डा. स्वराजबीर की कविता – हम कॉकरोच हैं

कविता

हम कॉकरोच हैं

डा. स्वराजबीर

 

हम कॉकरोच हैं
नौजवान हैं, मचलती हुई सोच हैं
निज़ाम के पैरों में आई हुई मोच हैं
हम कॉकरोच हैं

बेरोजगार हैं
दिशाहीन हैं उलार हैं
टूटे हुए करार हैं
घर परिवारों की हार हैं
जीवन अभिलाषी लोच हैं
हम कॉकरोच हैं

गरैगर समसा 1
कभी तुम भी कॉकरोच बने थे
नकार दिया सभी ने
पिता ने, बहन ने, भाई ने
समूचे समाज ने
सरमाए के राज ने
हम भी नकारे गए हैं

कौन कहता है यह?
कौन न्यायाधीश
कौन सियासतदान
कौन दे रहा शब्दों का वरदान

यह बात अलग है
लोरका 2 ने कभी शायर-कॉकरोच दर्शाया था
या कॉकरोच-शायर
ब्रह्मांड का हिस्सा है कॉकरोच
समझता है मनुष्य उन्हें अपना दुश्मन
मिटा देना चाहता है हस्ती उनकी
निज़ाम भी चाहता,
बेरोजगारी नहीं
बेरोजगारों की हस्ती मिटाना
उन्हें कॉकरोच कहना
लोरका या काफ़्का की तरह नहीं
विज्ञापनों में
दहकती नजरें
जो रसोई में चीखतीं
और रसायनों से कॉकरोच मारतीं

हाँ, जज साहब
हम कॉकरोच हैं
समाज के अन्धेरे कोनों में
अपनी हस्ती छिपाते, बचाते
गिरते, लड़ते, डरते
पल-पल समझौते करते
खड़े होते ओर चलते
अन्धेरे मोड़ मुड़ते
कुचले जाते, गुम होते
खुदकशी करते
हम कॉकरोच हैं

हम कॉकरोच हैं और मनुष्य हैं
‘बलळदे रुख्ख’3 हैं
भविष्य की सुलगती कोख हैं
और हमें जीना है
जज साहब
आपके शब्दों में नहीं
इनकी बेहूदगी के खिलाफ
आग बनकर
मशाल बनकर
जीने की राह बनकर
आपके शब्दों ने
आपके होठों पर बुदबुदाते रहना है
इन शब्दों ने
बार-बार आपको यही कहना है
आप मनुष्य नहीं कुछ और हैं
मनुष्य न होने की तासीर हो
निर्दयता की तस्वीर हो।

1. फ्रांज काफ़्का के उपन्यास ‘दि मैटामारफोसिस’ का नायक गरैगर समसा जो एक सुबह सहसा अपने आपको कॉकरोच में बदल लेता है।
2. फ्रैडरिको लोरका के उपन्यास ‘दि बटरफ्लाई’ में एक घायल तितली और नौजवान कॉकरोच शायर की असंभव प्रेम-कहानी बताई गई है।
3. ‘बळदा रुख्ख हाँ’ रचना सुरजीत पातj की है, जिसका अर्थ है जलता हुआ वृक्ष ।

पंजाबी से हिन्दी रूपांतरण : उर्मिल मोंगा (जीरकपुर), गुरजिन्दर सिंह बड़ाना            (डेराबस्सी)

अनुवादक द्वय- उर्मिल मोंगा और गुरजिंदर सिंह बड़ाना

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