अंधविश्वास
बाबागीरी का सच
रणबीर सिंह दहिया
हमारे देश में, विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों में, बाबागीरी का धन्धा सबसे अधिक फल-फूल रहा है। बाबा लोग स्त्रियों और बच्चों को आसानी से अपना निशाना बनाते हैं। मराठी में कहावत है- ‘जहाँ बाबा, वहाँ स्त्रियाँ।’ पंजाबी में भी कहावत है- ‘माइयां दे पीर भुक्खे नहीं मरदे।’ (स्त्रियों के देवता भूखे नहीं मरते)।
बाबा लोगों की कारिस्तानियाँ किसी से छिपी नहीं। कितने बाबा जेल में है और कितने फरार हैं-पाठक खूब जानते हैं। गाँवों में, खासतौर पर अनपढ़ता के कारण किसी भी समस्या के समाधान के लिए लोग किसी बाबा की शरण में चले जाते हैं। औरत को बच्चा नहीं होता, तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए, पर अन्धविश्वास के कारण या खर्चे से बचने के लिए लोग बाबा के पास जाते हैं। कोई स्त्री मायके से तिरस्कृत है या ससुराल में पटरी नहीं बैठ रही, तो इसका समाधान बाबा के पास कैसे हो सकता है? कमजोर मन की स्त्रियाँ बाबा के पास जाकर उपाय ढूँढ़ती हैं।
बाबा तो पहले ही शिकार की तलाश में बैठे हैं। बाबा का औरा देख-सुनकर स्त्रियाँ उनसे प्रभावित हो जाती हैं। वहाँ उनका शारीरिक शोषण होना आम बात है, पर अक्सर स्त्रियाँ बदनामी के डर से बाहर बात नहीं निकालतीं। बाबाओं की आध्यात्मिकता तो छलावा है, धन, राज-पाट, ताकत, स्त्रियों का शरीर- यही उनके लक्ष्य होते हैं। बाबा लोग श्मशान घाट से लेकर बिजनेस चैंबर तक डेरा जमाए हुए हैं। कोई अपने को काले इल्म का माहिर बताता है, तो कोई किसी और ज्ञान का। इतने माहिर हो तो उससे खुद अमीर बन जाओ, भोली जनता को क्यों धोखा दे रहे हो ?
आम आदमी ही नहीं, अच्छे-खासे पढ़े-लिखे भी इन बाबाओं के चक्कर में आ जाते हैं। रोहतक में एक वरिष्ठ डॉक्टर दम्पति ने तांत्रिक के कहने पर अपने छोटे बेटे का खून बड़े बेटे में चढ़ा दिया, बिना यह सोचे कि अलग किस्म का खून चढ़ाना खतरनाक है। फिर जो होना था, वही हुआ। उनके बेटे की मौत हो गयी और डॉक्टर-दम्पति सलाखों के पीछे हैं। हमारा समाज ऐसे किस्सों से भरा पड़ा है।
बाबा लोग पूरे योजनाबद्ध तरीके से अपने गुणगान करवाते हैं, जिसे भोले-भाले अनुयायी समझ नहीं पाते। बाबाओं के अपने बन्दे ही दरबार में आगे बैठे होते हैं, जो बाबा के सुझाए उपायों से हुए फ़ायदे गिनाते हैं। हमारा देश इसी तरह अन्धश्रद्धा में डूबता जा रहा है।
किसी को लकवा मार गया है तो डॉक्टर ही उसका इलाज कर सकता है, बाबा नहीं। लेकिन यहाँ तो बुखार न टूटने पर भी लोग बाबा की शरण में या सयाने (?) ओझा की शरण में पहुँच जाते हैं। यह पिछड़ेपन की निशानी है। किसी बाबा के पास स्त्री की झोली भरने का कोई उपाय नहीं होता, वह तो वही करके झोली भरेगा जिस तरह पुरुष झोली भरता है।
बाबा लोगों का इतना बड़ा साम्राज्य आम जनता के शोषण पर ही टिका है। प्रभाव से या जबर्दस्ती जमीन हथिया लेना, धमकियाँ देकर अपने स्वामित्व और बात को मनवाना बाबाओं के जाने-माने हथकंडे हैं। न मानने पर कत्ल करवाने में भी इन्हें कोई संकोच नहीं होता। इनके पास कोई दैवीय शक्ति नहीं होती।
इसलिए किसी महाराज या बापू या स्वामी या भगवान या बाबा या माता के पास जाने की बजाय अपनी समस्या को पहचानकर उसे हल करने की सूझ-बूझ रखने वाले विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए। बाबा अक्सर दावा करते हैं कि वे जादू-टोना करके आपके ग्रहों की दिशा ठीक कर देंगे।
ऐसा है तो वे हवा और बादलों की दिशा बदलकर सूखे इलाकों में बारिश क्यों नहीं ले आते या बहुत ज़्यादा बारिश की आशंका वाले इलाकों को क्यों नहीं बचा लेते ? सीमाओं पर हमारे जवानों की ग्रह-दशा ठीक कर उन्हें शहीद होने से क्यों नहीं बचा लेते ? ज़ाहिर है कि जादू-टोना भी लूट का एक हथकंडा है।
अक्सर लोगों की जिज्ञासा रहती है कि घर की स्त्री को लड़का होगा या लड़की होगी? हालांकि इस सवाल के पीछे भी खतरनाक, भेदभावपूर्ण सोच छिपी है। इसके लिए लोग बाबा के पास भी जाते हैं। वह सबको लड़का होने या उसके लिए उपाय करने की बात कर खर्च का बिल बना देता है। करीब आधे लड़के, अपने आप हो जाते हैं। बस, फिर बाबाजी की जय। यह ठगी का सांस्कृतिक और धार्मिक तरीका है।
एक आदमी चूर्ण की गोलियाँ बेचता था। उसे लगा, पैसा बनाने के लिए धंध बदलना चाहिए। वह उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में गया। लंबे बाल और दाढ़ी के साथ भगवा चोला और माला धारण कर ली। फिर वही चूर्ण की गोली लड़का होने के नाम पर देनी शुरू कर दी। दस में से औसतन चार-पाँच को लड़का होता ही है। तो वे औरतें इन बाबाजी का प्रचार करने लगीं। बस, बाबाजी की दूकान चल निकली। ऐसे किस्सों से हमें सीख लेने की ज़रूरत है। इन बाबाओं को दोस्त न समझें, इनके पाखंड को समझें और दूसरों को भी बताएँ। इसीमें हमारे समाज और देश की भलाई है।
आइये, लड़के-लड़की का सच भी जान लेते हैं। विज्ञान कहता है कि लड़का या लड़की होगी- इसके पीछे स्त्री की कोई भूमिका नहीं। पुरुष के पास एक्स और वाई-दोनों तरह के गुणसूत्न प्रकृति ने दिये हैं, जबकि स्त्री के पास केवल एक्स गुणसूत्र होते हैं। एक्स से एक्स का संयोग यानी लड़की और एक्स से पुरुष के वाई का संयोग यानी लड़का। संसर्ग के बाद गुण-सूत्नों के तेईसवें जोड़े का मिलन ही लड़की या लड़के का होना तय करता है।
तो यह पुरुष और संयोग-दोनों पर निर्भर करता है कि क्या होगा? हमारे समाज, विशेष रूप से उत्तर भारत में, स्त्री द्वारा लड़की के जन्म पर उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि लड़का होने पर उसका बाप मूँछों को ताव देने लगता है। यह अनपढ़ता और पिछड़े समाज की निशानी है। दिमाग में भरी अन्धविश्वासों की गन्दगी सिर्फ तर्कपूर्ण सोच और विवेक से ही निकल सकती है।
आम लोगों में नजर लगने की बात भी प्रचलित है। यह भी अवैज्ञानिक सोच से उत्पन्न होती है। इसके लिए बच्चे को काला टीका लगाया जाता है। बुरी निगाह से बचने के लिए मिस्र और तुर्की में ‘ईविल आई’ नाम से काँटों की आँख का लॉकेट नजरबट्टू के रूप में बड़ा लोकप्रिय है।
हमारे यहाँ तो बच्चों से लेकर युवतियों तक गले या पाँव में काला धागा बाँधने की लकीर चल पड़ी है। क्या ऐसे लोग कभी बीमार नहीं होते? तो फिर काले टीके और धागे की गुलामी किसलिए ढो रखी है? पहले देश में बाल मृत्यु दर बहुत अधिक थी, तो यह भी माना जाने लगा कि बच्चे को किसी ने नजर लगा दी है।
सच यह है कि स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाएँ न होने के कारण ही बच्चे ज्यादा मरते थे। इसीलिए बच्चों के नाम नकली राम, कूड़ा राम जैसे रखे जाते थे कि नजर न लगे और वह बच जाये। कमजोर मन ने नजर उतारने की विधियाँ भी बना दीं। यह कितनी हवाई बातें हैं कि ऐसे व्यक्ति पर नमक वारकर पानी में डालने या मिर्च /फिटकरी वारकर आग में रखने से नजर उतर जाती है।
भोली स्त्रियाँ बच्चे को भूख न लगने की वजह नजर लगना मान लेती हैं, फिर ‘झाड़ा’ कराने चल देते हैं। धागे में नींबू-मिर्च बाँधकर दुकान पर लटकाना या घर के बाहर नजरबट्टू टाँगना भी इसी बीमारी का नतीजा है। वैसे ज़्यादातर दुकानों और घरों पर यह नहीं होता है, तो उन्हें क्या नुकसान हो गया? क्या वे दुकानें नहीं चलतीं?
नींबू और मिर्च खाने के लिए होते हैं घर-दुकान पर लटकाने के लिये नहीं। अब भारत में इन्सान की औसत आयु करीब 70 वर्ष पहुँच गयी है, पर नजर लगने वाली बात आज भी लोग मानते हैं।
हरियाणा के एक गर्ल्स हॉस्टल में वार्डन ने दौरा किया तो एक छात्रा ने दीवार के साथ दीया जला रखा था। काली दीवार देखकर वार्डन ने दीया जलाने का कारण पूछा, तो छात्रा बोली- ‘ताकि नजर न लगे’। उस छाला के खून की जाँच करायी गयी तो एच बी. सिर्फ 7 निकला, जो कम-से-कम 11-12 होना चाहिए।
कमजोरी कहाँ है और मन किधर भटक रहा है? मुसलमान गले में अक्सर ताबीज़ पहनते हैं। गुलामियों का कोई अन्त नहीं। यह सब हमारे पिछड़ेपन की निशानियाँ हैं। इसीलिए रॉबर्ट ग्रीन इंगरसोल लिखते हैं- “अन्धविश्वास, विकास का शतु, शिक्षा का दुश्मन तथा स्वतन्त्रता का हत्यारा है। हमेशा से ऐसा ही रहा है तथा रहेगा।”
कुछ और उदाहरण देखें। प्रतापगढ़ (राजस्थान) में होली से अगले दिन आग पर चलकर जाने की प्रथा है। पर तेजी से चलने के कारण आग से नुकसान नहीं होता। रतलाम (म.प्र.) में भी एक जगह अंगारों पर तेजी से चलकर जाने की प्रथा है। वे यदि अंगारों पर 3.5 सेकेंड से अधिक देर नहीं रुकेंगे तो पैर नहीं जल पायेंगे। चलने से पहले अंगारों पर नमक छिड़का जाता है, जिससे नमी बन जाती है जो पैरों को जलने से बचाती है। तर्कपूर्ण सोच के न होने पर ही ऐसे करतब इन्सान को चमत्कार लगते हैं और उसे भटकाते हैं।
