साहित्य आलोचना के सरोकार
वर्तमान परिस्थितियों में साहित्यकार की भूमिका
ओमसिंह अशफ़ाक
भूमिका का प्रश्न एक तरह से शाश्वत है,ये लगभग उतना ही पुराना है जितना साहित्य है। इसलिए हर दौर में भूमिका का प्रश्न सामयिक और समीचीन रहा है।
इस टॉपिक का ये तकाजा भी है कि हम साहित्यकार की भूमिका का निर्धारण करने से पहले वर्तमान परिस्थितियों की जटिलताओं की विस्तृत जानकारी हासिल करें, उसका लिश्लेषण करें और जो तथ्यात्मक निष्कर्ष प्राप्त हों उनके अनुरूप अपनी भूमिका तय करें।
हम जानते हैं कि आज का दौर भूमंडलीकरण का दौर कहा जाता है। कहते हैं कि इस दौर में सारा संसार एक ‘ग्लोबल विलेज’ बन गया है और उदारीकरण इसका लोकप्रिय नारा है।
भारत में इसका आगमन गत शताब्दी के नौवें दशक से माना जाता है। खासकर 1991 से, जब हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के वित्तमंत्री होते थे और उन्होंने नयी आर्थिक नीति लागू की थी।
उन्हीं नीतियों को उदारीकरण की नीतियाँ कहा गया था। उदारीकरण लागू करने के लिए विनिवेश जरूरी बताया गया था। विनिवेश का मतलब मोटे तौर पर यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र का उदारतापूर्वक संकुचन किया जाए।
अर्थात सरकारी इदारे को सिकोड़ा जाए और प्राइवेट सेक्टर का विस्तार किया जाए और अर्थव्यवस्था को इस तरह खुला छोड़ दिया जाए कि बाजार खुद ही इसका नियन्ता और नियामक हो, राज्य इसमें हस्तक्षेप न करे।
यानी मंदी-महंगाई, बेरोजगारी, उत्पादन खपत, लाभ-हानी सब कुछ बाजार तय करे, सरकार किसी तरह का नियंत्रण न करे।
किसी सार्वजनिक क्षेत्र को कोई अनुदान सब्सिडी न दें और सरकारी उद्योगों को प्राइवेट पूंजीपतियों को ‘डिसइंवेस्टमेंट’ के नाम पर औणे-पौणे दामों पर बेच-बाच कर अलग हट जाए। पूंजीपति जैसे चाहें उन उद्योगों को चलाएँ।
तो पिछले 30-31 साल से हमारे देश में भी भूमंडलीकरण के जरिए उदारीकरण चल रहा है और यह विश्व स्तर पर विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के निर्देशों के तहत चल रहा है।
इसके आगमन से पहले अमेरिका और यूरोप के कुछ अर्थशास्त्रियों-विद्वानों ने यह घोषणा कर दी थी कि विचारधारा का अंत हो चुका है, इतिहास का भी अंत हो चुका है और अब कोई विकल्प नहीं बचा है। सिवाय बाजार के, सिवाय पूंजीवाद के।
संक्षेप में इसे (Tina) कहा गया मतलब (देयर इज नो आल्टरनेटिव) यानी और कोई रास्ता नहीं है।
अब देखें कि इन नीतियों का असर क्या हुआ, कैसी परिस्थितियाँ बनी ताकि उनके अनुरूप हम अपनी भूमिका तय कर सकें:
हम पाते हैं कि यूरोप और अमरीका सहित पश्चिम के विकसित देशों में भी इन नीतियों ने भयंकर संकट पैदा किए। यहाँ तक कि अमरीका के दर्जनों भारी भरकम बैंक और वित्तीय कम्पनियाँ रातोंरात दिवालिया हो गए और खुद अमरीका के राष्ट्रपति को उन्हें उबारने के लिए अरबों डालर के राहत पैकेजों की घोषणा करनी पड़ी।
लेकिन उन राहत पैकेजों का बड़ा हिस्सा उन ‘बैंकों और कंपनियों’ के बड़े-बड़े एक्जीक्यूटिव और डायरेक्टर अपनी वेतनवृद्धि और बोनस के रूप में ले उड़े। कई तो विशेष हवाई जहाजों में उड़कर राहत पैकेज लेने आए थे।
नतीजा ये हुआ कि वे ‘बैंक और वित्तीय संस्थाएँ’ दिवालिया ही बनी रहीं और उनके कर्ताधर्ता ‘बेल आउट’ पैकेजों को हड़प-गड़प कर गये। आखिर तो ओबामा को भी उन्हें नसीहत की डाट पिलानी पड़ी थी।
इन नीतियों का दूसरा पक्ष ये रहा कि 2008 और 2011 में उनकी अर्थव्यवस्था दो बार इतनी जल्दी-जल्दी मंदी की चपेट में आयी है और अभी तक भी पूरी तरह ‘मंदी के चक्र’ से निकल नहीं सकी है।
कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद ये सबसे भंयकर मंदी है जिसने लाखों लोगों को बेरोजगार
कर दिया है। अकेले अमरीका में ही 14 प्रतिशत बेरोजगारी है।
इटली, फ्रांस, मिस्र सहित कई मुल्कों की जनता का बुरा हाल है और न्यूयार्क सहित अनेक शहरों, राज्यों और यूरोपियन देशों में वाल-स्ट्रीट पर कब्जा करो (‘आक्यूपाई दी वाल स्ट्रीट’) आंदोलन चल रहा है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर भी मंदी की और भंयकर मार पड़नी थी जो इसलिए टल गई कि यहाँ यू.पी.ए.-1 के कार्यकाल में केंद्र की सरकार वामपंथियों के समर्थन पर निर्भर थी और वामपंथियों ने ‘बैंकिंग और बीमा’ क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिए खोल देने की इज़ाज़त नहीं दी थी।
वरना हमारी सार्वजनिक बचतों की सारी पूंजी अमरीकी और यूरोपीय कंपनियाँ डकार गई होतीं और हमारे बैंक और बीमा कंपनियाँ कंगाल बन गए होते और आप जानते हैं कि बैंकों, बीमा कंपनियों और अन्य सरकारी वित्तीय संस्थाओं में जमा पैसा जनता का ही धन होता है।
इसलिए इस कंगाली की मार अंततः उस जनता के ऊपर आकर पड़नी थी? जो जनता पहले से ही आर्थिक तंगी की शिकार है।
क्योंकि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार सृजन बंद कर दिया गया है। प्राइवेट सेक्टर के पूंजीपति रात-दिन की पालियों में ठेके पर काम करवाकर वर्कमैन का खून निचोड़कर अनाप-शनाप मुनाफे बटोर रहे हैं।
वे कोई श्रम कानून नहीं मानते और श्रम कानूनों के अनुसार सुविधाएँ मांगों तो फैक्ट्रियों से बाहर निकालकर गुंडों और पुलिस की लाठियों से पिटवाते हैं।
गुड़गांव( गुरुग्राम), मानेसर, धारूहेड़ा आदि जगहों पर हीरो होंडा, मारूति, सुजुकी आदि कंपनियों द्वारा करवाए गए बर्बर हिंसात्मक कांडों के दृश्य हमने गत समय में टी.वी. चैनलों और अखबारों में खूब देखे-पढ़े हैं।
फिर भी इन्हें और इन जैसी विदेशी-देशी कंपनियों, पूंजीपतियों के लिए हमारी सरकारें दिन रात किसानों की जमीनें छीनकर उन पर ‘विशेष आर्थिक जोन’ (SEZ) बनवाने की कोशिशों में लगी हैं।
क्योंकि एस.ई.जैड. की पहली शर्त यही है कि वहाँ कोई श्रम-कानून लागू नहीं होगा। वर्कमैन किसी राहत या सुविधा की मांग नहीं कर सकेगा।
अब स्कूल शिक्षा पर गौर करें तो अकेले हरियाणा में ही 72 हजार शिक्षकों की जरूरत है और सरकार 6 साल से 15 हजार अतिथि अध्यापकों से काम चला रही है।
वेतन के नाम पर 10, 12 और 15 हजार रूपये दिए जाते हैं और नियमित शिक्षक भर्ती नहीं कर रही है, जबकि राज्य में 80 हजार शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करके नौकरी की प्रतीक्षा में कई साल से बैठे हैं।(आंकड़े 2011-12के हैं)
उल्टे सरकार ने अपनी गलत नीतियो के चलते ‘अतिथि अध्यापक बनाम सरकार’ और ‘पात्र अध्यापक बनाम अतिथि अध्यापक’ एवं सरकार का विवाद खड़ा करवाकर पूर्ण बेरोजगारों और आंशिक बेरोजगारों को आपस में लड़वा दिया है।
पूरे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है और हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का बोलबाला और अपराधिक गतिविधियों का ग्राफ़ तेजी से बढ़ता जा रहा है।
प्रत्येक क्षेत्र की चर्चा और आंकड़े उद्धृत करने का यहाँ अवसर नहीं है जिससे स्थिति की गंभीरता की ठोस तस्वीर भी दिख सकती थी लेकिन इस संक्षिप्त चर्चा से भी संकट के “विस्तार और दिशा” का सामान्य अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1948 में दुनिया की आधी सम्पत्ति अमरीका के पास थी और जनसंख्या सिर्फ छः प्रतिशत। सरकारी दस्तावेजों में कहा गया था कि इस भेद को बनाए रखने के प्रयत्न करने होंगे।
उधर शहीद भगत सिंह ने कहा था कि लॉर्ड इरविन की जगह सेठ पुरूषोत्तम दास के बैठ जाने से भारत की जनता की तकदीर नहीं बदलने वाली है।
आज भी भारत में 77 प्रतिशत आबादी 20 रूपये रोज से कम में गुजारा करती है। यह संख्या 84 करोड़ के लगभग बैठती है। 65 प्रतिशत बच्चों को किसी टीके की सुरक्षा हासिल नहीं है।
40 प्रतिशत बच्चों का वजन स्वास्थ्य मानकों से कम है। 70 प्रतिशत बच्चों में कुपोषण के चलते खून की कमी है। 70 प्रतिशत लोगों को स्वच्छ शौचालय उपलब्ध नहीं है। 65 प्रतिशत गर्भवती महिलाएँ खून की कमी से ग्रस्त हैं। 66 प्रतिशत आबादी को बस्ती के पास स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है।
गत 15 सालों में 2 लाख 55 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले 10 साल में 1.5 लाख लड़कियाँ जन्म लेने से पहले ही मार दी गई हैं।(2011-12 का आंकड़ा)
दूसरी तरफ हम देखते हैं कि देश में लाखों की संख्या में बाबाओं, गुरूओं, संतों-साधुओं की फौज घूम रही है जो रामराज लाने को और मोक्ष दिलवाने के वादे करते रहते हैं।
ऐसी स्थिति के लिए ही शायद ‘हाली पानीपती’ ने लिखा था:
फ़रिश्ते से बेहतर इंसान है बनना,
मगर इसमें पड़ती है मेहनत ज्यादा।
तो मित्रो, मोटे तौर पर ये हैं परिस्थितियाँ और इनमें ही हमने, साहित्यकारों की यानी अपनी भूमिका तय करनी है।
नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार ‘स्टाइन बेक’ ने अपने नोबल भाषण में कहा था कि साहित्यकार की जिम्मेदारी है कि वह हमारे काले और खतरनाक सपनों को घसीटकर रोशनी में लाये, ताकि हम सुधरें।
प्रेमचंद ने लिखा है- “जहाँ धन की कमी बेशी के आधार पर असमानता है, वहाँ ईर्ष्या, द्वेष, जोर-जबरदस्ती, बेईमानी, झूठ, मिथ्या अभियोग आरोप, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार और सारी दुनिया की बुराईयाँ अनिवार्य रूप से मौजूद हैं।
“जहाँ धन का आधिक्य नहीं, अधिकांश मनुष्य एक ही स्थित में हैं, वहाँ जलन क्यों हो और जब्र क्यों हो? स्तीत्व विक्रय क्यों हो और व्यभिचार क्यों हो? झूठे मुकदमें क्यों चलें और चोरी डाके की वारदात क्यों हों?
“सारी बुराईयाँ तो दौलत की देन है, पैसे के प्रसाद हैं. महाजनी सभ्यता (पूंजीवाद) ने ही उनकी सृष्टि की है। वही इनको पालती है और वही यह भी चाहती है कि जो दलित पीड़ित और विजित हैं वे इसे ईश्वरीय विधान समझकर अपनी स्थिति पर संतुष्ट रहें।”
गांधी जी नरसी मेहता का भजन गाते थे :
वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे-रे।
पर दुःखे उपकार करे तो, मन अभिमान न आणे रे।।
उन्होंने कहा था कि स्वतंत्र भारत में नीति निर्माताओं की निगाह इस तथ्य पर रहनी चाहिए कि उनकी नीति का समाज के सबसे गरीब आदमी को कोई लाभ होगा या नहीं।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने लिखा है कि “मैं अन्याय, अत्याचार, आडम्बर तथा अनर्थ से घृणा करता हूँ और मेरी घृणा उन सब लोगों के प्रति है जो उन्हें अपनाते हैं।वे दोषी हैं।
“यदि व्यक्ति का प्रेम तथा घृणा प्रबल नहीं हो सकता है तो वह अशा नहीं कर सकता कि वह अपने युग पर कोई प्रभाव छोड़ सकेगा और ऐसी सहायता प्रदान कर सकेगा जो महान सिद्धांतों तथा संघर्षों के लिए उचित हो।”
यानी प्रेम करो न्याय से, इंसाफ से और घृणा करो अन्याय से। इन्हीं अम्बेडकर ने मूल रूप से तीन नारे भी दिए थे- ‘शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो।’
मित्रो, अमरीका के एक बहुत बड़े विद्वान प्रोफेसर हैं जिनका नाम है नॉम चोम्सकी।’शिकागो ट्रिब्यून’ अखबार का कहना है कि लोकप्रियता में पलेटो और फ्रायड के बाद नॉम चाम्सकी का ही नाम आता है।
वे कहते हैं कि “बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि वे सच बोलें और झूठ का पर्दाफाश करें।”
प्रो. चाम्सकी लिखते हैं कि- “संगठित करने के लिए मैं न जाने कितनी बार जेल जा चुका हूँ। मैंने ‘राष्ट्रीय कर-प्रतिरोध’ चलाया, ‘नेशनल ड्राफ्ट रैजीस्टैंस’ आयोजित किया।
“मेरा मतलब है कि मुझे जेल की लंबी सजाएँ हुई। वह इतनी जल्दी-जल्दी होती थीं कि मेरी पत्नी ने वापिस स्कूल में नौकरी कर ली क्योंकि हमें लगा कि कोई तो हो जो हमारे तीन बच्चों का ख्याल रख सके।”
आप देख सकते हैं कि 20वीं-21वीं सदी की दुनिया का इतना बड़ा विद्वान और लगातार संघर्ष। नतीजतन बार-बार जेल यातनाएँ!
हमारे अपने देश में कितने विद्वान, साहित्यकार और बुद्धिजीवी हैं जो जनता के लिए रोज जेल जाते हैं?
आप सोच रहे होंगे कि सरकार का चुनाव भी तो गरीब लोग ही करते हैं क्योंकि इनकी संख्या ज्यादा है, वोट भी ज्यादा हैं।
इस संबंध में अरूंधती राय का एक कथन गौर करने लायक है। वह कहती हैं कि:
“मुक्त बाजार वाले लोकतंत्र में जनता की राय भी किसी अन्य उत्पाद की तरह ‘निर्मित’ की जाती है।
“कानूनी रूप से बोलने की आजादी हो सकती है। लेकिन आजादी के प्रयोग करने का ‘स्पेस’ तो हमारे पास है ही नहीं।
यह समय सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को नीलाम किया जा चुका है…नव उदारवाद सिर्फ पूंजी का संचयन ही नहीं है, यह सत्ता का संचयन भी है..।”
नॉम चाम्सकी ने लिखा है कि “मुक्त बाजार अमीरों के लिए ‘समाजवाद’ है : जनता कीमत अदा करती है और अमीर फायदा उठाता है। (यानी) गरीब-गुरबों के लिए बाजार और अमीरों के लिए ढेर सारा संरक्षण।
“तो ये है उदारवाद, बाजारवाद या पूंजीवाद जो भी आप उसे कहना चाहें।
चॉम्सकी का मानना है कि “अत्याचार, क्रूरता (और) अन्याय का विरोध करना ही होगा। लेखन के साथ-साथ आपको कार्यकर्ता की तरह सक्रिय होना पड़ेगा…”
मुझे लगता है कि इतने उद्धहरणों के बाद “साहित्यकार की भूमिका” बारे कोई अस्पष्टता शेष नहीं रह जाती है।
बल्कि अब तो मुख्य सवाल इस चुनौती को स्वीकार करने या न करने का है और इसी के साथ साहित्य की अमरता और नश्वरता का मामला भी जुड़ा हुआ है।
(समाप्त)
(इस लेखक के द्वारा उपरोक्त्त व्याख्यान महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती समारोह में 11 अप्रैल 2012 को गुड़गांव के गांव जमालपुर में दिया गया था।)
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