अनुपम शर्मा की कविता – युद्ध की विभीषिका 

युद्ध के विरुद्ध युद्ध-20

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है अनुपम शर्मा की कविता – युद्ध की विभीषिका

अनुपम शर्मा नवोदित कवयित्री हैं। वह प्रतिबिम्ब मीडिया में पहली बार प्रकाशित हो रही हैं।  अनुपम जी का स्वागत है।- संपादक

 

कविता

युद्ध की विभीषिका

अनुपम शर्मा

 

वो बच्चे

जो अभी पल रहे हैं मां के गर्भ में

जिन्होंने अभी नहीं रखा कदम इस दुनिया में

अपनी मां के साथ डर के साए में

पल पल सहते हैं

युद्ध की विभिषिका

 

वो अंकुर

जो अभी दबे हैं मिट्टी के गर्भ में

जिन्हें नहीं मालूम खिलना है कौन सी ऋतु में

अनुकूल परिस्थितियों का करते इंतजार

पल पल सहते हैं

युद्ध की विभिषिका

 

वो खग

जो विचरते थे उन्मुक्त गगन में

जिनकी चहचहाहट सुबह की पहली कविता सी

वे कर चुके हैं पलायन

वापसी के इंतजार में

पल पल सहते हैं

युद्ध की विभिषिका

 

युद्ध की विभीषिका

केवल सीमाओं को ही नहीं उजाड़ती

यह उजाड़ती है

समय के गर्भ में पल रही हर संभावना को…