कविता
पीड़ा
ओमसिंह अशफ़ाक
वह, जो है—
अनकहा, अनदेखा, अनजाना
ज्ञानातीत, भावातीत, शब्दातीत
वही कुछ कहना चाहता हूँ
एक कविता में।
पर कहाँ हैं वे उपकरण,
वो सामर्थ्य वो शब्दकोश
खोल सके जो भेद-
भूत-भविष्य और वर्तमान के।
भेद सके पृथ्वी का केंद्र
चीर सके अंतरिक्ष का सीना
उघाड़ दे सब परतें ब्रह्मांड की—
छान डाले वेदांत का सार।
ऐसी दूरबीन जो देखती हो साफ-साफ-
सापेक्षवाद, विकासवाद
और प्रकृति के नियमों के भी परे का
समूचा दृश्य-
दृश्य जिसमें मूर्त हो उठें
सूर का वात्सल्य,
कबीर की साफगोई,
और मीरा का प्रेम !
प्रेम का दीवाना बन घूम आऊँ
ब्रह्मांड का चप्पा-चप्पा
सुनता हुआ अनहद नाद-
लाँघ जाऊँ सभी नदी-नाले,
पहाड़-झंकाड़-
बैठना चाहता हूँ मैं
शाश्वत-प्रेम की गोद में
जहाँ ताप-संताप कुछ न हो
पुण्य और पाप ।
कृपा करो महाकवि मेरे-
प्रशस्त करो मार्ग प्रवेश का
उस अमर-प्रेम की बगिया में
वक्त, फिलवक्त बेरहम है बड़ा
वक़्फा लंबा है, समय है थोड़ा
घट रहा पल-पल-
घोड़ा नहीं चाहता मैं अश्वमेध का।
इच्छा नहीं है कहीं
चक्रवर्ती साम्राज्य की-
बस चाहता हूँ मैं ओज,
लय और शब्द-
ऐसी सोच घुप जाए जो सीधे तीर सी—
बेरहम वक्त के सीने में…
यही है वो..
हाँ यही है काल का विषधर
डसे जा रहा था जो अनवरत
अंत अब इसका निश्चित है !
मुक्त सन्निकट है अब
बेशक, बहुत विकट है
स्थिति अभी भी !
(जुलाई 2000)

बहुत खूब सर।
I think at present Om Singh Ashfaq is one of the leading and original poets. Without any flowery language, he including Jaipal ji and Rajesh Bharti is writing well and in a very simple and easy language.
बहुत उम्दा कविता