कविता
सुना है…
ज़ेहरा निगाह
सुना है…
जंगलों का भी
कोई दस्तूर (नियम) होता है
सुना है…
शेर का
जब पेट भर जाए
तो वह हमला नहीं करता
दरख़्तों (पेड़ों) की
घनी छाँव तले
जाकर लेट जाता है
हवा के तेज़ झोंके
जब हिलाते हैं
दरख़्तों को
तो मैना
अपने बच्चे छोड़ कर
कौवे के अंडों को
संभाल लेती है
अपने पंखों के नीचे।
सुना है…
कोई बच्चा गिर पड़े
घोंसले से
तो पूरा जंगल
जाग उठता है
सुना है…
जंगलों का भी
कोई दस्तूर होता है
सुना है…
जब किसी नदी के
पानी में
लहरों पर थिरकता है
बया (बीजड़ा) के घोंसले का
गेहुँआ रंग
तो नदी की
रुपहली मछलियाँ
उसे मान लेती हैं
अपना पड़ोसी
कभी तूफ़ान आ जाए
कोई पुल टूट जाए
तो गिलहरी, सांप, बकरी और चीता
साथ-साथ होते हैं
किसी लकड़ी के तख्ते पर
सुना है…
जंगलों का भी
कोई दस्तूर होता है
कोई क़ानून होता है
मेरे मालिक!
बुज़ुर्गों के बुज़ुर्ग! (महानों के महान!)
अंतर्यामी!
इंसाफ़ के रहबर (मार्गदर्शक)!
अब
लागू कर
जंगलों का ही
कोई दस्तूर
कोई क़ानून
मेरे इस मुल्क में
मेरे
इस शहर में।
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