फिल्म समीक्षा
अस्सी : स्क्रीन पर फिल्म खत्म, दिमाग में मुकदमा शुरू
- कठघरे में एक लड़की नहीं, हमारी सोच खड़ी है
रमेश सिद्धू

कभी-कभी एक डायलॉग पूरी फिल्म से ज्यादा असर छोड़ जाता है। फिल्म “अस्सी” का यह संवाद सिर्फ अदालत का नहीं, बल्कि पूरे समाज का फैसला सुनाने जैसा लगता है। पोस्ट को अंत तक पढ़िए… शायद आखिरी सवाल आप खुद से पूछेंगे- कटघरे में आखिर खड़ा कौन है?
फिल्म के आखिरी सीन में एडवोकेट रावी (तापसी पन्नू) कहती है-
“हर बार सवाल पीड़िता से पूछे जाते हैं—वह कहां थी, क्या पहन रखा था, क्यों गई थी… लेकिन अपराधी से नहीं कि उसने ऐसा करने की हिम्मत क्यों की?”
यहीं फिल्म दिल पर चोट करती है, क्योंकि सच यही है- हमारे समाज में अपराध से पहले नहीं, अपराध के बाद भी कठघरे में अकसर पीड़िता ही खड़ी कर दी जाती है।
फिल्म की शुरुआत में एक लाइन आती है-
“दूर से देखो तो शहर में सबकुछ नॉर्मल लगता है… पर क्या सच में सबकुछ नॉर्मल है?”
आप भी सोचिए… जिस माहौल में हम जी रहे हैं वहां क्या सचमुच सबकुछ नॉर्मल है?
हल्के-फुल्के मनोरंजन वाली फिल्में देखने के शौकीन दर्शकों को शायद “अस्सी” बोरिंग लगे- उन्हें देखनी भी नहीं चाहिए। दरअसल, इस फिल्म को आप सिर्फ फिल्म की तरह देख ही नहीं सकते, क्योंकि यह महज फिल्म है भी नहीं। “अस्सी” उस समाज का आईना है, जिसमें हम सब सांस ले रहे हैं। यह सिर्फ कोर्टरूम ड्रामा भी नहीं है, कोर्टरूम सीन इसका सिर्फ एक हिस्सा है। असली सुनवाई हमारे भीतर चलती है।
यहां सिर्फ एक महिला के साथ अपराध नहीं दिखाया गया, बल्कि सिस्टम की नाकामी, रिश्वतखोरी, और संवेदनहीन होती पीढ़ी भी दिखाई गई है। फिल्म में टीचर के साथ दुष्कर्म होने के बाद उनके ही छात्र मीम बनाते हैं, मजाक उड़ाते हैं, व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर करते हैं।
पीड़ित शिक्षिका अदालत में बताती है कि जिन बच्चों को उसने बचपन से पढ़ाया, उन्हीं में से एक छात्र कहता है- काश वह भी उस कार में होता।
सोचिए… बीमारी अपराधियों में ज्यादा है या सोच में?
स्कूल की प्रिंसिपल का एक डायलॉग है—
“स्कूल का रिजल्ट बेस्ट आ रहा था, पर पूरा स्कूल फेल हो गया।”
एक लाइन… और पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल।
फिल्म का नाम “अस्सी” इसलिए है क्योंकि उस दिन 80 मामले दर्ज होते हैं। पर क्या फर्क पड़ता है… हम तो जैसे ऐसे आंकड़ों के आदी हो चुके हैं।
फिल्म बार-बार याद दिलाती है कि बलात्कार सिर्फ शरीर पर हमला नहीं होता, वह आत्मा पर जख्म छोड़ जाता है।
पीड़िता अदालत में कहती है—
“कुसूर मेरा है… मुझे रात को अकेले नहीं जाना चाहिए था… कहीं… एक पुरुष के बिना।”
यह व्यंग्य है… हमारे समाज पर।
“अस्सी” सिर्फ अपराध की कहानी नहीं, उस मानसिकता की कहानी है जहां अपराधी से ज्यादा सवाल पीड़िता पर उठते हैं।
हो सकता है यह फिल्म आपको मनोरंजन न दे।
हो सकता है यह आपको भारी लगे।
लेकिन अगर कोई फिल्म आपको भीतर से हिला दे… तो समझिए वह सिर्फ फिल्म नहीं, आईना है।
“अस्सी” स्क्रीन पर खत्म होती है… दिमाग में नहीं।
अगर देखी है तो बताइए… आपको फिल्म लगी या सच?
