टेरी एरेट का काव्यपारा
फ़ासीवाद जब आयेगा
जब फ़ासीवाद आयेगा वह दरवाज़ा नहीं तोड़ेगा, मुस्कुराते हुए भीतर आएगा— घुटनों के बल झुकेगा, प्रार्थना करेगा और तुम्हारे ईश्वर को तुम्हारे ही विरुद्ध खड़ा कर देगा।
वह रैलियों में बाज़ार की स्तुति करेगा— गली की दुकानों से ले कर काँच की अट्टालिकाओं तक, हर जयकार में उसका नाम होगा
वह दर्शकदीर्घा से ताली बजायेगा जब बिना बीमा वाले ग़रीब लोग बिना इलाज सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिये जायेंगे
वह अपने नायकों के स्मारक खड़े करेगा और उनके लिए रोयेगा, उनके पत्थर के चरणों में फूल चढ़ाएगा, ग्रेनाइट की दीवार पर खुदे नामों को उँगलियों से छुयेगा, और सैनिकों को मरने के लिए भेजता रहेगा पहाड़ों में, रेगिस्तानों में
वह कबूतरों को भेजेगा अपने दुश्मनों की आँखें नोचने के लिए क्योंकि उसके पास बाज़ फालतू नहीं होंगे
जब फ़ासीवाद आयेगा वह सत्ता के बरामदों में चाय पियेगा और सड़कों पर ज़हर उगलेगा
मस्जिदों, गिरजाघरों, मंदिरों के बीच वह डर की दीवारें खड़ी करेगा— और चिल्लायेगा : “जागो, दुश्मन तुम्हारे भीतर है ! उसे कपड़ों से पहचानो !”
वह शब्द गढ़ेगा— निगमीकरण, निजीकरण, और नफ़रत को नीति बना देगा
रेडियो पर उसी की आवाज़ होगी स्क्रीन पर उसी का चेहरा, और भाषा— धीरे-धीरे अपनी गहराई खो देगी
उसके पास तैयार बयान होंगे एक फेसबुक पेज होगा और बड़े शब्दों या कठोर ध्वनियों के प्रति बेहिसाब घृणा होगी
वह पढ़ने की ज़हमत नहीं उठायेगा विश्वविद्यालयों को ख़तरा बता कर वह अपनी सारी किताबें चिथड़े कर देगा वह उन्हें जलायेगा नहीं, बस उन्हें अप्रासंगिक कर देगा
वह शिक्षकों को कटघरे में खड़ा करेगा यूनियनों को गैरकानूनी घोषित करेगा और मूढ़ता को नाम देगा राष्ट्रभक्ति का
जब फ़ासीवाद आयेगा वह आकर्षक दिखेगा उसके घने बाल होंगे, इस्त्री किये हुए सूट वह सभी चैनलों पर नियंत्रण करेगा
वह सर्वोच्च न्यायालय में बैठेगा और क़ानून की भाषा में अन्याय लिखेगा
वह हमें भय से फुसलायेगा, आशा से रिझायेगा
जब फ़ासीवाद आएगा वह शेयर बाज़ार में खुद के हिस्से बेचेगा वह अमीर बनेगा, फिर बेहिसाब अमीर फिर कर देना बंद कर देगा वह तुम्हें धूल में पड़ा रहने देगा
कुचल दिये जाने की प्रतीक्षा के साथ
तुम्हें दोबारा मूर्ख बनाने के लिए उसे पसीना भी नहीं बहाना पड़ेगा तुम उसके “असफल होने” का इंतज़ार करोगे और यह इतना भी आसान नहीं होगा
वह तुम्हें हरायेगा बिना लड़े, और तुम समझ भी नहीं पाओगे कि तुम हार चुके हो— एक और बार
जब फ़ासीवाद आयेगा, वह हमारी चुप्पी, उदासीनता और आत्मसंतोष की हवाओं पर सवार होकर आयेगा
और उस दिन, कवि इकट्ठा होंगे किताबों की दूकानों में, पुस्तकालयों में, बारों और कैफ़े में, अपने घरों और अपार्टमेंटों में, स्कूलों में और सड़कों के किनारों पर— वे इकट्ठा होंगे रोते हुए, हँसते हुए, चीखते हुए
वे मानवता के उदास संगीत को शब्दों के छोटे-छोटे टुकड़ों में लपेटेंगे और उन्हें प्रार्थनाओं की तरह जीवन-वृक्ष पर टाँग देंगे
