अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं

अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं

  • जब रिश्तों की गर्माहट कम होने लगे, तब सपने जीवन की सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं

डॉ रीटा अरोड़ा

“मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया।”

शाम ढल रही थी। पार्क की एक बेंच पर बैठे वृद्ध ने अपने पुराने मित्र से कहा, “सोचा था, बुढ़ापे में बच्चे साथ बैठकर बातें करेंगे, सुख-दुख बाँटेंगे। आज सब अपने-अपने संसार में व्यस्त हैं।”

मित्र ने मुस्कुराकर पूछा, “फिर समय कैसे कटता है?”

वृद्ध ने आसमान की ओर देखते हुए उत्तर दिया, “कुछ पुराने सपनों के सहारे और कुछ नए सपने बुनकर। अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं।”

यह संवाद केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि हमारे समय का यथार्थ है। बदलती जीवनशैली, बढ़ती व्यस्तताओं और रिश्तों की बदलती परिभाषाओं के बीच मनुष्य अक्सर स्वयं को अकेला पाता है। ऐसे में यदि कोई उसका साथ नहीं छोड़ता, तो वे हैं उसके सपने।

सपने मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी हैं। वे न तो किसी बाजार में बिकते हैं और न ही किसी से छीने जा सकते हैं। धन, पद, प्रतिष्ठा और संबंध समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन मन के भीतर बसे सपनों पर केवल सपने देखने वाले का अधिकार होता है। शायद यही कारण है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी इंसान सपने देखना नहीं छोड़ता।

“वो मंज़िलें भी क्या मंज़िलें, जिनका कोई ख़्वाब न हो,
वो ज़िंदगियाँ भी क्या ज़िंदगियाँ, जिनमें कोई अरमान न हो।”

आज का दौर विडंबनाओं का दौर है। तकनीक ने दूरियों को मिटा दिया है, लेकिन दिलों के बीच फासले बढ़ा दिए हैं। परिवार एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन में सिमट गए हैं। संवाद कम हो रहे हैं और अपेक्षाएँ बढ़ रही हैं। ऐसे समय में कई लोग यह महसूस करते हैं कि जिनसे सबसे अधिक अपनापन था, वही धीरे-धीरे दूर होते चले गए।

रिश्तों की इस बदलती तस्वीर में सपने एक आश्रय बनकर उभरते हैं। जब कोई अपना साथ छोड़ देता है, तब व्यक्ति अपने सपनों के सहारे आगे बढ़ना सीखता है। सपने उसे बताते हैं कि जीवन केवल वर्तमान की पीड़ा नहीं है; उसके आगे भी एक संभावना है, एक नई सुबह है।

दरअसल, सपने केवल रात में देखे जाने वाले दृश्य नहीं होते। वे हमारी आकांक्षाएँ, उम्मीदें और भविष्य की कल्पनाएँ होते हैं। कोई विद्यार्थी सफलता का सपना देखता है, कोई खिलाड़ी पदक का, कोई किसान अच्छी फसल का और कोई बुजुर्ग अपने परिवार की खुशहाली का। ये सपने ही उन्हें संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम अपने सपनों को दूसरों की स्वीकृति से जोड़ देते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे अपने लोग हमारे सपनों को समझें, उनका समर्थन करें और हमारी सफलता पर प्रसन्न हों। लेकिन जीवन हमेशा हमारी इच्छाओं के अनुरूप नहीं चलता। कई बार सबसे अधिक विरोध अपने ही लोगों से मिलता है। ऐसे में निराश होने के बजाय यह समझना आवश्यक है कि सपनों का मूल्य दूसरों की स्वीकृति से नहीं, हमारे विश्वास से तय होता है।

जीवन में सब कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन अपने सपनों को जीवित रखना हमारे हाथ में अवश्य होता है। सपने टूटते नहीं, वे केवल रूप बदलते हैं। कभी वे लक्ष्य बन जाते हैं, कभी प्रेरणा और कभी कठिन समय में संबल।

आज समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, अकेलापन और मानसिक तनाव के बीच सपनों का महत्व और भी बढ़ गया है। जो व्यक्ति सपने देखना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे आशा खोने लगता है। वहीं जो सपनों को जीवित रखता है, वह असफलताओं के बाद भी उठ खड़ा होता है। इतिहास गवाह है कि हर बड़ी उपलब्धि कभी किसी का सपना ही थी।

यह भी सच है कि सपनों का संसार केवल कल्पनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सपनों के साथ कर्म का जुड़ना आवश्यक है। सपने दिशा देते हैं और परिश्रम उन्हें मंज़िल तक पहुँचाता है। केवल सपने देखना पर्याप्त नहीं, उन्हें साकार करने का साहस भी चाहिए।

कबीर ने कहा था-

*”मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”*

वास्तव में सपने मन की उसी विजय का दूसरा नाम हैं। वे हमें टूटने नहीं देते, बिखरने नहीं देते और हर अंधेरे के बाद उजाले की संभावना पर विश्वास बनाए रखते हैं।

अंततः जीवन का सार यही है कि परिवर्तन को स्वीकार करते हुए आशा को जीवित रखा जाए। लोग बदल सकते हैं, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं और रिश्तों के अर्थ भी बदल सकते हैं, लेकिन सपने हमारे भीतर तब तक जीवित रहते हैं जब तक हम उन्हें जीवित रखना चाहते हैं।

जब जीवन की भीड़ में अपने ही अजनबी लगने लगें, तब निराश होने की आवश्यकता नहीं। उस समय अपने भीतर झाँककर देखिए, वहाँ कुछ सपने अब भी आपका इंतजार कर रहे होंगे। वे आपको याद दिलाएँगे कि अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।

क्योंकि सच यही है-

अपने तो कब के पराये हो चले,

कम से कम सपने तो अपने हैं।

~डॉ रीटा अरोड़ा सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल हैं

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