दयाल जास्ट की दो कविताएं
1
आज पहली बार
आज वो पहली बार खेत गई
सब काम समेटकर
हर रोज की तरह।
सो कर गई या नहीं
कुछ पता नहीं
लेकिन जा रही है
वह अकेले जा रही है
थोड़ी रोई सी लगती है।
फिक्र तो है उसे
लेकिन उम्मीद भी
मेहनत से
जिंदगी बदल सकती है
सब हासिल कर सकती है
उसे आशा है।
उसके सपने छोटे हो सकते हैं शायद
वह घर से निकल गई है
लगता है रुकने वाली नहीं है
हालातों से लड़ेगी
कामयाब होगी
वह पहली बार
निकली है घर से।
2
मंज़िल
उनके पास मंजिल नहीं है
वे भटक रहे हैं
क्या करें ,क्या ना करें
उनकी समझ से बाहर है सब-कुछ।
जिंदगी है, जीनी है
पेट के लिये कुछ करना है
पढ़े-लिखे हैं
कोशिश कर रहे हैं
उन राहों पर चल रहे हैं
मंजिल है जिधर
जाना है या नहीं जाना,क्या करें।
खोना-पाना
आना-जाना
कहाँ है ठिकाना
भाग्य या कर्म
क्या है हमारा कसूर
इसी उधेड़-बुन में लगे हैं वे
बेकार हैं या बेरोजगार
कुछ पता नहीं
क्या करें क्या ना करें
उनके पास अभी मंजिलें हैं
राहें हैं,हौसले हैं
वे कर सकते हैं अभी बहुत कुछ
पा सकते हैं मंजिल
