कविता
आभासी दुनिया
दीपक वोहरा
कहने को मैं आज़ाद हूँ
अपनी मर्जी का मालिक हूँ
पर एक आभासी दुनिया में कैद हूँ
क्योंकि मेरे हाथ में
एक छोटा-सा एटम बम है
जहाँ एक नई दुनिया है
मेरी जिंदगी
मोबाइल की स्क्रीन में कैद है
मुझे लगता है
मेरी एक सल्तनत है
जहाँ का मैं सुल्तान हूँ
एक आभासी दुनिया में
मैं भी क़ैद हूँ
शांति से बिस्तर पर लेटा हुआ हूँ
मोबाइल की स्क्रीन चमकती है
जब उंगलियाँ उसे छूती है
तो खुलने लगती है
एक नई दुनिया
एक जन्नत
हर चीज़ खूबसूरत लगती है
यह कोई ख़्वाब नहीं
पर सच भी पूरा नहीं
कुछ यादें हैं
कुछ खूबसूरत तस्वीरें हैं
कुछ मुस्कुराती हुई
कुछ चुप
कुछ ऐसी
जो शब्दों से भी ज़्यादा बोलती हैं
यही वही पल हैं
जो रास्ते बनाते हैं
मगर किसी मंजिल पर
लेकर नहीं जाते हैं
और मैं
अनजाने में
उन्हीं पर चलकर
कुछ पाने की चाहत में
एक चकाचौंथ दुनिया की दलदल में
फँसता चला जाता हूँ
मुझे अच्छा लगता है
मैं उसमें और डूबता चला जाता हूँ
शायद
समय बर्बाद करने का
इससे बेहतर तरीका
सच में कोई नहीं हो सकता है

कवि – दीपक वोहरा
