देश आजाद होने के बाद भी आर्थिक आजादी की लड़ाई चलती रही है। मेहनतकश तबके अपने शोषण- उत्पीड़न के खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे हैं। इनमें किसान, मजदूर, कर्मचारी सभी शामिल हैं। ऐसे संघर्षों के दौर कभी उभार पर तो कभी उतार पर देखे गए हैं। कर्मचारी आंदोलन का ऐसा ही एक दौर 40-45 साल पहले भी उभार पर था। यहां प्रस्तुत वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी ‘लोक-यमलोक’ एक ऐसे ही आंदोलन का विवरण पेश करती है। कहानी में ‘फेंटेसी’ तकनीक का उपयोग हुआ है : संपादक।
कहानी
लोक-यमलोक
ओमसिंह अशफ़ाक
सरूपसिंह ने महसूस किया कि सफेद-चिट लिबास में, हाथों में चाकू-छुरे लिये तीन-चार नकाबपोश यमदूत उसके ऊपर मंडरा रहे हैं, जिनकी भाषा-शैली उसकी समझ में बिलकुल नहीं आ रही है।
सिविल अस्पताल के सर्जरी कक्ष की आपरेशन टेबल पर पड़ा सरूपसिंह बायें पैर की हड्डी के ‘फ्रेक्चर’ और छाती के घावों के दर्द में तड़पना और कराहना बंद कर चुका था। उसे इस बात का अब रत्तीभर स्मरण या अहसास नहीं रह गया था कि उसकी छाती के एक-तिहाई हिस्से की खाल जल गई थी और जली हुई खाल का बचा-खुचा हिस्सा किसी फटेहाल औरत के चीथड़ों की तरह उलट-पलट गया था। उसे यही लग रहा था कि वह यमलोक पहुंच गया है और उसको घेरे खड़े यमदूत उसके अच्छे-बुरे कर्मो का हिसाब मांग रहे हैं।
उसने अपने लौकिक कर्मों का जायज़ा खुद लेना चाहा। दिमाग़ पर बहुत जोर देकर भी वह कोई अच्छा कर्म याद नहीं कर पाया। पांच-सात बुरे कर्म जरूर याद आ गये। या यों कहिए कि पांच-सात बार किया हुआ एक ही बुरा कर्म उसे याद आया। वह था “शुक्राना” लेना। और उसे चिंता हुई शुक्राने को यमलोक में रिश्वत माना जाता होगा ? पांच-दस रुपये से ज्यादा तो उसे कभी मिले नहीं। उनमें से भी लाइनमैन और लाइन-सुपहिटेंडेंट का हिस्सा उसने दिया था। फिर भी क्या सबका सब हिसाब उसी से चुकाया जायेगा ?
अचानक उसने देखा. यमराज सामने सिंहासन पर बैठे हैं और वह अपराधी बनकर उनके सामने खड़ा है। यमराज कह रहे हैं, “क्यों नहीं? आखिर शुक्राना मांगा तो तुमने ही था। मैं लोक-परलोक सबका ज्ञाता हूं। मेरे सामने तुम मुकर नहीं सकते। मेरे रिकार्ड में तो सारी घटनाएं उसी दिन और तत्काल दर्ज़ हो जाती हैं। क्या तुम मेरे रिकार्ड को झुठला सकते हो ?”
सरूपसिंह ने सहायता के लिए इधर-उधर देखा। नेकचंद एस.डी. ओ. भी उसके साथ यमलोक आ जाता तो कितना अच्छा रहता। साथ क्यों, उसे तो मुझसे पहले ही यहां होना चाहिए था। कितनी सफाई से नेकचंद सच्चे रिकार्ड को झूठा साबित कर देता था। 54वें कंज्यूमर को 45वें की जगह कनैक्शन देकर पकड़े जाने पर उसने कितनी चतुराई से सबको मूर्ख बनाया था। कह दिया था, ‘प्रायरिटी लिस्ट बनाते समय 4 और 5 के आंकड़े की ‘टाइपिंग मिस्टेक’ हो गयी थी सर, इसलिए 54वें को 45वें की जगह कनैक्शन मिल गया। अब भला मशीन की गलती के लिए कोई आदमी कैसे दोषी हो सकता है?’…काश यहां नेकचंद होता, कुछ ले देकर वह यमराज से कह देता-टाइपिंग मिस्टेक हो गयी सर। शुक्राना सूरतसिंह ने लिया होगा जो गलती से सरूपसिंह के नाम से रिकार्ड में दर्ज हो गया…।
मगर नेकचंद वहां नहीं था। सरूपसिंह ने देखा, सामने से मरहूम दादी चली आ रही है। वह चौंक गया। दादी यमलोक में आकर भी लाठी के सहारे झुक कर चलती है ? यहां भी उसके चेहरे पर वैसी ही झुर्रियां हैं? वैसी ही थकी-थकी सी लगती है जैसी मरने से महीने भर पहले थी।
दादी को देख कर वह डर गया। दादी बहुत प्यार करती है उसे। लेकिन चोरी और झूठ बरदाश्त नहीं कर सकती। जब वह छोटा था, ऐसी हरकतों पर दादी ने उसके पिता से कह कर उसकी काफ़ी कुटम्मस करायी थी, हालांकि बाद में घंटों रोती थी, उसकी चोटों को सहलाती थी, तरह-तरह से दुलारती थी और यमलोक के बारे में बताती थी- ‘वहां पर सुई और निहान की चोरी का, हाथी और चींटी की हत्या के पाप का, रुपये-पैसे के लेन-देन में पाई-पाई का हिसाब शीशे की नाईं साफ-साफ लिखा होता है। रत्ती भर भी भूल-चूक नहीं होती…।’
माफी मांग ले बेटा, यमराज बड़े दयावान हैं। दादी ने पास आकर उसके कान में कहा तो उसे बहुत बुरा लगा।
दादी की बात अनसुनी करके उसने यमराज से कहा, “तुम लोक-यमलोक सब कुछ देखते हो तो मेरे घर को क्यों नहीं देखते ? बेशक मैंने गुनाह किया है। चलो शुक्राना नहीं, रिश्वत ली है। पर तुम सारा रिकार्ड रखते हो तो तुम्हें यह भी मालूम होगा कि मुझे तनख्वाह कितनी मिलती है। यमराज, तुम्हारी तनख्वाह इतनी हो और तुम्हारे घर में दमे का मरीज बूढ़ा बाप हो, पीलिया की शिकार बीवी हो और तीन बच्चे हों, तो गुजारा कर सकते हो ?”
यमराज हंसे। सरूपसिंह की देखी हुई धार्मिक फिल्मों के यमराजे का-सा प्यारा अट्टातहास तो उनका नहीं था, मगर क्रूरता उनकी हंसी में फिल्मी यमराजों से किसी कदर कम नहीं थी उसके मन में तत्काल एक विचार आयाः यमराज को कुछ दे-दिलाकर छुट्टी पायी जाये ? एक बार पिपलानी साहब रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गये थे, लेकिन दस हजार देकर कानून की गिरफ्त़ से साफ बच निकले थे। मगर अपना यह विचार सरूपसिंह को हवाई लगा। रिश्वत के लिए पैसा कहां है? धरती पर ही जब उसे कोई दस रुपये उधार देने वाला नहीं था, तो यहां यमराज को देने के लिए किससे लायेगा ?
अचानक उसने कहा, “यमराज, माफ़ करना, तुम काफी चतुर चालाक मालूम पड़ते हो, लेकिन मुझे यहां बुलाकर तुम गच्चा खा गये। मेरी जेबें देख लो, मैं तो एकदम खुक्ख़ल हूं। मेरी जगह पिपलानी साहब को बुलाते, सेठ धरमचंद को बुलाते या राव शमशेरसिंह को बुलाते, तब तुम्हारी अंटी गरम होती।ए.एल.एम. सरूपसिंह से तुम्हें क्या मिलेगा?”
“तुम एम.एल.ए. हो?” यमराज सिंहासन से उतरने उतरने को हो आये, लेकिन बैठे रहे।
सरूपसिंह हंसा, बोला, “लगता है, यमराज, तुम भी मेरी तरह कुपढ़ रह गये। इतने ऊंचे सिंहासन पर बैठे हो और अंग्रेजी नहीं आती ? एम.एलए. नहीं, मैं ए.एल.एम. हूं। असिस्टेंट लाइनमैन, समझे ? नहीं समझे ? कैसे समझोगे। कहते हो लोक यमलोक सबका ज्ञाता है, पर ‘साइट’ पर विजि़ट करने कभी जाते नहीं होंगे ? अफ़सर हो न ! हमारे पिपलानी साहब भी साइट पर नहीं जाते थे।”
“तुम बार-बार यह पिपलानी-पिपलानी क्या कर रहे हो?” यमराज को शायद सरूपसिंह का मज़ाक बरदाश्त नहीं हुआ। अपने भयानक चेहरे को और भी भयानक बना कर बोले, “कौन है यह पिपलानी ?”
“आहा! मैंने ठीक ही सोचा था। यमराज, तुम पिपलानी साहब को जानते होते तो जरूर मेरी जगह उन्हीं को बुलाते।” सरूपसिंह ने खुश होकर कहा, “पिपलानी साहब हमारे नये ‘एक्स.ई.एन’. हैं। एक्स.ई.एन. माने एक्जीक्यूटिव इंजीनियर। बड़े तेज आदमी हैं। उनको आये अभी छह महीने भी नहीं हुए, पर इस बीच उन्होंने डिवीजन के बारह सौ कर्मचारियों में से पांच सौ छियासी के तबादले करा दिये, तेरह कर्मचारियों को सस्पेंड करा दिया, सैकड़ों कर्मचारियों के ओवरटाइम और टी.ए. के बिल पेंडिंग फाइल निगल गयी। दो दुर्घटनाएं होते-होते टलीं और एक हुई, जिसमें एक कर्मचारी मौत के मुंह में जाते-जाते, माने यहां आते-आते रह गया। डिवीजन आफिस को गये साल जो जीप अलाट हुई थी, वह छकड़ा हो गयी। उसका उपयोग सरकारी काम के लिए कम हुआ, लेकिन चीफ इंजीनियर के कार्यालय को भेजी गयी रिपोर्ट में लिखा गया कि डीवीजन में काम युद्धस्तर पर चल रहा है…”
यमराज को लगा, सरूपसिंह कोई लंबी कहानी सुनाने जा रहा है। मगर उनके पास वक्त की कमी नहीं थी। उन्होंने सिंहासन पर पहलू बदला और गावतकिये से टिककर आराम से बैठ गये। सामने खड़े सरूपसिंह को भी उन्होंने बैठ कर कहानी कहने की इजाजत दे दी। सरूपसिंह फर्श पर बैठ गया। बैठते-बैठते उसने देखा उसकी दादी जा चुकी है।
“तो यमराज,” सरूपसिंह ने इत्मीनान से सुनाना शुरू किया, “हमारे पिपलानी साहब हफ़्ते में तीन दिन साइट पर जाते हैं, माने रिकार्ड में साइट पर जाना ही लिखा जाता है. जाते कहां हैं यह आप जानो और तीन दिन दफ़्तर में बैठते हैं। उनका स्टेनो इन तीन दिनों में ली हई डिक्टेशन अगले तीन दिनों में टाइप कर पाता है। तब तक साइट पर से लौटकर साहब का नंबर फिर दफ़्तर में बैठने का आ जाता है। लोग कहते हैं, उनका स्टेनो तबादलों, चार्जशीटों, चेतावनियों और जवाबतलबियों की चिट्ठियां टाइप करते-करते थकने लगा है और अब वह मैड्रेक्स की गोलियां खाकर दफ्तर आता है, यहां भी मैंड्रेक्स चलती है यमराज ?”
“यहां नशीली गोलियों का कोई काम नहीं। तुम यह बताओ कि तुम्हारा यह पिपलानी कर्मचारियों के पीछे इस तरह हाथ धोकर क्यों पड़ा रहता है?” यमराज ने पूछा।
सरूपसिंह ने कहा, “पिपलानी साहब बड़े यारबाश आदमी हैं यमराज। यारी दोस्ती निभाने के लिए जी-जान से हाज़िर रहते हैं और किसी साले की परवाह नहीं करते। खास तौर से कर्मचारियों की। उनके दोस्त हैं सेठ धरमचंद। ‘सर्वोदय दाल एंड आयल मिल्स’ के मालिक। बड़ी मोटी आसामी हैं सेठजी। पिछले दो चुनावों के बाद तो दानवीर कहलाने लगे हैं। नास्तिकों, माने कम्युनिस्टों के अलावा कौन-सी पार्टी है जिसको उन्होंने मुँहमांगा चंदा न दिया हो? इलाके भर में मंदिर और गौशालाएं बनवायी हैं सो अलग। विलायती और देसी दारू के कई ठेके हैं उनके। पिछले दिनों ज़हरीली शराब पीने से कई लोग मर गये। खूब हल्ला मचा। लोगों ने सेठ जी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किये। हम लोगों ने भी उन जुलूसों में हिस्सा लिया..।
बस, पिपलानी साहब नाराज हो गये। कहने लगे ऐसे देवता स्वरूप आदमी के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए तुम लोगों को शर्म आनी चाहिए। सेठजी किसी को घर से बुलाकर तो लाते नहीं कि आ ठर्रा पी और मर जा। फिर भी लोग पीते हैं और मरते हैं तो वे क्या करें ?”
यमराज मुस्कराये। सरूपसिंह का हौसला बढ़ा। बोला, “हम लोग जानते थे कि आते ही पिपलानी साहब की दोस्ती सेठ धरमचंद से कैसे हो गयी। हम पूरी ड्यूटी और ओवर टाइम करके भी तंगहाली में रहते हैं, और ज्यादा सिकुड़ते जाते हैं। मुझे ही देखो, पिछली सर्दियां मैंने अकेली इसी खाकी कमीज में बितायी है। उधर देखते ही देखते छह महीने में पिपलानी साहब की तोंद निकल आयी। उनकी सारी पतलूनें तंग पड़ गयीं। आये थे तो बस की छत पर अटैची-बिस्तर रखकर लाये थे फकत। हम सोचा करते ‘साहब के यहां ये टेलीविज़न, फ्रिज, स्कूटर, सोफे और अटरम- सटरम इतनी जल्दी कहां से पैदा हो गये? कोई लाटरी निकली है क्या ?’ राज खुला एक दिन कर्मचारी यूनियन की मीटिंग में, जब बुढ़ऊ रामकिशोर ने धागे से कान पर बंधी ऐनक संभालते हुए कहा- ये बाल मैंने धूप में धौले़ नहीं किये हैं प्रधान जी। चौंतीस साल से देख रहा हूं, कितने हाकिम आये और कितने ही गये। एक उस ‘कामरेड टाइप’ को छोड़कर क्या भला-सा नाम था उसका ? हां, अविनाश फूड इंस्पैक्टर, बस। उसे छोड़कर सबको देखा है. खाली हाथ आते हैं और जाते वक्त सामान से लदे- फदे ट्रक भरकर ले जाते हैं।
“खोल कर कहो, बात स्पष्ट नहीं हुई तुम्हारी।” यमराज ने पहलू बदलते हुए पूछा, “हो तो तुम ए एल एम पर अंगरेजी बहुत बोलते हो, यह कामरेड टाइप क्या होता है ?”
सरूपसिंह हंस पड़ा। समझ गया, यमराज या तो बन रहे हैं या बना रहे हैं। इतने कामरेड टाइप दुनिया में रोज़ मरते हैं। सब यहीं तो आते होंगे। यमराज उन्हें न जानते हों, यह नहीं हो सकता।
फिर भी उसने यमराज को बता देना ही उचित समझा। बोला, “कामरेड टाइप तो बस कामरेड टाइप ही होते हैं यमराज। समझो कि सिरफिरे होते हैं। रत्ती भर दुनियादारी उनमें नहीं होती। वह जो फूड-इंस्पैक्टर अविनाश था न, एकदम बेवकूफ था। यह जानते हुए भी कि सेठ धरमचंद के पास अपार पैसा और ताकत है उनकी दानवीरता के चर्चे राजधानी तक मशहूर हैं एम.एल.ए. और एम.पी. क्या, बड़े-बड़े मिनिस्टर उधर से गुजरते हैं तो सेठजी के दर्शन किये बिना नहीं जाते, सारे अफसर बिलानागा उनकी कोठी पर हाज़िरी देते हैं, उस मूर्ख ने सर्वोदय मिल की दाल के सेंपल भर लिये। कहने लगा, दाल में मिलावट है। सेठ जी ने समझाया- मिलावट कहां नहीं है बेटे। कलयुग का जमाना है, इंसान भी शुद्ध नहीं मिलते, तूल दाल की बात करता है? औरों को देखकर चल, ठाठ से नौकरी कर और ऐश की जिंदगी बिता ऐसी हरकतें अच्छी नहीं होतीं, समझा ?” पर अविनाश ठहरा ईमानदार की दुम। निरा जिद्दी, अड़ गया। और नतीजा ? नौकरी से गया। हैड-ऑफिस से दाल की विश्लेषण रिपोर्ट के साथ ही अविनाश के लिए चार्जशीट भी आ गयी- ‘आपके द्वारा भेजे गये सेंपल ‘स्पेसिफकेशंस’ के मुताबिक ठीक पाये गये। कारण बतायें कि क्यों न आपको एक ईमानदार और प्रतिष्ठित फर्म को परेशान करने के आरोप में सेवामुक्त कर दिया जाये…?’ अब तक अदालत के चक्कर काट रहा है। और सर्वोदय मिल की दाल आज भी धड़ल्ले से बिक रही है। बल्कि अब तो डिफेंस के सप्लाई-आर्डर भी सर्वोदय मिल को ही मिलते हैं…”
यमराज ने एक जोरदार डकार ली। जिसके साथ ही उनके चेहरे पर ऐसा भाव आया कि मानो वे सरूपसिंह द्वारा की गयी कामरेड टाइप की व्याख्या से संतुष्ट हो गये हैं। सरूपसिंह को टोककर उन्होंने कहा, “छोड़ो ऐसे किस्से हम रोज सुनते हैं। तुम तो अपने पिपलानी की कहानी सुनाओ, वह ज्यादा मजेदार है।”
“वही तो सुना रहा था।” सरूपसिंह ने कहा, “पिपलानी साहब ने शायद आने से पहले ही सेठ धरमचंद की दानवीरता के बारे में सुन रखा था। सो आते ही सबसे पहले सेठजी के दर्शन करने पहुंचे। सेठजी ने आशीर्वाद के साथ उनके कान में गुरु-मंत्र फूंक दिया- ‘मिलकर चले तो ‘फियेट’ लेकर जाओगे। स्टाफ को जरा खींचकर रखना।’ और पिपलानी साहब ने दानवीर का आदेश सिरमाथे रखकर हम लोगों को खींचकर रखना शुरू कर दिया। इसको चेतावनी, उसको चार्जशीट, एक का ट्रांसफर, दूसरे का सस्पेंशन….”
“और तम लोग चुपचाप बरदाश्त करते रहे? हमने तो सुना है कि आजकल के कर्मचारी ऐसे अफसर के खिलाफ़ तत्काल कार्रवाई शुरू का देते हैं।”
“सो कार्रवाई तो यमराज हमने भी की। एक दिन रामकिशोर ने डिवीजनल आफिस के सामने सरेआम हल्ला मचा दिया- ‘प्रधानजी अब तो जाग जाओ! छह महीने बाद तो कुंभकरण भी जाग जाता था!’ और रामकिशोर की बात का असर हुआ। कर्मचारी यूनियन की तंद्रा टूट गयी। तुरन्त नोटिस निकाला गया और उसी रात को आठ बजे ‘सबोर्डिनेट रैस्ट हाउस’ में बिजली बोर्ड वर्कर्स यूनियन का बैनर टांगकर उसकी कार्यकारिणी समिति की आपकालीन बैठक हुई। अगले दिन चौबीस घंटे के नोटिस के साथ मांग-पत्र दे दिया गया- निलंबित कर्मचारी बहाल किये जायें…तबादले रद्द किये जायें… नाजायज़ चार्जशीट वापस ली जायें…सरकारी जीप की लॉगबुक प्रतिदिन यूनियन के प्रधान से चैक करायी जाये…वगैरह-वगैरह।”
“अच्छा ! फिर ?”
“मांगें सुनकर पिपलानी साहब तिलमिला उठे।
पहले तो उन्होंने सख़्त दबका मारा। लेकिन जब कर्मचारियों में फूट डालने की साज़िश सिरे न चढ़ी तो उन्होंने ‘स्ट्रेटजी’ बदल दी। उन दिनों बिजली का अभूतपूर्व संकट था। किसानों का पलेवा न हुआ तो आगामी फसल के आसार चौपट थे। भांय-भांय करते अंधेरे जंगल में किसान रात भर जागते, पर बिजली का लट्टू चमकने का नाम न लेता। ट्यूबवैलों में लोमड़ियां अपने भट खोद रही थीं। मगर मजे की बात यह थी कि सर्वोदय मिल चौबीस घंटे चल रही थी।”
“उधर तुम लोग हड़ताल पर बैठ गये ?”
“हां, लेकिन हमने 5-5 कर्मचारियों की ‘क्रमिक भूख- हड़ताल’ की थी। थोड़े से लोग हड़ताल पर बैठे थे, बाकी सब उनका भी काम कर रहे थे। हड़ताली कर्मचारी डिवीजनल आफिस के गेट के सामने एक छोटा-सा तंबू लगाकर बैठे हुए थे। आसपास इलाके के किसान बिजली न मिलने की शिकायतें लेकर कई बार पहले भी आ चुके थे और हर बार पिपलानी साहब ने हाथ जोड़कर, अपनी असमर्थता जताकर, किसानों को समझा-बुझाकर वापस भेज दिया था। लेकिन उस दिन जब आस-पास के गांवों के साठ-सत्तर किसानों ने आकर बिजली दफ़्तर पर धरना दे दिया तो पिपलानी साहब ने पैंतरा बदला। अपने गुर्गों को अलग बुलाकर कानाफूसी की और किसानों के सामने आकर एक जोरदार भाषण देते हुए कहा, ‘हमारे पास बिजली की कमी नहीं है। लेकिन कोई आप तक पहुंचने दे तब न। यह देखिए! ये लोग गेट के बाहर धरना दिए बैठे हैं। ड्यूटी पर जाते ही नहीं। बोलिए, मैं ‘एडमिनिस्ट्रेशन’ चलाऊं या बिजली ? इनका काम तो इन्हें ही करना पड़ेगा। आपके खेत सूख रहे हैं और ये हड़ताल का रहे हैं, इस डेमोक्रेसी ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया है…’वगैरह-वगैरह।”
“आदमी होशियार मालूम पड़ता है।” यमराज ने पिपलानी की प्रशंसा करते हुए कहा। सरूपसिंह कुढ़कर रह गया। व्यंग्यपूर्वक बोला, “हां जी, वही तो होशियार होता है जो झूठ को सच बना दे।”
“फिर क्या हुआ?”
“फिर वही हुआ जो पिपलानी साहब ने चाहा था। उनके गुर्गों की बन आयी। उन्होंने किसानों की भीड़ को साथ लेकर हम हड़ताली लोगों के तंबू पर धावा बोल दिया। रस्से काट दिये, खूंटे उखाड़ फेंके। तंबू को ट्रैक्टर में लादा और ले उड़े। हम लोगों को चोटें भी आयीं।”
“ये चोटें तुम्हें उसी हादसे में आयी थीं?” यमराज ने सरूपसिंह के टूटी टांग और जली़ हुई छाती की तरफ़ अपनी मोटी और भद्दी उंगली में इशारा करते हुए पूछा।
सरूपसिंह का ध्यान अपनी चोटों की तरफ़ गया तो वह बिलबिला उठा। लेकिन अगले ही क्षण संभलकर बोला, “नहीं यमराज, ये चोटें तो बाद की हैं। उस दिन तो मामूली चोटें आयी थीं, और उस दिन पिपलानी साहब का दांव भी उल्टा पड़ा। हुआ यह कि उनके इस षड्यंत्र ने हमारे संघर्ष को एकाएक तीखा बना दिया। युनियन वालों ने तंबू ले उड़ने की घटना को ‘हको पर डाका’ करार दिया और इसकी खबर सारे डिवीजन में तेजी फैल गयी। पांच बजे तक प्रतिरोध में करीब सात सौ कर्मचारी जुट गए। दीगर महकमों के कर्मचारी भी हमारे साथ आ मिले..
“कमबख्त ! उन्हें क्या जरूरत थी दूसरों के मामले में टांग अड़ाने की?” यमराज ने क्रोधपूर्वक कहा, “लगता है, तुम्हारी दुनिया के लोगों को सबक सिखाने के लिए मुझे कुछ सख़्त कदम उठाने ही पड़ेंगे। खैर, फिर?”
“फिर क्या, एक हजार लोगों का जुलूस उपायुक्त के निवास पर जा पहुंचा और धरना देकर बैठ गया तो पुलिस को एक्स.ई.एन. पिपलानी और उनके गुर्गों के खिलाफ केस दर्ज़ करना पड़ा। भनक पड़ते ही गुर्गों ने आप-पास के गांवों की पंचायत बुला ली और मुकदमा लड़ने के लिए चंदा जमा करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन किसान अब चंदे के नाम पर लूट-लूटकर खाने वालों को पहचानने लगे हैं। कई किसान विरोध में उठ खड़े हुए, कहने लगे -“कोन्या देणी इकन्नी बी! किस तैं पूछ के उखाड़ा था टेंट ? उसमें के ट्रांसफारमर धरे थे जो बिजली ने चूस जात्ते ?” लेकिन दूसरे ही दिन यूनियन के पदाधिकारियों के हाथों में दूसरे डिवीजन के ट्रांसफर आर्डर थमा दिये गये। यह तो बाद में पता चला कि पिपलानी साहब दानवीर सेठ धरमचन्द और एम.एल.
ए. राव शमशेरसिंह को साथ लेकर रात को ही राजधानी पहुंच गये थे और ये तबादले ‘जनहित में’ मुख्यमंत्री के आदेश पर किये गये हैं…”
“शमशेर सिंह एम.एल ए. से तुम्हारे पिपलानी का क्या संबंध है ?”
“वाह यमराज ! तुम्हें यमराज किसने बना दिया! तुम्हें तो दीन-दुनिया का कुछ भी पता नहीं। राव शमशेरसिंह सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक हैं। पिछला उप-चुनाव जब उन्होंने लड़ा तो अपने पिपलानी साहब ने भी उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। राव शमशेरसिंह के समर्थन में चुनाव प्रचार के लिए उनकी सरकारी जीप तो दिन-रात दौड़ी ही थी, नकद सात हजार चुनाव-कोष में भी उन्होंने दिये थे। यों समझो यमराज, कि पिपलानी साहब ने सेवा के पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिये। रही-सही कसर वे राव साहब की सिफ़ारिश लेकर आने वालों को बिना बारी के बिजली के कनैक्शन देकर पूरी करते रहते हैं। अब राव साहब अपने भक्त पर विपदा पड़ने पर क्या इतना भी न करते ?”י
“खैर, अब तुम अपनी सुनाओ।” यमराज ने फिर पहलू बदला… तुम्हें यह चोट कैसे लगी ? बहुत बुरे कर्म करते थे क्या ? रिकार्ड निकलवाऊं तुम्हारा ?”
सरूपसिंह को अब यमराज से डर लगना बद हो गया था, उसने कहा, “रिकार्ड चाहो तो निकलवा लो, पर मैं झूठ नहीं बोलूंगा यमराज। ए.एल.एम.
एक को कभी-कभार कुछ शुक्राना मिल जाता है, सो मैंने भी लिया है। लेकिन उसकी इतनी बड़ी सज़ा सो भी जीते-जी, तो कहीं पढ़ी-सुनी नहीं मैंने?”
“फिर तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई?”
“क्या बताऊं यमराज, मैं तो अभी तक नहीं समझ पाया। मुझे तो इतना ही याद है कि एक सौ बत्तीस के. वी. पावर हाउस से कस्बे को जाने वाली एल.टी. लाइन का ‘शट-डाउन’ लेकर मैं फाल्ट ठीक कर रहा था। अचानक तेज़ धमाका हुआ। बिजली के तारों से चिंगारियां निकलीं और मैं चीखकर जमीन पर आ पड़ा। उसके बाद पता नहीं मुझे किसने उठाया और मैं कब तक बेहोश रहा। लेकिन होश में आने पर जो पहली बात मेरे कान में पड़ी वह यह कि उस लाइन का कनैक्शन पिपलानी साहब ने मुझे खबरदार किये बिना ही जुड़वा दिया था। फिर मैंने सुना कोई कह रहा था- यह भी जनसंख्या घटाने का कोई तरीका है?” और तभी पिपलानी साहब की आवाज मेरे कानों में पड़ी-‘मामूली-सी एक भूल के लिए तुम लोग इतना शोर क्यों मचा रहे हो ? अरे, काम बिजली का है तो करेंट ही लगेगा, नहीं तो क्या शहद की मक्खियां काटेंगी? इस काम में ऐसी भूलें होती रहती हैं। फिर सरूपसिंह से हमारी कोई दुश्मनी तो थी नहीं, हमसे तो सेठ धरमचंद जी ने टेलीफ़ोन पर शिक़ायत की थी कि सर्वोदय मिल बंद पड़ी है। बस, हमने ‘प्रॉम्प्ट एक्शन’ लिया और लाइन जुड़वा दी। अब हमें क्या मालूम था कि सरूपसिंह उसी लाइन पर काम कर रहा है…’
“शाबास, पिपलानी, शाबाश!” यमराज गदगद् हो उठे। फिर कहा “हमने कहा था न, आदमी होशियार मालूम पड़ता है।”
“लेकिन अब मेरे साथी भी उसकी होशियारी समझ गये हैं महाराज! मैं तो यहां चला आया, पर वे चैन से नहीं बैठे होंगे। ऐसा जबर्दस्त आंदोलन होगा कि तुम भी याद करोगे।” सरूपसिंह गुस्से में उठकर खड़ा हो गया।
“चोप्प साले ।” यमराज भी फनफना कर उठ खड़े हए. हम कुछ कह नहीं रहे, इसका मतलब है कि तू बोलता ही चला जायेगा? आंदोलन, ऐसे वक्त पर, जबकि आम चुनाव नजदीक हों, कितनी बेजा बात है। संभ्रांत वर्ग के शरीफ़ लोगों की छीछालेदर करने की छूट मैं किसी को नहीं दे सकता। ठहर, अभी तेरा फैसला करता हूं।”
सरूपसिंह ने भी तनकर कहा, “तुम क्या फैसला करोगे यमराज! मैं समझ गया, तुम्हारे यमलोक का कानून भी हमारी दुनिया के कानून जैसा ही है। तुम भी उन्हीं को मारते हो जो पहले से ही मरे पड़े हैं! लेकिन अपनी दुनिया की एक ख़बर तुम्हें सुना दूं। अब मुर्दों में भी जान आ रही है। मौत की नींद सोये हुए लोग जाग रहे हैं। और तुम देखना, अब वे तुम्हारे मारने से नहीं मरेंगे।”
“तेरी यह मजाल।” दहाड़ते हुए यमराज सरूपसिंह पर झपटे। लेकिन सरूपसिंह तैयार था। उसने प्रहार के लिए उठा हुआ यमराज का सशस्त्र हाथ कसकर पकड़ लिया…..
“एइ, एई, यह क्या। छोड़ो… डॉक्टर, पेशेंट को ‘प्रॉपर एनीस्थीसिया डोज’ नहीं दिया गया था क्या?” सिविल अस्पताल का सर्जन अपने साथी एनेस्थीसिया इंचार्ज डाक्टर से कह रहा था। और सरूपसिंह ने देखा कि वह सर्जन के चाकू वाले हाथ को कसकर पकड़े हुए उठने की कोशिश कर रहा है।
(‘कचन’ नवम्बर-दिसम्बर 1981)
———————————–
