दलित आंदोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन है : प्रो बजरंग बिहारी

दलित आंदोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन है : प्रो बजरंग बिहारी

  • जलेस फैजाबाद  इकाई ने दक्षिण और उत्तर का दलित साहित्य (एक तुलनात्मक अंतर्दृष्टि व्याख्यान आयोजित किया

अयोध्या। दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में हिंदी के प्रोफ़ेसर और प्रसिद्ध आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी का व्याख्यान ‘दक्षिण और उत्तर का दलित साहित्य (एक तुलनात्मक अंतर्दृष्टि)’ जनवादी लेखक संघ की फ़ैज़ाबाद इकाई द्वारा आयोजित किया गया। इस अवसरजले पर बोलते हुए प्रो बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि दलित आंदोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन है और महात्मा फुले तथा डॉ अंबेडकर उसके नायक हैं। दक्षिण के दलित साहित्य में बसवन्ना, अय्यंकाली, योहानन, श्री नारायण गुरु आदि स्थानीय नायक भी हैं।

उन्होंने कहा कि बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, मराठी, उड़िया, तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगू और असमिया में भी दलित साहित्य की उपस्थिति है। उनके अनुसार आंदोलन हमेशा लहर की तरह आते हैं, दलित साहित्य भी ऐसा ही आंदोलन है जो पहले के आंदोलनों से जुड़ा हुआ है। दक्षिण के दलित पैंथर आंदोलन के घोषणा पत्र के अनुसार अन्याय का सवाल किसी एक लोकेल में सीमित करके नहीं देखा जा सकता है, उसे वैश्विक मुद्दों के साथ संबद्ध करके ही देखा जाना चाहिए।

मार्क्सवाद का घोषणा पत्र आज भी दुनिया भर के अन्याय के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। आंदोलन कभी समाप्त नहीं होते बल्कि उनकी ऊर्जा आगे के आंदोलनों में शामिल हो जाती है। उनके अनुसार कन्नड़ के लेखकों ने कथ्य के साथ शिल्प के महत्व को भी रेखांकित किया और कहा कि शिल्प कथ्य का वाहक होता है।

वहीं केरल के दलितों ने मार्क्सवाद के साथ मिलकर जातिवादी ढांचा तोड़ दिया। उनके अनुसार बिना जातिगत हिंसा को समझे दलित लेखन को समझना संभव नहीं है क्योंकि सवर्ण मानसिकता के सापेक्ष समकालीन दलित लेखन में एक तरह की दार्शनिकता विकसित हुई है।

उन्होंने कहा कि नई सदी में दलित लेखन में स्त्रियों का आना हर भाषा में हुआ है, जो दलित लेखन की एक बड़ी परिघटना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अलग-अलग लड़ाई लड़ने से व्यवस्था या सत्ता का कोई नुकसान होने वाला नहीं है इसलिए आवश्यक है कि सभी तरह के शोषण के भिन्न-भिन्न स्रोतों पर सामूहिक रूप से प्रहार किया जाए।

इससे पहले कवि प्राध्यापक डॉ विशाल श्रीवास्तव ने उनका स्वागत करते हुए कहा कि प्रो बजरंग बिहारी जी ने दक्षिण के दलित साहित्य सहित पंजाबी और गुजराती के दलित साहित्य पर अत्यंत शोधपरक काम किया है। उन्होंने उत्तर और दक्षिण के दलित साहित्य के विभिन्न आयामों को रखते हुए गोष्ठी का आधार वक्तव्य प्रस्तुत किया। जलेस इकाई के अध्यक्ष मो ज़फ़र ने कहा कि प्रो बजरंग बिहारी का व्याख्यान शहर के लिए एक उपलब्धि की तरह है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि यह गोष्ठी एक यादगार दिन की तरह है, आज प्रो बजरंग बिहारी जी ने अपने व्याख्यान में समूचे भारत के दलित लेखन के परिदृश्य का भ्रमण हमें करा दिया है। उनकी अध्ययनशीलता और शोध दृष्टि आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है।

डॉ रघुवंशमणि ने कहा कि दलित आंदोलन के उन मुद्दों को रेखांकित किया गया है जो प्रायः अछूते रहे हैं। उन्होंने कहा कि व्याख्यान में दलित आंदोलन के सांस्कृतिक आधार को स्पष्ट किया गया है और यह बताया गया कि कोई साहित्यिक आंदोलन अचानक विकसित नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि डॉ अंबेडकर के लेखन के मूल में न्याय और लोकतंत्र जैसे तत्व शामिल हैं। अपना लेखन करते समय एक साहित्यकार के सामने अन्याय का विरोध मुख्य रूप से सामने रहना चाहिए।

डॉ अनुराग मिश्र ने कहा कि बजरंग बिहारी जी ने हमें हिंदीतर भारतीय भाषाओं के लेखन से परिचय कराया है और दलित लेखन से जुड़ी आलोचना की सम्यक दृष्टि विकसित की है। बिहार में प्राध्यापक डॉ अमरेन्द्र त्रिपाठी ने व्याख्यान में आए विषयों की व्यापकता की भूरि-भूरि सराहना की।

डॉ आर डी आनंद ने कहा कि दक्षिण और उत्तर का दलित साहित्य से जुड़े अत्यंत पारदर्शी और शोधपरक बातचीत आज संभव हुई है। एक सामान्य पाठक की दृष्टि से ये चीज़ें उलझी हुई लग सकती हैं लेकिन इनका महत्व असंदिग्ध है।

जनमोर्चा की संपादक सुमन गुप्ता ने कहा कि दलित साहित्य अत्यंत प्रखर है लेकिन उसकी सांप्रदायिकता के विरुद्ध कोई साफ़ समझ विकसित नहीं हो पाती है।

पूजा श्रीवास्तव ने कहा कि दक्षिण और उत्तर भारत के साहित्य में स्त्री प्रश्न एक समान रूप से उपस्थित हैं। विनीता कुशवाहा ने सवाल उठाया कि साहित्य का विभाजन क्यों आवश्यक है। नाज़िश फ़ातिमा ने मौजूदा दौर में दलित साहित्य के राजनीतिकरण पर सवाल उठाया।

शायर रामजीत यादव बेदार ने कहा कि अभी भी इन प्रश्नों पर चर्चा का साहस समाज में संभव नहीं हो पा रहा है। कार्यक्रम में गिरीश तिवारी, प्रेरणा यादव, अर्चना सिंह सहित कई श्रोताओं ने प्रश्न किए। कार्यक्रम का संचालन इकाई के कार्यकारी सचिव मुजम्मिल फ़िदा ने किया।

कार्यक्रम संयोजक सत्यभान सिंह जनवादी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि दलित साहित्य पर केंद्रित यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिसपर आज बात हो रही है। गोष्ठी की समाप्ति पर युवा कवि एडवोकेट राजीव श्रीवास्तव ने उपस्थित अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया। गोष्ठी में प्रो परेश कुमार पांडेय, वरिष्ठ कवि आशाराम जागरथ, अखिलेश सिंह, ओम प्रकाश राय, रवीन्द्र कबीर, वैदिक द्विवेदी, ऋषिक द्विवेदी, संतोष अकेला, मालती तिवारी, नीलम शुक्ला, शिवांगी शर्मा, योगेश पांडेय, रीता शर्मा, अंजनी मौर्य, सिद्धार्थ नंद सहित साहित्यसुधी और संस्कृति-समाज कर्मी मौजूद रहे।

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