फ़ासिज्म के ख़िलाफ़ फिर बनाना होगा जनमोर्चा

(संदर्भ : 9—10 अप्रैल, प्रगतिशील लेखक संघ का स्थापना दिवस)

फ़ासिज्म के ख़िलाफ़ फिर बनाना होगा जनमोर्चा

जाहिद खान

 

साल 1936 में लखनऊ के मशहूर ‘रिफ़ाअ-ए-‘आम’ क्लब में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न हुआ था। जिसमें बाक़ायदा संगठन की स्थापना की गई। अधिवेशन 9 और 10 अप्रैल यानी दो दिन हुआ। इस लिहाज़ से देखें, तो 9 अप्रैल प्रगतिशील लेखक संघ का स्थापना दिवस है। और इस अखिल भारतीय संगठन ने साल 2026 में अपनी स्थापना के नब्बे साल मुकम्मल कर लिए हैं, जो कि एक गौरवशाली यात्रा है।

बहरहाल, अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए महान कथाकार प्रेमचंद ने कहा था, ‘हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’

प्रेमचंद द्वारा दिए गए इस बीज वक्तव्य को एक लंबा अरसा बीत गया, लेकिन आज भी यह वक्तव्य, साहित्य को सही तरह से परखने का पैमाना है। उक्त कथन की कसौटी पर खरा उतरने वाला साहित्य ही हमारा सर्वश्रेष्ठ साहित्य है। यही अदब अवाम के दिल-ओ-दिमाग़ में हमेशा ज़िंदा रहेगा। उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करता रहेगा।

प्रगतिशील लेखक संघ का गठन यूँ ही नहीं हो गया था, बल्कि इसके गठन के पीछे ऐतिहासिक कारण थे। साल 1930 से 1935 तक का दौर परिवर्तन का दौर था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद सारी दुनिया आर्थिक मंदी झेल रही थी। जर्मनी, इटली में क्रमशः हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही और फ्रांस की पूँजीपति सरकार के जनविरोधी कामों से पूरी दुनिया पर साम्राज्यवाद और फ़ासिज्म का ख़तरा मंडरा रहा था। इन सब संकटों के बावजूद उम्मीदें भी ख़त्म नहीं हुई थीं।
हर ढलता अंधेरा, पहले से भी उजला नया सवेरा लेकर आता है। जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी के लीडर दिमित्रोव के मुक़दमे, फ्रांस के मज़दूरों की बेदारी और ऑस्ट्रिया की नाकामयाब मज़दूर क्रांति से सारी दुनिया में क्रांति के एक नये युग का आग़ाज़ हुआ। चुनांचे, साल 1933 में प्रसिद्ध फ्रांसीसी साहित्यकार हेनरी बारबूस की कोशिशों से फ्रांस में लेखक, कलाकारों का फ़ासिज्म के ख़िलाफ़ एक संयुक्त मोर्चा ‘वर्ल्ड कान्फ्रेंस ऑफ राइटर्स फार दि डिफ़ेन्स ऑफ कल्चर’ बना। जो आगे चलकर पॉपुलर फ्रंट (जन मोर्चा) के तौर पर तब्दील हो गया।

इस संयुक्त मोर्चे में मैक्सिम गोर्की, रोम्या रोलॉं, आंद्रे मालरो, टॉमस मान, वाल्डो फ्रेंक, मारसल, आंद्रे जीद, आरांगो जैसे विश्वविख्यात साहित्यकार शामिल थे। लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मियों के इस मोर्चे को अवाम की भी हिमायत हासिल थी।

दुनिया भर में चल रही इन सब इंक़लाबी वाक़िआत ने बड़े पैमाने पर हिंदोस्तानियों को भी मुतास्सिर किया। इन हिंदोस्तानियों में लंदन में आला तालीम ले रहे सज्जाद ज़हीर, डॉ. मुल्कराज आनंद, प्रमोद सेन गुप्त, डॉ. मुहम्मद दीन ‘तासीर’, हीरेन मुखर्जी और डॉ. ज्योति घोष जैसे तरक़्क़ीपसंद नौजवान भी थे। जिसका सबब लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना थी। प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र का शुरुआती मसौदा वहीं तैयार हुआ। जिसको तैयार करने में डॉ. मुल्कराज आनंद ने बड़ा रोल निभाया।

सज्जाद ज़हीर और उनके चंद दोस्तों ने मिलकर तरक़्क़ीपसंद तहरीक को आलमी तहरीक का हिस्सा बनाया। स्पेन के फ़ासिस्ट विरोधी संघर्ष मे सहभागिता के साथ-साथ सज्जाद ज़हीर ने साल 1935 में गीडे व मेलरौक्स द्वारा आयोजित विश्व बुद्धिजीवी सम्मेलन में भी हिस्सेदारी की। जिसके अध्यक्ष गोर्की थे।

साल 1936 में सज्जाद ज़हीर, लंदन से भारत वापिस लौटे और आते ही उन्होंने सबसे पहले प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की तैयारियॉं शुरू कर दीं। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के घोषणा-पत्र पर उन्होंने भारतीय भाषाओं के तमाम लेखकों से विचार-विनिमय किया। इस दौरान सज्जाद ज़हीर गुजराती भाषा के बड़े लेखक कन्हैयालाल मुंशी, फ़िराक़ गोरखपुरी, डॉ. सैयद ऐज़ाज़ हुसैन, शिवदान सिंह चौहान, पं. अमरनाथ झा, डॉ. ताराचंद, अहमद अली, मुंशी दयानारायन निगम, महमूदुज्ज़फ़र आदि से मिले।

‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के घोषणा-पत्र पर सज्जाद ज़हीर ने उनसे राय-मशवरा किया। प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन बेहद कामयाब रहा। जिसमें साहित्य से जुड़े कई विचारोत्तेजक सत्र हुए। अहमद अली, फ़िराक़ गोरखपुरी, मौलाना हसरत मोहानी आदि ने अपने आलेख पढ़े। इस कॉन्फ्रेंस की आख़िरी बैठक में मौलाना हसरत मोहानी ने तक़रीर की। उन्होंने तरक़्क़ीपसंद मुसन्निफ़ीन की तहरीक और उसके ऐलान-नामे से पूरा इत्तिफ़ाक़ किया।

उन्होंने कहा, ‘हमारे अदब को क़ौमी आज़ादी की तहरीक की तर्जुमानी करना चाहिए। उसे साम्राज्यवादियों और ज़ुल्म करने वाले अमीरों की मुख़ालफ़त करना चाहिए। उसे मज़दूरों और किसानों और तमाम मज़लूम इंसानों की तरफ़दारी और हिमायत करना चाहिए। उसमें अवाम के दुख-सुख, उनकी बेहतरीन ख़्वाहिशों और तमन्नाओं का इज़हार इस तरह करना चाहिए, जिससे उनकी इंक़लाबी कु़व्वत में इज़ाफ़ा हो। और वो इकट्ठे और संगठित होकर अपनी जद्दोजहद को कामयाब बना सकें।’

अधिवेशन में उर्दू के बड़े साहित्यकार तो शामिल हुए ही, हिन्दी से भी प्रेमचंद के साथ जैनेन्द्र कुमार, शिवदान सिंह चौहान ने शिरकत की। अधिवेशन में लेखकों के अलावा समाजवादी लीडर जयप्रकाश नारायण, यूसुफ़ मेहर अली, इंदुलाल याज्ञनिक और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने भी हिस्सा लिया। बुलबुल-ए-हिंद सरोजनी नायडू ने इस मौक़े के लिए एक पैग़ाम भेजा था, जो पढ़कर सुनाया गया। इसमें उन्होंने तरक़्क़ीपसंद तहरीक के उद्देश्यों की हौसला—अफ़ज़ाई की।

तरक़्क़ीपसंद अदीबों ने अपने इस अधिवेशन में दो प्रस्ताव पास किये। पहले प्रस्ताव में मुसोलिनी के अबीसीनिया पर अन्यायपूर्ण और अत्याचारपूर्ण हमले की आलोचना की गई थी,और दूसरे प्रस्ताव में अंग्रेज़ी हुकूमत से मांग की गई थी कि वो अदीबों और सहाफ़ियों को अपने ख़यालात के इज़हार के लिए मुकम्मल आज़ादी दे। सज्जाद ज़हीर इस संगठन के पहले महासचिव चुने गये। वे साल 1936 से 1949 तक प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव रहे।

सज्जाद ज़हीर के व्यक्तित्व और दृष्टिसम्पन्न परिकल्पना के ही कारण प्रगतिशील आंदोलन, आगे चलकर भारत की आज़ादी का आंदोलन बन गया। देश के सारे प्रगतिशील-जनवादी लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी इस आंदोलन के इर्द-गिर्द जमा हो गये। साल 1942 से 1947 तक का दौर, प्रगतिशील आंदोलन का सुनहरा दौर था। यह आंदोलन आहिस्ता-आहिस्ता देश की सारी भाषाओं में फैलता चला गया। हर भाषा में एक नये सांस्कृतिक आंदोलन ने जन्म लिया। इन आंदोलनों का आख़िरी मक़सद, मुल्क की आज़ादी था।

उस दौर में आलम यह था कि प्रगतिशील लेखक संघ की लोकप्रियता देश के सभी राज्यों के लेखकों के बीच थी। प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में लेखकों का शामिल होना, प्रगतिशीलता की पहचान मानी जाती थी। आंदोलन ने जहां धार्मिक अंधविश्वास, जातिवाद व हर तरह की धर्मांधता का विरोध किया, तो वहीं साम्राज्यवाद और देसी सरमायेदारों से भी टक्कर ली। देश में एक समय ऐसा भी आया, जब उर्दू के सभी बड़े साहित्यकार प्रगतिशील लेखक संघ के परचम तले थे।

इन लेखकों की रचनाओं ने मुल्क में आज़ादी के हक़ में एक समां बना दिया। तरक़्क़ीपसंद तहरीक को पं. जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, रबीन्द्रनाथ टैगोर, अल्लामा इक़बाल, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान, प्रेमचंद, वल्लथोल जैसी सियासी और समाजी हस्तियों की सरपरस्ती हासिल थी।

मार्च, 1938 में प्रगतिशील लेखक संघ की एक और बड़ी कॉन्फ्रेंस इलाहाबाद में बुलाई गई। इस अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए जोश मलीहाबादी, आनंद नारायण मुल्ला और हिन्दी के मशहूर कवि सुमित्रानंदन पंत का नाम चुना गया। कॉन्फ्रेंस में गुजरात के अदीब काका कालेकर ने तक़रीर की, तो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कविता सुनाई।

लेकिन इस कॉन्फ्रेंस की दो चीज़ें बहुत तारीख़ी हैसियत रखती हैं। एक तो ये कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक पुर-जोश तक़रीर की। दूसरे, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर ने तरक़्क़ीपसंद अदीबों के नाम एक पैग़ाम भेजा।

अपनी तक़रीर में नेहरू ने समाजवादी समाज की हिमायत करते हुए कहा, ‘अगर वैयक्तिकता तरक़्क़ी पा सकती है, तो वो सिर्फ़ समाजवादी समाज में। पिछली दुनिया में फिर भी उन लोगों को मौक़ा हासिल था, जो रुपया-पैसा रखते थे और अधिकार रखते थे, लेकिन अब ज़माना बदल गया है। वो लोग भी जकड़े हुए हैं। ये कहना कि सोशलिज्म आकर वैयक्तिकता को ख़त्म कर देगा, ग़लत है। वो दौर ऐसा नहीं होगा कि सब एक हो जाएं। बल्कि हर एक को अपने ढंग पर तरक़्क़ी करने के मौके़ हासिल होंगे।’

अपनी तक़रीर के आख़िर में नौजवान अदीबों का मशवरा देते हुए उन्होंने कहा, ‘एक बात से मैं झिझकता हूॅं, वो ये कि ऐसा अदब लिखते वक़्त अक्सर लोग ख़ास-ख़ास फ़िक़रे, ख़ास-ख़ास नारे दोहराने लगते हैं। और समझते हैं कि इस तरह उन्होंने एक ज़बर्दस्त विचार रख दिया। लेकिन सही लिखने वाले के लिए ये औचित्यपूर्ण नहीं, और ना उसमें आर्ट है, ना कोई ख़ास बात। ना कोई ख़ास पैग़ाम।

ऐसी चीजों की जगह सिर्फ़ सियासत में है। हिंदुस्तान की ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ जैसी संस्थाएं यूरोप में बहुत सी हैं। उन्होंने बड़े-बड़े काम किये हैं। क्यूंकि, वो लोगों के दिमाग़ों में है। फ्रांसीसी क्रांति में वाल्तेयर जैसे अदीबों का बड़ा दख़्ल है। इसका असर इंक़लाब के बाद, सौ बरस तक बाक़ी रहा। इंक़लाब के लिए मुल्क को तैयार करना, उसकी ज़िम्मेदारी अदीब पर होती है। आप, लोगों की समस्याओं को हल कीजिए। उनको रास्ता बताइए, लेकिन आपकी बात आर्ट के ज़रिए होनी चाहिए, न कि तर्कशास्त्र के ज़रिए।

आपकी बात उनके दिल में उतर जानी चाहिए। हिंदुस्तान में अदीबों ने बड़ा असर किया है। मसलन बंगाल में टैगोर ने। लेकिन अभी तक ऐसे अदीब कम पैदा हुए, जो मुल्क को ज़्यादा आगे ले जा सकें। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना, एक बड़ी ज़रूरत को पूरी करती है। और इससे हमें बड़ी उम्मीदें हैं।’

प्रगतिशील लेखक संघ को गठन हुए एक लंबा अरसा गुज़र गया, लेकिन देश-दुनिया के सामने चुनौतियॉं उसी तरह की हैं। फ़र्क सिर्फ़ यह भर है कि अब फ़ासीवाद और साम्राज्यवाद नये-नये रूप बदलकर आ रहा है। इन प्रतिक्रियावादी ताक़तों से टक्कर तभी ली जा सकती है, जब प्रगतिशील और जनवादी विचारों से जुड़े सभी लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी एकजुट हो, इनके ख़िलाफ़ संयुक्त मोर्चा बनाएं। अपने छोटे-छोटे स्वार्थ और हितों को भूलकर सड़कों पर निकल कर आएं। अवाम की नुमाइंदगी करें। तभी इनके ख़िलाफ़ जनमोर्चा क़ायम होगा।

लेख और फोटोः जनचौक से साभार

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