अभी दो दिन पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI ) सूर्यकांत ने एक वकील के मामले की सुनवाई के दौरान युवा वर्ग (कुछ युवा जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे वकील, पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता, सोसल मीडिया पत्रकार बन जाते हैं)। ऐसे युवा कॉक्रोच, परजीवी…. होते हैं। न्यायमूर्ति की इस मौखिक टिप्पणी उर तीखी प्रतिक्रिया आई। इसके बाद सीजेआई ने सफाई दी है और कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने उनकी टिप्पणी को गलत समझा, वह तो फर्जी डिग्री लेकर वकील बने युवाओं के बारे में कह रहे थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की टिप्पणी पर आई दो टिप्पणियां दे रहा हूं ताकि लोगों का ग़ुस्सा समझ में आ सके।
कॉकरोच, परजीवी और न्याय का स्टोररूम
त्रिभुवन
देश में न्याय बहुत पवित्र चीज़ है, मी लॉर्ड। इतनी कि उसके बारे में सवाल पूछो तो पहले तुम्हारी जाति नहीं, तुम्हारी प्रजाति तय की जाती है : तुम नागरिक नहीं हो, कॉकरोच हो! तुम सूचना माँगते हो, परजीवी हो!! तुम पत्रकार हो, सिस्टम पर हमला करने वाला कीड़ा हो!!! तुम वक़ील हो, तुम भी कॉकरोच और पैरासाइट हो!!!
मी लॉर्ड, आपने हमारे लोकतंत्र की बड़ी वैज्ञानिक प्रगति करवा दी है। पहले अदालतें मनुष्य को न्याय देती थीं, अब पहले उसे जीव-विज्ञान की श्रेणी में रखती हैं। कोई आदमी RTI डाल दे तो वह नागरिक नहीं रहता, पारदर्शिता का रोगाणु हो जाता है। कोई पत्रकार पूछ ले कि साहब, स्टोररूम में धुआँ कहाँ से उठा और नोटों में आग कैसे लगी तो वह प्रेस का आदमी नहीं, फिनायल से भी न मरने वाला टर्माइट है।
और देखिए, यह बात किसी मुहल्ले के चायवाले ने नहीं कही। यह उस ऊँचाई से आई है, जहाँ से संविधान दिखना चाहिए था।
सीजेआई साहब ने कहा : बेरोज़गार युवा “cockroaches” जैसे हैं; कुछ “media”, कुछ “social media”, कुछ “RTI activists” बन जाते हैं और सब पर हमला करने लगते हैं। यानी ये सब “parasites of society” हैं।
अब प्रश्न यह है कि यदि RTI कार्यकर्ता कॉकरोच हैं तो वे किस रसोई में पाए जाते हैं? मी लॉर्ड, वे वहाँ पाए जाते हैं, जहाँ बंद अलमारियों में फ़ाइलें सड़ती हैं, जहाँ नियुक्तियों के पीछे नोटिंग छिपती है, जहाँ “इन-हाउस” जांच का अर्थ होता है घर में आग लगी, घर वालों ने जांच की, घर वालों ने रिपोर्ट बनाई और जनता से कहा : तुम बाहर रहो, तुम तो परजीवी हो।
न्यायपालिका की गरिमा पर जनता को भरोसा होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए। लेकिन भरोसा कोई कोर्ट-फ़ीस लगाकर खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं है, मी लॉर्ड। भरोसा पारदर्शिता से पैदा होता है, मी लॉर्ड; डाँट से नहीं। भरोसा तब बढ़ता है जब गाजियाबाद PF घोटाले जैसे मामलों में जनता को पता चले कि जिला अदालत के कर्मचारियों के भविष्य-निधि से 6.58 करोड़ रुपये की कथित अवैध निकासी कैसे हुई और रिपोर्टों में किन-किन न्यायिक नामों का उल्लेख हुआ। उस मामले में CBI रिपोर्टों ने 24 न्यायाधीशों तक की भूमिका मिसकंडक्ट की बात कही थी, हालांकि अभियोजन योग्य प्रमाण और कार्रवाई के प्रश्न अलग रहे। मी लॉर्ड, उनके लिए भी कोई उपमा दे दीजिए। उधर की गली में भी तो कोई प्राणी लीच होगा? कोई वल्चर होगा?
लेकिन मी लॉर्ड, भरोसा तब बनता है जब “कैश-एट-जज्स-डोर” में 15 लाख रुपये की थैली ग़लत दरवाज़े पर पहुँच जाने की कहानी पर जनता को यह न लगे कि रिश्वत भी कभी-कभी डाकिये की ग़लती से पकड़ी जाती है। जस्टिस उस मामले में 2025 में बरी हो गईं और CBI ने बाद में अपील भी की यानी कानून ने अपना रास्ता लिया; पर जनता की स्मृति में वह दृश्य रह गया: न्याय के दरवाज़े पर एक थैला और थैले में न्याय का वज़न। मी लॉर्ड, इनके लिए भी तो आपके पास कोई शब्द होगा! कोई उपमा होगी!!!
मी लॉर्ड, भरोसा तब बनता है जब जस्टिस सौमित्र सेन के महाभियोग में राज्यसभा से पारित प्रस्ताव को इतिहास की धूल में नहीं दबाया जाता। उन पर धन के दुरुपयोग और ग़लत बयानी के आरोप थे; राज्यसभा ने 2011 में उनके हटाने के पक्ष में मतदान किया, पर लोकसभा में प्रक्रिया पूरी होने से पहले उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। लोकतंत्र ने देखा कि न्यायाधीश हटे नहीं, बच निकले; प्रक्रिया खड़ी रही, आदमी निकल गया। मी लॉर्ड, इनको भी कोई उपमा दे दीजिए।
मी लॉर्ड, जस्टिस दिनाकरन का मामला भी यही सिखाता है। भूमि-हड़पने, अघोषित संपत्ति और पद के दुरुपयोग के आरोपों के बीच महाभियोग की प्रक्रिया चली और वे इस्तीफ़ा दे गए। आरोप सिद्ध होने से पहले ही व्यवस्था ने राहत की साँस ली; जैसे बीमारी का इलाज नहीं हुआ, मरीज अस्पताल से निकल गया। मी लॉर्ड, इनके लिए भी कोई तो उपमा होगी ही।
मी लॉर्ड, 2012 के कैश-फॉर-बेल मामले में CBI जज राव पर 5 करोड़ की रिश्वत लेकर जमानत देने का आरोप लगा और गिरफ्तारी हुई। यह न्याय का वह संस्करण था, जिसमें जमानत आदेश नहीं, बिल बन जाती है। फिर मी लॉर्ड वो जस्टिस, जिनका मेडिकल कॉलेज रिश्वत मामला आया, जिसमें CBI ने आरोप लगाया कि प्रतिबंधित मेडिकल कॉलेज को लाभ पहुँचाने के लिए अवैध लाभ लिया गया; 2021 में चार्ज़शीट भी दाखिल हुई। यानी शिक्षा, इलाज और न्याय के बीच वह पवित्र त्रिकोण बना, जिसमें जनता मरीज भी है, छात्र भी है और मुकदमेबाज़ भी। मी लॉर्ड, ये क्या हैं पैरासाइट? क्या कुछ और?
और फिर 2025-26 का जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण। मी लॉर्ड,आग लगी, स्टोररूम खुला, नकदी का धुआँ उठा, न्यायपालिका की साख राख में खड़ी रह गई। उन्होंने आरोपों से इनकार किया, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक इन-हाउस कमेटी, महाभियोग प्रक्रिया और अंततः इस्तीफे़ तक बात पहुँची।ऐसे में जब कोई पत्रकार पूछता है, “महोदय, यह सब क्या है?” तो उसे कॉकरोच कहना आसान है। क्योंकि कॉकरोच की ख़ूबी यह है कि वह अँधेरे में दिखाई देता है। वह रोशनी नहीं लाता, पर रोशनी पड़ते ही भागते हुए सच का पता बता देता है। RTI कार्यकर्ता भी वही करता है। वह फ़ाइलों की दरारों में घुसता है, नोटिंग के पीछे छिपी नमी सूँघता है और कहता है, मी लॉर्ड, यहाँ कुछ सड़ रहा है।
मी लॉर्ड, हमारा लोकतंत्र बड़ा उदार है। यहाँ जो प्रश्न पूछे, वह परजीवी; जो उत्तर न दे, वह संस्थान। जो सूचना माँगे, वह कीड़ा; जो सूचना दबाए, वह गरिमा। जो कैमरा लेकर दरवाज़े पर खड़ा हो, वह हमला कर रहा है; और जिसके घर के स्टोररूम में नोटों का मौसम बदल जाए, वह प्रतिष्ठा का पात्र है। नहीं मी लॉर्ड? मी लॉर्ड, सच यह है कि न्यायपालिका पर सवाल न्यायपालिका-विरोध नहीं है। लेकिन जिस दिन अदालतें आलोचना को अपमान और RTI को संक्रमण मानने लगेंगी, उस दिन न्याय का सबसे बड़ा शत्रु पत्रकार नहीं होगा, जनता भी नहीं होगी, उस दिन न्याय का शत्रु उसका अपना बंद कमरा होगा।
मी लॉर्ड, कॉकरोच गंदगी पैदा नहीं करता; वह गंदगी की उपस्थिति का प्रमाण है। इसलिए ग़ुस्सा कॉकरोच पर नहीं, रसोई की सफ़ाई पर होना चाहिए। लोकतंत्र में पत्रकार और RTI कार्यकर्ता फिनायल नहीं, चेतावनी-सूचक हैं। उन्हें मारकर व्यवस्था साफ़ नहीं होती; केवल अँधेरा थोड़ा और आत्मविश्वासी हो जाता है। और मी लॉर्ड, अपने आसपास के अंधेरों को भी तो थोड़ा देख लीजिए!
मी लाूर्ड, हमारे लोकतंत्र में नागरिक पहले वोटर था, फिर पेटिशनर बना, फिर न्यूसेंस घोषित हुआ; अब उसे कॉकरोच, पैरासाइट, टरमाइट, लीच, वर्मिन, पेस्ट, मैगट और इन्फेक्शन की श्रेणी में पदोन्नत कर दिया गया है। मी लॉर्ड, आप महान् हैं। आपकी पूजा की जानी चाहिए। आप युगांतरकारी हैं, आपकी प्रतिमा नभस्पर्शी होनी चाहिए।
मी लॉर्ड, “Parasites” शब्द कोई मासूम विशेषण नहीं है; उसका इतिहास न्याय की भाषा में बहुत भयावह है। मी लॉर्ड, जब किसी नागरिक, कार्यकर्ता, पत्रकार या असहमत व्यक्ति को “पैरासाइट” कहा जाता है, तो यह केवल गाली नहीं रहती, यह मनुष्य को मनुष्य की श्रेणी से हटाकर नष्ट किए जाने योग्य जीव में बदलने की भाषा बन जाती है। नाज़ी जर्मनी में हिटलर के कुख्यात जज रोलांड फ्राइसलर और पीपुल्स कोर्ट की वैचारिक भाषा में “national parasites” यानी “राष्ट्रीय परजीवी” जैसी संज्ञाएँ राजनीतिक विरोधियों और शासन-विरोधी लोगों के लिए इस्तेमाल हुईं; ओटो थियरैक जैसे न्याय-मंत्री जजों से “antisocial parasites” के खिलाफ निर्मम न्याय की बात करते थे। यानी “पैरासाइट” शब्द का इतिहास यह बताता है कि जब सत्ता और न्यायालय मिलकर किसी नागरिक को परजीवी कहने लगते हैं तो न्याय धीरे-धीरे कानून की किताब से निकलकर दमन की प्रयोगशाला में पहुँच जाता है। इसलिए लोकतंत्र में यह शब्द अदालत की भाषा नहीं हो सकता; अदालत का धर्म नागरिक को सुनना है, उसे जैविक गाली में बदलना नहीं।
मी लॉर्ड, “Cockroaches” शब्द भले नाज़ी अदालतों की स्थायी शब्दावली में न मिले, लेकिन उसका इतिहास भी उतना ही डरावना है। नाज़ी प्रचार में यहूदियों और विरोधियों के लिए “rats”, “vermin”, “lice”, “parasites” और “disease” जैसे शब्द इस्तेमाल हुए, लेकिन “cockroaches” शब्द सबसे कुख्यात रूप से 1994 के रवांडा नरसंहार में सामने आया, जहाँ हुतू उग्रवादियों ने तुत्सी समुदाय को “inyenzi”—कॉकरोच—कहकर उनके मानवीय अस्तित्व को मिटाने की वैचारिक ज़मीन तैयार की। इसलिए जब किसी लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च न्यायिक भाषा में “कॉकरोच” और “पैरासाइट” जैसे शब्द प्रवेश करते हैं, तो यह सिर्फ असभ्य भाषा का मामला नहीं रहता; यह नागरिक की संवैधानिक गरिमा पर चोट बन जाता है। संविधान कहता है, “हम भारत के लोग”; वह यह नहीं कहता, “हम भारत के कॉकरोच और पैरासाइट।” अदालतें यदि नागरिक को सुनने के बजाय उसे कीट-विज्ञान की वस्तु बनाने लगें, तो सामान्य आदमी यही समझेगा कि न्याय के दरवाज़े अब मनुष्यों के लिए नहीं, केवल चुप, सुविधाजनक और अनप्रश्नकारी प्राणियों के लिए खुले हैं।
मी लॉर्ड!
मी लॉर्ड!!
मी लॉर्ड!!!
