कविता
संविधान के हर सफ़े पर…
मंजुल भारद्वाज
वो एक घाव रोज़ दे जाता है
लोकतंत्र में भेड़ों का राजा
होने का सबूत दे जाता है!
सचेत जनता का वो
हर रोज़ लहू पी जाता है
विचार से डरने का
सबूत दे जाता है !
धर्म के पाखंड की भट्टी में
हिन्दू मुसलमान को भून कर
रोज खा जाता है
मनुष्य की खाल में
अपने भेड़िये होने का
सबूत दे जाता है!
विकार ग्रस्त तानाशाह
लोकतंत्र के एक एक स्तम्भ को गिरा
संविधान के हर सफ़े पर
भीड़तंत्र के मंसूबे
लिख जाता है!
