रीति-रिवाज केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं : वैज्ञानिक और तार्किक परंपरा

सामाजिक सरोकार

रीति-रिवाज केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं : वैज्ञानिक और तार्किक परंपरा

  • परंपराओं को समझिए, अंधानुकरण नहीं; उनके पीछे छिपे जीवन-विज्ञान को पहचानिए

 डॉ. रीटा अरोड़ा

 

एक दिन पार्क में टहलते हुए दो बुजुर्ग मित्र बातचीत कर रहे थे।

“वर्मा जी, आजकल के बच्चे कहते हैं कि हमारे रीति-रिवाज पुराने जमाने की बातें हैं,” शर्मा जी ने कहा।

वर्मा जी मुस्कुराए और बोले, “समस्या रीति-रिवाजों में नहीं है शर्मा जी, समस्या यह है कि हम उनके पीछे का कारण बताना भूल गए हैं।”

“मतलब?”

“मतलब यह कि यदि किसी बच्चे को केवल यह कह दिया जाए कि नमस्ते करो, पैर छुओ, उपवास रखो या तुलसी की पूजा करो, तो वह पूछेगा – क्यों? और यदि हमारे पास उसका उत्तर नहीं होगा तो उसे सब कुछ अंधविश्वास ही लगेगा।”

शर्मा जी ने सिर हिलाया। “बात तो सही है।”

यह संवाद आज के समाज की एक बड़ी वास्तविकता को सामने लाता है। आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के युग में नई पीढ़ी हर बात को तर्क की कसौटी पर परखना चाहती है। यह अच्छी बात है। लेकिन दुर्भाग्य तब होता है जब हम अपनी परंपराओं को समझे बिना ही उन्हें पुराना या अवैज्ञानिक मान लेते हैं।

सच तो यह है कि भारतीय रीति-रिवाज केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं। उनमें जीवन को स्वस्थ, संतुलित और व्यवस्थित बनाने की गहरी समझ छिपी हुई है। हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव, अवलोकन और ज्ञान के आधार पर अनेक ऐसी परंपराएँ विकसित कीं, जो व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण से जुड़ी थीं।

उदाहरण के लिए, हाथ जोड़कर “नमस्ते” करने की परंपरा को ही देखिए। यह केवल अभिवादन का तरीका नहीं है। दोनों हथेलियों को जोड़ने से उंगलियों के सिरे एक-दूसरे पर दबाव डालते हैं, जिससे एकाग्रता बढ़ती है और मन सामने वाले व्यक्ति पर केंद्रित होता है। साथ ही यह बिना शारीरिक संपर्क के सम्मान प्रकट करने का सबसे स्वच्छ तरीका भी है। कोरोना काल में पूरी दुनिया ने इस भारतीय परंपरा का महत्व समझा।

इसी प्रकार बड़ों के चरण स्पर्श की परंपरा को लें। सामान्यतः इसे केवल सम्मान का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इसका एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जब कोई व्यक्ति विनम्र होकर झुकता है तो उसके भीतर अहंकार कम होता है और वह अनुभव तथा ज्ञान के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। यही भाव परिवारों में संस्कारों और संबंधों को मजबूत बनाता है।

उपवास और व्रत को भी कई लोग केवल धार्मिक मान्यता मानते हैं। जबकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि नियंत्रित उपवास शरीर को विश्राम देता है। पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर की सफाई की प्राकृतिक प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं। आज जिसे “इंटरमिटेंट फास्टिंग” कहा जा रहा है, उसका स्वरूप हमारे यहाँ सदियों से मौजूद था।

हमारी परंपराओं में प्रकृति संरक्षण का अद्भुत विज्ञान भी छिपा है। पीपल, बरगद, तुलसी और नीम जैसे वृक्षों को पूजनीय माना गया। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था पैदा करना नहीं था, बल्कि ऐसे उपयोगी वृक्षों का संरक्षण करना भी था। यदि उन्हें पवित्र न माना गया होता तो संभव है कि समय के साथ उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता।

तुलसी के पौधे को घर के आँगन में रखने की परंपरा इसका सुंदर उदाहरण है। तुलसी औषधीय गुणों से भरपूर है। यह वातावरण को शुद्ध करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है। इसलिए उसे केवल पौधा नहीं, बल्कि घर की सदस्य जैसा सम्मान दिया गया।

मंदिरों में घंटी बजाने, शंख ध्वनि करने और मंत्रोच्चार की परंपरा को भी केवल धार्मिक अनुष्ठान समझ लेना उचित नहीं होगा। ध्वनि का मनुष्य के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। नियमित मंत्रोच्चार और ध्यान मन को एकाग्र करते हैं तथा तनाव कम करने में सहायक होते हैं। आज दुनिया भर में मेडिटेशन और साउंड थेरेपी पर शोध हो रहे हैं, जबकि हमारी संस्कृति में यह ज्ञान बहुत पहले से मौजूद था।

त्योहारों के पीछे भी केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तर्क निहित हैं। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, ईद या क्रिसमस जैसे पर्व लोगों को जोड़ते हैं। परिवार एकत्र होते हैं, रिश्तों में मधुरता आती है और समाज में सामूहिकता की भावना मजबूत होती है। साथ ही छोटे व्यापारियों, कारीगरों और शिल्पकारों को भी आर्थिक अवसर प्राप्त होते हैं।

हालाँकि यह भी सच है कि समय के साथ कुछ परंपराओं में विकृतियाँ और रूढ़ियाँ भी जुड़ गईं। जब हम किसी रीति-रिवाज के मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं और केवल उसके बाहरी रूप को पकड़े रहते हैं, तब वह अंधविश्वास का रूप ले लेता है। इसलिए आवश्यकता अंधानुकरण की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समझ की है। जो परंपराएँ मानव कल्याण, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती हैं, उन्हें अपनाना चाहिए। जो कुरीतियाँ भेदभाव, अज्ञान या शोषण को बढ़ावा देती हैं, उन्हें छोड़ देना चाहिए।

वास्तव में हमारी परंपराएँ किसी संयोग का परिणाम नहीं हैं। वे हजारों वर्षों के अनुभव, अवलोकन और सामाजिक प्रयोगों का निष्कर्ष हैं। हमारे पूर्वजों ने जीवन को स्वस्थ, अनुशासित और संतुलित बनाने के लिए इन रीति-रिवाजों को संस्कृति का हिस्सा बनाया।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि परंपराएँ पुरानी हैं या नई। प्रश्न यह है कि क्या उनमें आज भी जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता है। यदि हम उनकी आत्मा को समझ लें, तो पाएँगे कि अधिकांश परंपराएँ

हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति जिम्मेदारी, समाज के प्रति संवेदनशीलता और स्वयं के प्रति अनुशासन का संदेश देती हैं।

क्योंकि रीति-रिवाज केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं होते। वे समाज के अनुभवों से जन्मी ऐसी जीवन-शैली होते हैं, जो पीढ़ियों को जोड़ती है, मूल्यों को सहेजती है और जीवन को दिशा देती है।

लेखिका सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल  हैं।

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