मनमीत सोनी की कविता – कुमार विश्वास जी

कविता

कुमार विश्वास जी!

मनमीत सोनी

मैंने आपका घर यू ट्यूब पर देखा
आपने अपने घर में
अपने प्यारे कुत्ते “शैडो” की याद में
बनवाई है बस्तर के एक कलाकार से लकड़ी की प्रतिमा

होना तो यह चाहिए था
मैं आपकी शान ओ’ शौकत देखकर
जलन से भर जाता

लेकिन मैं
उन लोगों की याद में डूब गया
जिनका मेरे पास नाखून तक नहीं है!

मैं
साहिर लुधियानवी की तरह
“ताजमहल” को देखकर यह कहने वालों में नहीं हूँ :

“इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल /
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़”

शाहजहां बनवा सकता था “ताजमहल”
कुमार विश्वास बनवा सकते हैं “शेडो” की प्रतिमा
लेकिन मनमीतों के पास
अभी भी नहीं है यह गुंजाइश
कि स्वर्गीय दादा धर्मचंद सोनी की याद में बनवा सकें एक प्याऊ तक :

कि पुण्य पर आज भी
बुर्जुआओं का कब्ज़ा है
हम तो दो पंखे दे सकते हैं दान में
और
उन पर लिखवा सकते हैं :

“स्वर्गीय धर्मचंद सोनी की स्मृति में
उनके पौत्र मनमीत सोनी द्वारा विद्यालय को भेंट”

कुमार विश्वास जी!

बना दिया होगा आपने कविता को “पेइंग”
रात-रात भर होते होंगे कवि सम्मेलन
लेकिन उठ सी गई है कविता की आत्मा
यह तेज़ रौशनियों के झपके यह इत्रों के भभके
यह सुंदर कवयित्रियां यह “स्पोंटेनियस” चुटकुले
इनमें दम घुटता है उनका
जिनका जीवन तबाह है कविता के पीछे

लेकिन कौन रोके आपको
लेकिन कौन टोके आपको

कला भी ढूंढ़ने लगी है अब अमीर चेहरा
अभी भी है सच बयानी पर घना पहरा!

क्या मुझे सचमुच यह लालच होना चाहिए
कि मैं पढूं “केवी स्टूडियो” में कविता
या मुझे ललकारना चाहिए आपको
सीकर के एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाते हुए
कि उन मंचों पर नहीं है कविता
कविता तो है उस बच्ची के दिल में
जो बनाकर लाई है कॉलेज के पहले दिन यह पोस्टर :

“छोड़िये तम्बाकू / आक थू / आक थू”

कुमार विश्वास जी!

हम कवि लोग कौन हैं
क्या हम “शेडो” ही नहीं है
किसी बुर्जुआ की बनाई हुई कुत्ते की प्रतिमा
किसी बुर्जुआ के आगे पीछे दुम हिलाते घूमते हुए

कुमार विश्वास जी!

इस पांच मंज़िले मकान में
ऐसा कौन सा कमरा है
जो है उपेक्षित कवियों के लिए

ऐसी कौनसी बालकनी है
जहाँ सत्ता के खिलाफ़ लिखने वाला कवि
पा सके दो वक़्त की रोटी

ऐसा कौनसा कोना है
जहाँ ख़ून ए जिगर जलाने वाला कोई कवि
पी सके घूँट दो घूँट शराब

मैं फिर कह रहा हूँ
जलता नहीं हूँ आपसे
लेकिन मेरा घर मेरे दिल से और मेरा दिल आपके घर से बहुत बड़ा है!

यह “शेडो” नाम का कुत्ता
अभी कई दिनों तक मेरे स्वप्न में आएगा
यह मुझे याद दिलाएगा
कि कुत्ता बना दिया है इस व्यवस्था ने हमें

सरकारों से नहीं
इस पूरे समाज से हूँ सम्बोधित

पैसे नहीं
एक ऊंचाई मांगता हूँ दुनिया से

एक आवारा मसीहा है
मेरे भीतर
जो सच की सूली पर शहीद होने को है आतुर

एक ब्रह्मराक्षस है
जो मेरी आत्मा को हाँट करता है

कोई है
जो चक्कर काटता है लगातार लगातार
मेरे घर के
अँधेरे कमरे में

एक बादल है
जो घिरता है
ठीक मेरे सर के ऊपर
बरसता नहीं लेकिन

एक देवी है कहीं
जिसे मैं चढ़ा देना चाहता हूँ
अपने राजीव लोचन!

बाहर आओ
बाहर आओ कवि
अपने घर से बाहर आओ

मैं
सबसे कहता फिर रहा हूँ
बाहर आओ

अगर हम कुत्ते भी हैं
तो उन तिजोरियों की सुरक्षा में न्यस्त क्यों रहें
जिनमें कैद है
गरीबों का ख़ून पसीना

क्या हमें भौंकना और काटना नहीं चाहिए!

कुमार विश्वास जी!

आपका मरा हुआ कुत्ता भी
एक समकालीन कवि से अधिक व्यूज पाता है

मैं
इस फ़र्क़ को ख़त्म कर देना चाहता हूँ

एक दिन आएगा
जब कुत्ते नहीं रह जाएंगे कवि

कुत्तों का फर्ज़ है
वे उन पर भी भौंकना सीखें
जिन्हें वहम है कि कुत्तों को रिश्वत खिलाई जा सकती है!

अच्छा हुआ कि मैंने आपका घर देखा
अच्छा हुआ कि मैंने देखी “शेडो” की प्रतिमा
अच्छा हुआ कि मुझे मालूम हुआ
कुत्ता पालना तो दूर
कुत्ते की प्रतिमा का बजट भी नहीं मेरे पास
अच्छा हुआ कि यह संकल्प हुआ मज़बूत :

“कुत्ता नहीं बनना है
और बनना है
तो भौकने और काटने वाला कुत्ता बनना है”

काश!

मैं
इस व्यवस्था के
कुछ कमीनों को काट सकूं
और वे पानी देख कर डरने लगें –

और आख़िर में
सड़कर
डूब मरें चुल्लू भर पानी में!

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