योग दिवस विशेष
दीर्घायु का दिव्य सूत्र: स्वस्थ और स्वावलंबी वृद्धावस्था के लिए योग
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जीवन की सांध्यबेला को गरिमा, आत्मनिर्भरता और आनंद से सराबोर करने का शाश्वत मार्ग: अपनों की देखभाल से लेकर आत्म-देखभाल तक
डॉ. रीटा अरोड़ा
“दादाजी, आप रोज सुबह पाँच बजे क्यों उठ जाते हैं?”
पोते ने छुट्टियों में गाँव आए अपने दादाजी से पूछा।
दादाजी मुस्कुराए।
“ताकि बुढ़ापा मेरे ऊपर हावी न हो जाए।”
“लेकिन आपकी उम्र तो पचहत्तर साल है। आपको आराम करना चाहिए।”
दादाजी ने योगा मैट समेटते हुए कहा, “बेटा, आराम और निष्क्रियता में फर्क होता है। शरीर को जितना चलाओगे, वह उतना साथ देगा। और मन को जितना शांत रखोगे, जीवन उतना सुंदर लगेगा।”
पोता कुछ देर उन्हें देखता रहा।
सूरज की पहली किरणें आँगन में उतर रही थीं। दादाजी के चेहरे पर एक अनोखी शांति थी। उस क्षण उसे महसूस हुआ कि शायद स्वस्थ बुढ़ापा दवाइयों से नहीं, जीवन जीने के तरीके से आता है।

आज दुनिया एक नए प्रश्न के सामने खड़ी है। पहले लोग लंबी उम्र की कामना करते थे। आज लोग लंबी और स्वस्थ उम्र की कामना कर रहे हैं। जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है। चिकित्सा सुविधाएँ बेहतर हो रही हैं। लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है। उम्र तो बढ़ रही है, पर क्या स्वास्थ्य भी साथ चल रहा है?
कितने ही बुजुर्ग ऐसे हैं जो दवाइयों, निर्भरता और अकेलेपन के बीच अपने जीवन के अंतिम वर्षों को बिताने के लिए मजबूर हैं।
यही कारण है कि 21 जून 2026 को मनाए जाने वाले 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” रखी गई है। यह केवल उम्र बढ़ाने की बात नहीं करती, बल्कि उस उम्र को गरिमा, स्वतंत्रता और सक्रियता के साथ जीने की बात करती है।
हमारे समाज में एक समय था
जब बुजुर्ग परिवार की शक्ति माने जाते थे।
वे अनुभव का भंडार थे।
निर्णयों के मार्गदर्शक थे।
बच्चों के मित्र थे।
लेकिन आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में कई बुजुर्ग स्वयं को अकेला महसूस करते हैं।
शारीरिक समस्याएँ अलग, मानसिक चुनौतियाँ अलग।
ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन का सहारा बन सकता है। योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह व्यक्ति को उसके शरीर और मन दोनों से जोड़ता है।
बढ़ती उम्र में सबसे बड़ी समस्या शरीर की जकड़न और संतुलन की कमी होती है। साधारण योगासन शरीर की लचक बनाए रखते हैं, मांसपेशियों को सक्रिय रखते हैं और गिरने की संभावना को कम करते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ वृद्धावस्था में नियमित योगाभ्यास को अत्यंत लाभकारी मानते हैं।
लेकिन बुढ़ापे की चुनौतियाँ केवल शरीर तक सीमित नहीं होतीं। अकेलापन, चिंता, स्मृति कमजोर होना और भविष्य का भय भी व्यक्ति को भीतर से कमजोर करते हैं।
यहीं योग का दूसरा रूप सामने आता है – ध्यान और प्राणायाम।
जब कोई बुजुर्ग प्रतिदिन कुछ मिनट गहरी साँसों के साथ बैठता है तो केवल फेफड़े ही मजबूत नहीं होते, मन भी हल्का होता है। भ्रामरी, अनुलोम-विलोम और ध्यान जैसे अभ्यास तनाव कम करने और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक पाए गए हैं।
कई बार हम अपने माता-पिता और बुजुर्गों के लिए अच्छी दवाइयाँ, अच्छे अस्पताल और अच्छी सुविधाएँ जुटाने की कोशिश करते हैं।
यह आवश्यक भी है।
लेकिन क्या हम उन्हें आत्म-देखभाल का समय भी देते हैं?
क्या हम उन्हें यह प्रेरणा देते हैं कि वे अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्वयं भी लें?
स्वस्थ वृद्धावस्था केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं होती।
यह व्यक्ति और परिवार, दोनों की साझी जिम्मेदारी होती है।
योग इसी साझेदारी को मजबूत करता है।
एक और महत्वपूर्ण बात है। आज का युवा वर्ग अक्सर सोचता है कि योग और स्वास्थ्य की चिंता बुढ़ापे में करेंगे।
लेकिन स्वस्थ वृद्धावस्था की नींव युवावस्था में ही रखी जाती है। जो व्यक्ति चालीस की उम्र में अपने शरीर की अनदेखी करता है, वह सत्तर की उम्र में उसकी कीमत चुकाता है और जो व्यक्ति समय रहते योग, प्राणायाम और संतुलित जीवनशैली अपनाता है, उसका बुढ़ापा अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय और आत्मनिर्भर होता है।
योग हमें यह भी सिखाता है कि उम्र केवल शरीर की नहीं होती, मन की भी होती है। हमने ऐसे अनेक बुजुर्ग देखे हैं जो अस्सी वर्ष की आयु में भी उत्साह से भरे रहते हैं। ऐसे लोग भी देखे हैं जो पचास वर्ष में ही जीवन से थके हुए लगते हैं।
अंतर केवल वर्षों का नहीं, दृष्टिकोण का होता है। योग उसी दृष्टिकोण को बदलता है।
वह हमें वर्तमान में जीना सिखाता है।
वह हमें अपने शरीर की सुनना सिखाता है।
वह हमें स्वीकार करना सिखाता है कि उम्र बढ़ना कमजोरी नहीं, जीवन की स्वाभाविक यात्रा है।
भारतीय संस्कृति में सदैव दीर्घायु की कामना की गई है। लेकिन केवल लंबी आयु नहीं, स्वस्थ आयु की।
शायद इसी भावना से हमारे ऋषियों ने योग को जीवन का हिस्सा बनाया था।
आज आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार कर रहा है कि योग तनाव कम करता है, हृदय को स्वस्थ रखता है, फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।
अंततः बुढ़ापा जीवन का सूर्यास्त नहीं है। यह अनुभवों से भरी हुई वह सांध्य बेला है, जिसे सुंदर, शांत और गरिमामय बनाया जा सकता है।जरूरत केवल इतनी है कि हम अपने बुजुर्गों को दवाइयों के सहारे नहीं, जीवन के सहारे भी जीना सिखाएँ।
और स्वयं भी आज से ही उस भविष्य की तैयारी करें, जिसमें उम्र तो बढ़े, लेकिन निर्भरता न बढ़े।
क्योंकि सच्ची दीर्घायु वर्षों की संख्या में नहीं मापी जाती। वह इस बात में मापी जाती है कि
हम अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक कितने स्वस्थ, कितने स्वावलंबी और कितने प्रसन्न बने रहते हैं और शायद योग इसी कला का सबसे सरल, सबसे प्राचीन और सबसे विश्वसनीय सूत्र है।
