वह पीढ़ी जिसने सत्ता को झुकने पर मजबूर कर दिया

वह पीढ़ी जिसने सत्ता को झुकने पर मजबूर कर दिया

मनजीत राठी

ज़ालिम जब-जब ज़ुल्म करेगा सत्ता के हथियारों से,
चप्पा-चप्पा गूँज उठेगा इंक़लाब के नारों से।

देश के युवाओं ने ऐसे मुद्दे पर पहलकदमी ली है, जो न केवल उनके अपने भविष्य बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य को निर्धारित करेगा—शिक्षा का संकट। उनके सामूहिक संघर्ष ने यह सिद्ध कर दिया कि जब युवा नागरिक दृढ़ संकल्प और स्पष्ट उद्देश्य के साथ एकजुट होते हैं, तो निरंकुश सरकार को भी झुकना पड़ता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इस युवा पीढ़ी की प्रतिबद्धता और संघर्षशीलता को कम करके आँका। जिस प्रकार उसने करोड़ों किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों तथा समाज के अन्य वंचित वर्गों की समस्याओं की उपेक्षा की, उसी प्रकार उसने युवाओं की आकांक्षाओं को भी प्रारंभ में गंभीरता से नहीं लिया।
उनकी आवाज़ को अनसुना किया गया, उनकी मांगों का उपहास उड़ाया गया और उनमें से अनेक को “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया गया—एक ऐसा आरोप जिसने अब अपनी विश्वसनीयता लगभग खो दी है, क्योंकि सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाने वाले लगभग हर व्यक्ति और समूह पर इसका अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा है।

लेकिन विद्यार्थियों ने भय के आगे झुकने से इनकार कर दिया। उनकी एकजुटता, दृढ़ता और लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रति अटूट प्रतिबद्धता ने सरकार को पीछे हटने और उनकी मांगों को स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने लोकतंत्र के एक मूलभूत सिद्धांत की पुनर्पुष्टि की कि नागरिकों को केवल असहमति व्यक्त करने का ही नहीं, बल्कि अपनी बात सुने जाने का भी अधिकार है।
उनकी यह जीत इस तथ्य की सशक्त याद दिलाती है कि संगठित जनसंघर्ष आज भी अहंकार को चुनौती देने, जवाबदेही सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
यह आंदोलन केवल शिक्षा का आंदोलन नहीं है। यह गरिमा की बहाली, समान अवसरों, संवैधानिक अधिकारों तथा एक अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी भारत के निर्माण का संघर्ष है। इससे भी अधिक प्रेरणादायक वह अभूतपूर्व एकजुटता रही, जो इस आंदोलन के समर्थन में पूरे देश में दिखाई दी। जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, क्षेत्र और राजनीतिक विचारधारा की सीमाओं को पार करते हुए समाज के विविध तबके विद्यार्थियों के साथ खड़े हुए।

महिला संगठन, किसान आंदोलन, ट्रेड यूनियनें, कर्मचारी संगठन, छात्र संगठन, नागरिक समाज के समूह, विपक्षी राजनीतिक दल, शिक्षाविद्, लेखक, कलाकार तथा तमाम न्यायप्रिय नागरिक—सभी ने युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस संघर्ष को अपना समर्थन दिया।
व्यापक अर्थों में यह केवल विद्यार्थियों की जीत नहीं, बल्कि भारत की जनता की जीत है, जिसका नेतृत्व उसकी युवा पीढ़ी की ऊर्जा और संकल्प ने किया। इस विजय का उत्सव मनाते समय हमें उन युवा छात्र-छात्राओं को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने इस संघर्ष में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

जिन युवाओं ने अपने प्राण न्योछावर किए, उनके बलिदान ने इस आंदोलन की नैतिक नींव रखी। उनके साहस और त्याग ने हजारों अन्य युवाओं को पुलिस और प्रशासन द्वारा खड़ी की गई तमाम बाधाओं के बावजूद संघर्ष जारी रखने की प्रेरणा दी। उनके अदम्य साहस ने प्रतिरोध की उस मशाल को बुझने नहीं दिया, जब तक कि न्याय की आवाज़ को अनसुना करना संभव नहीं रह गया।

नई दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित केंद्रीय धरने सहित देशभर में हुए प्रदर्शनों में युवा महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी इस आंदोलन की सबसे प्रेरक विशेषताओं में से एक रही। उनके नेतृत्व, साहस और दृढ़ संकल्प ने एक बार फिर लोकतांत्रिक आंदोलनों में महिलाओं की परिवर्तनकारी भूमिका को रेखांकित किया।

इसके साथ ही, आंदोलनों के दौरान पुलिस की ज्यादतियों के अनेक मामलों की गंभीर और निष्पक्ष जांच तथा जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। 20 जुलाई को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, आँसू गैस और अन्य बलप्रयोग, तथा पैलेट गनों के इस्तेमाल से कई छात्रों की आँखों को गंभीर क्षति पहुँचने की घटनाएँ किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए गहरी चिंता का विषय हैं और उनकी स्पष्ट एवं कठोर निंदा की जानी चाहिए।

इससे भी अधिक चिंताजनक वे घटनाएँ हैं, जिनमें कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल युवा महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार, मारपीट, छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न किए जाने के आरोप सामने आए। ऐसे कृत्यों के लिए जिम्मेदार लोगों को कानून के अनुसार जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। कोई भी लोकतांत्रिक समाज अपनी संवैधानिक अधिकारों का शांतिपूर्वक प्रयोग कर रहे नागरिकों, विशेषकर युवा महिलाओं, के विरुद्ध हिंसा या दुर्व्यवहार को स्वीकार नहीं कर सकता।

इस आंदोलन की सामूहिक शक्ति और व्यापक एकजुटता ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मार्ग प्रशस्त किया। यह निस्संदेह एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक विजय है और भारत की शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बहाल करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम भी। किंतु यह केवल शुरुआत है।

केवल एक मंत्री के इस्तीफे से वर्षों से चली आ रही संस्थागत गिरावट की भरपाई नहीं हो सकती। यह शिक्षा और भर्ती व्यवस्था में आवश्यक व्यापक सुधारों तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में पहला कदम भर है।

समाज के विभिन्न वर्गों के अभूतपूर्व समर्थन से सशक्त हुआ यह छात्र आंदोलन शिक्षा और सार्वजनिक भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करने की आशा अवश्य जगाता है, किंतु इसका महत्व इन तात्कालिक मांगों से कहीं अधिक व्यापक है।

मूलतः यह देश के भविष्य की रक्षा का संघर्ष है—लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष, और समानता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक समावेशन जैसे संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संघर्ष। इस आंदोलन की एक और उल्लेखनीय उपलब्धि वह वैकल्पिक लोकतांत्रिक विमर्श है, जो विद्यार्थियों के धैर्य, त्याग और निरंतर संघर्ष से उभरकर सामने आया।

जंतर-मंतर पर एक महीने से अधिक समय तक उनका शांतिपूर्ण धरना और अंततः अपनी मांगों को मनवाने में सफलता इस बात का सशक्त प्रमाण है कि उन्होंने शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रतिरोध के लिए सार्वजनिक स्थानों को पुनः जनता के अधिकार में स्थापित किया।

पिछले कुछ वर्षों में सरकारी उदासीनता, असहिष्णुता और दमन के कारण ऐसे लोकतांत्रिक स्थल लगातार सिमटते गए थे। उन्हें पुनः हासिल करके विद्यार्थियों ने यह सिद्ध कर दिया कि जब नागरिक अनुशासित, शांतिपूर्ण और दृढ़ संकल्प के साथ संगठित होते हैं, तो जनता की आवाज़ सुनने से कतराने वाली सरकार को भी अंततः उनकी बात सुननी पड़ती है।

इस आंदोलन ने उस पीढ़ी की अपार लोकतांत्रिक शक्ति को भी दृश्य और प्रभावशाली बनाया, जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया, खारिज किया गया और राजनीतिक रूप से लगभग अदृश्य बना दिया गया था।

जिन युवाओं को बेरोज़गार, महत्वहीन और यहाँ तक कि अपमानजनक ढंग से “कॉकरोच” कहकर उपहास का पात्र बनाया गया, उन्होंने उसी अपमानजनक संबोधन को अपनी जिजीविषा, आत्मसम्मान और सामूहिक शक्ति के प्रतीक में बदल दिया।

जिस पीढ़ी से चुप रहने की अपेक्षा की जा रही थी, उसी ने साहस, आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक चेतना के साथ अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई। उसने सत्ता में बैठे लोगों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि जिन्हें लगातार अनदेखा किया जाता है या अपमानित किया जाता है, उन्हें हमेशा के लिए चुप नहीं कराया जा सकता।

जब लोग संगठित होते हैं, संघर्ष में डटे रहते हैं और सामूहिक रूप से आगे बढ़ते हैं, तो वे ऐसी शक्ति बन जाते हैं जिसे कोई भी सरकार नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। इस लोकतांत्रिक प्रतिरोध ने सत्ता के अहंकार पर जो चोट की है, वह इतनी जल्दी भरने वाली नहीं है।

यह इस बात की स्थायी याद दिलाती रहेगी कि जनता की आवाज़ को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता और संगठित युवा नागरिक किसी भी सरकार को जवाबदेह बनाने की क्षमता रखते हैं।

इस आंदोलन की एक और महत्वपूर्ण विरासत भय की राजनीति का निर्णायक प्रतिरोध है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह रही कि युवाओं ने राज्य दमन की धमकियों के सामने झुकने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

पिछले कई वर्षों में शिक्षा सुधारों की मांग करने वाले छात्र आंदोलनों से लेकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध तक, छात्र-युवा आंदोलनों को लगातार दमन, लंबी गिरफ्तारियों और आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ा है। उस दमन के दुष्परिणाम आज भी बने हुए हैं।

अनेक युवा कार्यकर्ताओं पर आज भी यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत मुकदमे चल रहे हैं, जबकि कुछ अब भी जेलों में बंद हैं और ठोस साक्ष्यों के अभाव के बावजूद उन्हें बार-बार जमानत से वंचित किया गया है। ऐसी परिस्थितियों में वर्तमान आंदोलन ने असाधारण साहस, धैर्य और दृढ़ता का परिचय दिया।

पुलिस कार्रवाई, धमकियों और आंदोलन को बदनाम करने के निरंतर प्रयासों के बावजूद विद्यार्थी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण संघर्ष के अपने संकल्प पर अडिग रहे। उन्होंने सरकार द्वारा असहमति व्यक्त करने वालों को “राष्ट्र-विरोधी” बताने की राजनीति को निर्णायक रूप से चुनौती दी।
इसके विपरीत, उन्होंने एक नया और सशक्त लोकतांत्रिक विमर्श स्थापित किया कि अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना, संविधान के मूल्यों की रक्षा करना और सत्ता से सवाल पूछना ही सच्ची देशभक्ति तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।

यह आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक और राजनीतिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तन का भी संकेत देता है। विद्यार्थियों ने जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र और सामाजिक पदानुक्रम की सभी दीवारों को पार करते हुए संविधान की “विविधता में एकता” की भावना को जीवंत रूप दिया।

आंदोलन के दौरान इस्तेमाल किए गए पोस्टर, नारे, बैनर आदि इस बात का प्रतीक हैं- जैसे कि: “आवाज़ दो, हम एक हैं”, “हिन्दू–मुस्लिम,सिख, ईसाई साथ-साथ, शिक्षा हमारा लोकतांत्रिक अधिकार।” उन्होंने नफ़रत और ध्रुवीकरण की राजनीति को अस्वीकार करते हुए साझा उद्देश्य के लिए अभूतपूर्व एकता का परिचय दिया। उनका यह सामूहिक संकल्प इस सत्य की पुनर्पुष्टि करता है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की सबसे बड़ी शक्ति बहिष्कार नहीं, बल्कि समावेशिता में निहित होती है।

ऐसे समय में जब दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समुदायों पर हमले और भेदभाव जारी हैं, विद्यार्थियों ने भारत की एक वैकल्पिक कल्पना प्रस्तुत की—ऐसा भारत जो समानता, बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय पर आधारित हो।

इससे पहले हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन की तरह इस संघर्ष ने भी ऐसे प्रेरक दृश्य प्रस्तुत किए, जहाँ विभिन्न जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के लोग एक साथ रहते, भोजन करते, संवाद करते और संघर्ष करते दिखाई दिए।

ये केवल विरोध-प्रदर्शन के दृश्य नहीं थे, बल्कि संविधान में निहित भारत की उस परिकल्पना की सजीव अभिव्यक्ति थे, जिसे हम एक लोकतांत्रिक, समतामूलक और समावेशी राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं।

इस दृष्टि से यह आंदोलन केवल कुछ तात्कालिक मांगों की स्वीकृति तक सीमित नहीं रहा। इसने सामूहिक संघर्ष में जनता का विश्वास पुनर्जीवित किया, लोकतांत्रिक प्रतिरोध के लिए सार्वजनिक स्थानों को पुनः खोला और पूरे देश की कल्पना तथा चेतना को नई दिशा दी।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसने सिद्ध कर दिया कि आज की युवा पीढ़ी ऐसे भारत की कल्पना ही नहीं कर सकती, बल्कि उसके निर्माण के लिए संघर्ष भी कर सकती है, जो अधिक समावेशी, संवेदनशील, लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण हो—उस संकीर्ण और विभाजनकारी राजनीति से कहीं बड़ा, जिसने पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी है।

अब जबकि वर्षों से कुंठा और आक्रोश से भरी युवा पीढ़ी के भीतर जमा दबाव का ढक्कन खुल चुका है, यह संघर्ष अपनी तात्कालिक मांगों से आगे बढ़कर भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ेगा। इस आंदोलन का प्रभाव संभवतः वर्तमान सरकार की अपेक्षाओं से कहीं अधिक गहरा और दीर्घकालिक सिद्ध होगा।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि टेलीविजन मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इस ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान लगभग पूर्ण मौन धारण किए रखा। न तो उसने इस संघर्ष को वह गंभीरता दी जिसका वह अधिकारी था और न ही विद्यार्थियों द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर सार्थक सार्वजनिक बहस आयोजित की।

जो चैनल सामान्य और तुच्छ घटनाओं पर घंटों चर्चा करते हैं, वे करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े इस आंदोलन को लगभग अनदेखा करते रहे। इस प्रकार उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा निर्मित वैकल्पिक लोकतांत्रिक विमर्श को दबाने अथवा मिटाने का प्रयास किया। चाहे यह संपादकीय पूर्वाग्रह का परिणाम हो या सत्ता के प्रति अत्यधिक निष्ठा का, अंततः वे इस प्रयास में असफल रहे। यही किसी वास्तविक जनआंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

इसके विपरीत, अनेक स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों, यूट्यूब चैनलों, सोशल मीडिया रचनाकारों तथा प्रिंट मीडिया के एक हिस्से ने साहस और निष्पक्षता के साथ इस आंदोलन को जनता तक पहुँचाया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि विद्यार्थियों की आवाज़ पूरे देश तक पहुँचे। उनके कार्य ने यह सिद्ध किया कि एक स्वतंत्र, निर्भीक और उत्तरदायी मीडिया किसी भी जीवंत लोकतंत्र का अनिवार्य आधार है।

संभवतः स्वतंत्र डिजिटल मीडिया का यही बढ़ता प्रभाव सरकार को असहज कर रहा है। यही कारण है कि वह सूचना प्रौद्योगिकी कानून तथा डिजिटल मीडिया से संबंधित नियमों में अधिक कठोर और नियंत्रणकारी संशोधनों के माध्यम से उस पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही है।
किंतु विद्यार्थियों के इस आंदोलन ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सत्य को दबाया या अनदेखा किया जा सकता है, किंतु समाप्त नहीं किया जा सकता। जब सत्य को संगठित जनशक्ति का साथ मिल जाता है, तब उसे खामोश कर पाना किसी भी सत्ता के लिए संभव नहीं रह जाता।
अब जबकि भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ चुकी है, चुनौती इस आंदोलन की ऊर्जा को एक ठोस सुधार-कार्यक्रम में बदलने की है। इस संघर्ष ने केवल प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं को ही उजागर नहीं किया, बल्कि शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और सबसे बढ़कर शासन प्रणाली में वर्षों से व्याप्त गहरे संस्थागत भ्रष्टाचार और विफलताओं को भी सामने ला दिया है।

जवाबदेही तय करना पहला कदम है, किंतु व्यापक सुधारों की रूपरेखा तैयार करना और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना कहीं अधिक जटिल, परंतु उतना ही आवश्यक और पूरी तरह संभव कार्य है। विद्यार्थियों ने परिवर्तन का एक दूरदर्शी, सामाजिक रूप से उत्तरदायी और रचनात्मक एजेंडा प्रस्तुत किया है।

उनकी आकांक्षाएँ केवल सरकार द्वारा किए जाने वाले तात्कालिक नुकसान-नियंत्रण या प्रतीकात्मक कदमों तक सीमित नहीं हैं। वे ऐसे संरचनात्मक सुधार चाहते हैं जो संकट की जड़ों पर प्रहार करें।
इनमें परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार तथा अपारदर्शिता का उन्मूलन, शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण और निजी कोचिंग उद्योग के अनियंत्रित विस्तार पर रोक, प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठ्यक्रम के सांप्रदायिकीकरण का प्रतिरोध, सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों को सुदृढ़ बनाना तथा सभी वर्गों के लिए पारदर्शी, न्यायसंगत और जवाबदेह शिक्षा व्यवस्था का निर्माण शामिल है।

इस आंदोलन से उत्पन्न ऊर्जा और जनसमर्थन को किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होने देना चाहिए। परिवर्तन का यह चक्र लगातार आगे बढ़ना चाहिए ताकि शिक्षा के अवसरों का विस्तार हो, सामाजिक न्याय को सुदृढ़ किया जा सके और समाज के सबसे वंचित वर्गों के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के वादे को वास्तविक रूप दिया जा सके।
आंदोलन के एक प्रतिभागी ने बिल्कुल सही कहा, कि यह एक ऐतिहासिक मोड़ (Watershed Moment) है। आने वाले वर्षों में युवा जिस प्रकार राज्य, जनप्रतिनिधियों, सार्वजनिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से संवाद करेंगे, वही केवल शिक्षा का भविष्य ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दिशा भी निर्धारित करेगा।

इसलिए इस आंदोलन की गति को बनाए रखना और इसे शासन तथा सार्वजनिक नीति के प्रत्येक स्तर पर सार्थक और ठोस सुधारों में रूपांतरित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

अंत में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा, रोजगार, लोकतांत्रिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता के संघर्ष एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब तक महिलाओं को समान राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक लोकतंत्र वास्तव में प्रतिनिधिक नहीं बन सकता। महिलाओं के लिए विधायिकाओं में आरक्षण का संघर्ष लगभग तीन दशकों से जारी है।

1996 में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार संसद में प्रस्तुत किए जाने के बाद से महिला संगठनों और लोकतांत्रिक आंदोलनों ने महिलाओं की न्यायोचित हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए अनगिनत अभियान और जनआंदोलन चलाए हैं। यद्यपि 2023 में महिला आरक्षण विधेयक अंततः कानून बन गया, लेकिन इसकी प्रभावी क्रियान्विति को जनगणना और परिसीमन जैसी शर्तों से जोड़कर अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया है।

इसीलिए देशभर के महिला संगठनों, नेटवर्कों और नागरिक समाज समूहों के राष्ट्रीय गठबंधन ने इन शर्तों को हटाकर महिला आरक्षण कानून को तत्काल लागू करने की मांग को लेकर एकजुट अभियान छेड़ा है। 20 जुलाई से यह गठबंधन जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना दे रहा है—उसी लोकतांत्रिक स्थल पर, जिसे छात्र आंदोलन ने अपने संघर्ष के बल पर पुनः जनता के लिए हासिल किया है।

यह मात्र एक संयोग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संघर्षों की निरंतरता और सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। हम युवा शक्ति से इस अभियान के समर्थन का आह्वान करते हैं। जिस प्रकार देश के युवाओं ने यह सिद्ध किया कि संगठित और दृढ़ जनसंघर्ष किसी भी सरकार को जनता की आवाज़ सुनने के लिए विवश कर सकता है, उसी प्रकार हमें विश्वास है कि व्यापक जनसमर्थन महिला आरक्षण कानून को बिना किसी शर्त के तत्काल लागू कराने में भी सफल होगा।

मीम्स, व्यंग्य और युवाओं की सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के साथ डिजिटल दुनिया में शुरू हुआ यह आंदोलन देखते ही देखते हाल के वर्षों के उल्लेखनीय लोकतांत्रिक जनआंदोलनों में बदल गया। इसने पूरे देश को यह याद दिलाया कि लोकतंत्र तभी जीवित और सशक्त रह सकता है, जब नागरिक अपनी आवाज़ को दबने या छिनने न दें।

विद्यार्थियों ने केवल जंतर-मंतर को ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति के विचार और उसके सार्वजनिक अधिकार को भी पुनः स्थापित किया। उन्होंने उपहास को प्रतिरोध में, भय को साहस में और बिखराव को व्यापक एकजुटता में बदल दिया। उनका संघर्ष भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक नए अध्याय का उद्घाटन करता है।

निस्संदेह, मंज़िल अभी दूर है और संघर्ष अभी अधूरा है। फिर भी एक सत्य अब निर्विवाद रूप से हमारे सामने है—भविष्य उन्हीं युवाओं का है जो सपने देखने का साहस रखते हैं, संगठित होते हैं, सत्ता से सवाल पूछते हैं और समाज को अधिक न्यायपूर्ण, समतामूलक, लोकतांत्रिक, संवेदनशील तथा मानवीय बनाने के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं। मशहूर शायर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की सदाबहार पंक्तियाँ याद आती हैं:
यूं ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से खल्क
न उन की रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है, न अपनी जीत नई।

मनजीत राठी सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *