भारत की मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़ी राजनीतिक पार्टियों की तीन ऐतिहासिक भूलें

भारत की मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़ी राजनीतिक पार्टियों की तीन ऐतिहासिक भूलें

राम किशोर मेहता

यह सच है कि साम्यवाद यूरोप के पूँजीवादी इंडस्ट्रियल समाज में पैदा हुआ, विकसित हुआ। उस समाज के विभाजन का मूल आधार अर्थ था जिसे वर्ग विभाजन कहा गया है। दूसरा विभाजन का आधार धर्म (अपनी रूढियों और अंध विश्वासों के साथ) तथा वैज्ञानिक चेतना से संपन्न लोगों के बीच था। तीसरा विभाजन सामन्तों और प्रजा के बीच। दास प्रथा यहाँ समाप्त हो चुकी थी। मालिक व दास का विभाजन लगभग वर्ग विभाजन मे परिवर्तित हो चुका था। वैज्ञानिक चेतना ओद्योगिक विकास के साथ धार्मिक तथा सामंतवादी विभाजन प्रभाव हीन हो चुके थे। प्रभावी विभाजन वर्ग विभाजन था। धनाढ्यों और दरिद्रों के बीच का विभाजन। पूँजीपतियों और कामगारों के बीच का विभाजन।
भारत में साम्यवाद का विचार लगभग कार्ल मार्क्स के जीवन काल में प्रवेश कर चुका था. परन्तु यह आयातित विचार ही बना रहा। इसका कारण भारतीय समाज में विभाजन यूरोपीय विभाजन से अपने आधारभूत ढाँचे में यूरोपीय ढाँचे से इतर था । यद्यपि वर्गीय – आर्थिक, धार्मिक, और सामंतिक विभाजन इस समाज में भी उपस्थित थे परन्तु वर्णं – जातिगत विभाजन बहुत सशक्त और प्रभावी था और अभी तक भी है।
यूरोप में विकसित साम्यवाद भारत के इस विभाजन के उन्मूलन का कोई उत्तर खोज नहीं पाया। हमारे यहाँ वर्ण और वर्ग का विभाजन समानान्तर तो है पर एक रेखीय नहीं। उच्च वर्ण अधिकतर उच्च या मध्यम वर्गीय हैं। इनके पास धर्मसत्ता, राजसत्ता और धन सत्ता है। निम्न वर्ण (शूद्र अति शूद्र, अछूत, आदिवासी) दलित , पिछड़े अधिकतर निम्न वर्ग में हैं और किसी भी प्रकार की सत्ता से वंचित है.
हमारे यहाँ जाति हर व्यक्ति के माथे पर लिखी होती है। हमारे समाज में किसी आदमी का सब कुछ जा सकता है पर उसके माथे पर लिखी जाति नहीं जा सकती।
भारत में साम्यवादी अपने आप को डीक्लास तो कर पाए पर डीकास्ट नहीं। उनकी जाति उनके नाम के साथ चिपकी रह गई। जो गहृरे आपसी अविश्वास का कारण बनी। यह अविश्वास आपस में प्रकट तो नहीं हुआ पर गया भी नहीं। यही कारण रहा कि शूद्र अतिशूद्र( अछूत ) दलित आदिवासी पिछड़े एन्मास – सामूहिक रूप साम्यवादी नहीं बने यद्यपि वर्ग के रूप में स्वभाविक तौर पर ऐसा होना चाहिए था।
भारतीय साम्यवादी राजनीतिक दलों और अनुषांगिक संगठनों के शीर्ष नेतृत्व ने इस असफलता को खुले मन से स्वीकार नहीं किया। जब भी सवाल किया गया हमेशा सफाई देते नजर आए।
अस्मिता के प्रश्नों को कभी हल नहीं कर पाए. ओमप्रकाश वाल्मीकि के उपन्यास ‘जूठन ‘और कविता ‘ठाकुर का कुँआ: में उठे अस्मिता के प्रश्न आज भी खड़े हैं.
हम डा भीम राव अम्बेडकर और उनके अनुयायी से आज भी अलग हैं जबकि यह बहुत बड़ा जन समूह है। हमने प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्था को चुना है।
1. यह हमारी ( वामपंथियों की) सबसे पहली, सबसे बड़ी असफलता हैं। We have missed the bus
2. प्रदेशों में सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टियों में हम निष्कलंक थे लेकिन भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना के आंदोलन को भाजपाइयों और छद्म भाजपाइयों ने हथिया लिया और बाद में सोने की तस्तरी में रख कर भ्रष्ट भाजपाइयों के आगे परोस दिया और भ्रष्टाचार से मुक्त वाम हाथ मलता रह गया। हम जनता के मन को हमझ ही नहीं पाए। अति आत्मविश्वास में रह गए। This was the second bus we missed।
3. करोड़ो युवाओं के तिलचट्टिया आन्दोलन को हमें दोनों हाथों से अपने सीने से लगा उनसे जूड़ जाना चाहिए था । हम :वेट एण्ड वाच ‘ की नीति अपना उसे भी खो देने की राह पर चल रहें हैं। Are we going to miss the third bus too.

यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *