प्रो अमृतलाल मदान की कविता- दो जगत

कविता

दो जगत

 

प्रो. अमृतलाल मदान

 

1

भाव जगत अब जीर्ण-शीर्ण है

बाह्य जगत ही बस बलवान

एक में घुस पैठे काकरोच

दूजे की बुलडोज़र शान।

लुप्त हुईं ज्यों मृदुल मधुर सी

वाणी की ध्वनियां औ’ स्वर

अब तो कर्कश वाक् बाण हैं

हियरा छिदता आठ पहर।

————

 

2

 

द्रवित हूं मैं नित देख देख कर

 

मन की सलिलाएं सूखी

अहंभाव ही हावी पल पल

नज़रें सब रूठीं रूखी।

तर्क कुतर्क और वितर्कों का

डंका बजता है हर ओर

अनुभूति बिचारी डंक ही सहती

गीले रहते नयन के छोर।

मम-हम‌ मेरा मेरी की रट

त्याग भावना मरी मरी

छीना-झपटी, सीनाज़ोरी

जन-हित शपथें ताक धरी।

मर्म व ममता आहत थल जल

धर्म तो ज्यों रणघोष हुए

रिक्त-रिक्त संतोष कोष सब

चाहे मुद्रा कोश भरे।।

One thought on “प्रो अमृतलाल मदान की कविता- दो जगत

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    डॉ अमृतलाल मदन की दोनों कविताओं में आज के दौर का यथार्थ चित्रण किया गया है। इनमें बुजुर्ग पीढ़ी का अफसोस भी है और पश्चाताप भी है कि हमने ऐसे दौर की कल्पना तो नहीं की थी। विडम्बना यही है कि हमारा अंतस सूख गया है,कठोर हो गया है,भावनाएं मर गई है और वहां बस क्षुद्र स्वार्थ की आपा-धापी मची हुई है! ऐसे में क्या कोई समाज सुखी और स्वस्थ रह सकता है? कवि की मुख्य चिंता यही है।

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