महमूद दरवेश की कविता लड़की / चीख़

युद्ध के विरुद्ध युद्ध – 7

युद्ध तो अपने आप में एक मसला है, वह मसलों का हल क्या देगा- (साहिर लुधियानवी)

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा।  इस कड़ी में हमने ओमसिंह अशफ़ाक, जयपाल, रबीन्द्रनाथ टैगोर, पाश की कविताएं प्रकाशित की हैं। आज प्रस्तुत है महमूद दरवेश की कविता लड़की / चीख़। संपादक

 

कविता

लड़की / चीख़

महमूद दरवेश

 

 

साहिल पर एक लड़की है और लड़की के माँ-बाप हैं

और माँ-बाप का एक घर है और घर में दो दरीचे व

एक मुहार है

और समंदर में एक जंगी जहाज़ है मौज-मस्ती करता

 

साहिल पर सरगश्ती करते हुओं का शिकार करता

चार पाँच सात

 ढेर हुए पड़े रेत पर

लड़की फिलहाल बची हुई किसी नज़र न आते

 

ग़ैबी हाथ की सरपरस्ती में

लिहाज़ा वो आवाज़ देती है: अब्बू ! अब्बू ! हमें घर

 

लौटना चाहिए, समंदर हम जैसों के लिए नहीं,

बाप कोई जवाब नहीं देता

 

पसरा पड़ा हुआ सूर्यास्त की जानिब

सरकती अपनी परछाईं पर

 

ख़ून-ख़ून खजूर के दरख़्त, बादल ख़ून-ख़ून!

लड़की की आवाज़ ऊँची और ऊँची होती साहिल से आगे तक आती हुई

 

रात में चीख़ उठती वो

आहंग में आहंग नहीं

 

लिहाज़ा एक न ख़त्म होने वाली चीख़ ताज़ा ख़बर में

जो क़त्तई नहीं रही ताज़ा ख़बर

 

जब दो दरीचों और एक मुहार वाले घर पर बम गिराने के लिए

हवाई जहाज़ लौटा।…