे बढ़ना निरर्थक लगा। हमारे लिए यह किसी नए साहित्यिक अनुभव की शुरुआत नहीं थी; यह उस दृष्टि की पुनरावृत्ति थी जिसे हम लगभग तीन दशक पहले ‘कलिकथा वाया बाईपास’ की समीक्षा में पहचान चुके थे। उपन्यास समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन उसके देखने का ढंग हमारे सामने पूरा खुल चुका था। आगे के पृष्ठ शायद नए प्रसंग देते, पर नई दृष्टि नहीं!

पुनः, जब लेखक अपने पात्रों और इतिहास से सीखना बंद कर देता है और उन्हें अपनी पूर्वधारणाओं के प्रमाण में बदल देता है, उसी क्षण उपन्यास का यथार्थ समाप्त होने लगता है।

अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक – अरुण माहेश्वरी

One thought on “क्यों हमने इस उपन्यास के दो अध्यायों के बाद ही उसे छोड़ दिया!

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    अरुण माहेश्वरी ने अलका सरावगी के लेखक की रचना-प्रक्रिया और मनोवृत्ति का विश्वसनीय विश्लेषण किया है। उपन्यासकार और उपन्यास के सभी संकीर्ण, एक पक्षीय, अपर्याप्त विश्लेषण व कमजोर पक्षों को यथार्थ के धरातल पर तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है। ऐसा लेखन पाठक अथवा साहित्य को समृद्ध कर सकेगा, ऐसा मान लेने का कोई आधार नज़र नहीं आता है।

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