समाजवाद ही है दुनिया का कल्याणकारी और सुरक्षित भविष्य

समाजवाद ही है दुनिया का कल्याणकारी और सुरक्षित भविष्य

मुनेश त्यागी

अभी पिछले दिनों हमारे एक पाठक ने हम से गुजारिश की कि मैं एक कट्टर वामपंथ विरोधी द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब दूं। इसी क्रम में हम उन सवालों का और उन आरोपों का उत्तर देने की कोशिश करेंगे जो आरोप वामपंथियों पर लगाए जाते हैं।

पूंजीवादी समाज में शोषण है, लूट है, अन्याय है, भेदभाव है, झूठ कपट मक्कारी अंधविश्वास और धर्मांधता है।क्योंकि सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था के गठजोड़ में, सिर्फ हाथ जोड़ने से मांगने पर, मेहनतकश जनता को बिना संघर्ष के कुछ नहीं मिलेगा, इसीलिए वामपंथी संघर्ष का रास्ता अपनाने को मजबूर होते हैं। वामपंथ पूरे समाज में समता, समानता, न्याय, शांति और भाईचारा चाहता है, सबका कल्याण चाहता है, तमाम किस्म के शोषण, जुल्म, अन्याय, हिंसा, भेदभाव और तमाम तरह की गुलामियों और बेईमानियों का जड से खात्मा करना चाहता है। इसीलिए शोषक और लुटेरे पूंजीपति वर्ग को ऐसा लगता है कि वामपंथी केवल संघर्ष और संघर्ष चाहते हैं।

हमारे समाज में दो वर्ग हैं—-शोषक और शोषित, लुटेरा और मेहनतकश। दुनिया में वर्गों की उत्पत्ति के बाद से ही इनमें लगातार लड़ाई यानी संघर्ष जारी है, गरीबी की अमीरी से लड़ाई जारी है, लूट और हड़पने से न्याय की लड़ाई जारी है। वामपंथी अपने आप में किसी से लड़ना नहीं चाहते। जब वे अपने हक और अधिकारों की मांगों को लेकर मैदान में आते हैं तो उन्हें लड़ाकू बताया जाता है, वे लड़ते नहीं हैं, लड़ाई उन पर थोपी जाती है। वे तो बस उन पर थोपी हुई मनमानी लड़ाई का जवाब देते हैं।

अधिकांश वामपंथी लेखक, कवि, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर बेवकूफ नहीं हैं, वे ज्ञानी हैं, अपने अपने विषयों के सर्वज्ञ हैं। वे सब मिलकर पूंजीवादी शोषक व्यवस्था का खात्मा कर, उसके स्थान पर वैज्ञानिक समाजवादी जनवादी व्यवस्था कायम करना चाहते हैं। साम्यवादी और समाजवादी व्यवस्था अपने धुरविरोधी लोगों पर कानून के अनुसार प्रतिबंध लगाती हैं, उनसे कानून की लड़ाई लड़ती हैं, उन्हें किसी बिना मतलब के जेल में नहीं डाला जाता है, उनके आरोपों की गंभीरता को देखते हुए ही उन्हें कानून के अनुसार सजा दी जाती है।

कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने दुनिया को बरगलाया नहीं है बल्कि पूंजीवादी शोषणकारी लूट और हड़प/डकैती के भेद खोल डाले हैं और सर्वहारा क्रांति द्वारा लुटेरे समाज को बदलने का रास्ता बताया है और काल्पनिक समाजवाद के स्थान पर, वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था और किसानों मजदूरों की सरकार और सत्ता क़ायम करने की बात की है, इसी कारण दुनिया का पूंजीपति वर्ग, सामंती वर्ग, साम्प्रदायिक सोच और कट्टर पूंजीवादी प्रवृति की सोच के लोगों के गठजोड़ के लोग, मार्क्स को और वामपंथियों को सबसे ज्यादा गालियां देते हैं।

मजदूर द्वारा कमाए गए श्रम के मूल्य के अपहरण से पूंजीपति वर्ग के लोग, मजदूरों का शोषण करते हैं। लाभ उसका है जिसने उसे कमाया है यानी कमेरे वर्ग का, लुटेरे पूंजीपति वर्ग का नहीं, जिसने कोई काम नहीं किया। पूंजी सिर्फ लूट यानी अपहरण किए गए पैसों का हिस्सा है, कोई रिवार्ड या इनाम नहीं है। यह मजदूरों के श्रम के भुगतान का अपहरण है जो उसे भुगतान नहीं किया जाता है और मालिक उसे हड़प लेता है।

हकीकत देखिए,,,,बिना मजदूरों के कोई कारखाना या प्रतिष्ठान नहीं चल सकता, चाहे उसमें कितना ही धन-संपत्ति लगी हो। अगर मजदूरों में खोट है, वे हड़ताल करते हैं, बेईमान या निकम्मे हैं और वे अपने हकों की मांग करते हुए संघर्ष करते हैं ,तो पूंजीपति वर्ग चला ले अपना कारखाना और तमाम तरह के उद्योग और दूसरे प्रतिष्ठान।

क्योंकि कोई भी उद्योग, कारखाने और संस्थान मजदूरों के काम के बिना नहीं चलाये जा सकते, इसलिए मजदूरों के कानूनी हक और अधिकार उन्हें देने पड़ेंगे। लाभ या मुनाफा किसी साहस का परिणाम नहीं है, यह मजदूरों की मेहनत के फल की लूट और हड़प है।

समाजवादी विचारधारा से ही हमारा समाज, देश और दुनिया फल फूल सकते हैं। तीन सौ साल की पूंजीवादी व्यवस्था के पास गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, हिंसा, अन्याय और शोषण का कोई जवाब या समाधान नहीं है, वह एक संकटग्रस्त मानव विरोधी, क्रूर, निर्दयी और शोषणकारी व्यवस्था है। यह संकट उसे घेरे रहता है। पिछले ढाई सौ 300 वर्ष के अनुभव यही बता रहे हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय, व्यापार और लाभ कमाने के साधन नहीं हैं, इन्हें मुफ्त, अनिवार्य और आधुनिक होना ही चाहिए और यह सारी मेहनतकश जनता का कानूनी हक हैं, उसके बुनियादी हक और अधिकार हैं। शादियों और त्योहारों पर खर्च की एक सीमा होनी चाहिए। दिखावे और फिजूलखर्ची पर प्रभावी रोक लगनी चाहिए, हम फिजूलखर्ची और दिखावे के खिलाफ हैं, जिनके पास लूट का ज्यादा माल है, वही सीमा से ज्यादा खर्च करेगा और समाज में एक बुरा उदाहरण पेश करेगा।

अंबानी और अडानी के पास इतनी संपत्ति क्यों है? क्योंकि उन्होंने मजदूरों के श्रम की कमाई को हड़प लिया है, उनका पर्याप्त, जरूरी और सही भुगतान नहीं किया है। उसने अतिरिक्त मूल्यों के सिद्धांत के अनुसार, उस पैसे को हड़प लिया है और मजदूरों को भुगतान नहीं करते हैं जिसके कारण वह दिन प्रतिदिन मालामाल होते जा रहे हैं। यह बात पूरे पूंजीपति वर्ग पर दुनिया भर के पूंजिपतियों पर लागू होती है।

पूरी दुनिया में पूंजीवादी नीतियों के पूंजीपतियों के हित में होने के कारण, पूंजी का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है, जो पैसा मजदूरों में बांटा जाना चाहिए, वह हड़पने की नीतियों के कारण, पूंजीपति वर्ग के पास जमा होता रहता है और इस प्रकार वह लगातार धनाढ्य बनता जाता है। पूंजीवाद द्वारा फैलाई गई गरीबी और शोषण ने दुनिया का चेहरा बिगाड़ दिया है।

यह मुरझाया हुआ चेहरा वैज्ञानिक समाजवादी समाज और किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार में ही खिल सकता है, जहां सबको रोटी, रोजी, घर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार की गारंटी होगी और ये सबको कानूनी रूप से अनिवार्य तौर पर मौहिया कराए जाएंगे। समाजवादी समाज में सबका काम करना अनिवार्य होगा, सब लोग काम करेंगे, कोई निट्ठल्ला या शोषक नही होगा।

हम अमेरिका जैसा नहीं बल्कि सब का ख्याल रखने वाले समाजवादी चीन, क्यूबा और दूसरे तमाम समाजवादी मुल्कों जैसा होना चाहते हैं। अमेरिका और पूरी दुनिया का लुटेरे पूंजीवादी साम्राज्यवादी शोषक, जनता के जनवाद के, किसानों मजदूरों की सरकार और सत्ता, समाजवादी समाज के और आजादी के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

वे दुनिया में समाजवादी विचारधारा और जनता के जनवाद का गला घोट रहे हैं, पूरी दुनिया में समाजवादी और प्रगतिशील देशों में हस्तक्षेप कर तख्तापलट करते हैं और उन देशों में अपने पिट्ठू बैठाते हैं। पूंजीवादी समाज में समानता और भाईचारा नहीं हो सकती क्योंकि यह मजदूरों और किसानों के श्रम की लूट पर आधारित समाज है और भाईचारे और न्याय को निगल जाता है, उसे हड़प जाता है।

दुनिया में पूंजीपति वर्ग का वर्चस्व है, उन्हीं का बोलबाला है वे पूरी दुनिया में अपनी लूट के साम्राज्य को कायम रखना चाहते हैं, जबकि वैज्ञानिक समाजवादी सोच के लोग इस लूटेरी व्यवस्था को खत्म करना चाहते हैं और इसके स्थान पर वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था किसानों मजदूरों और मेहनतकशों का राज्य स्थापित करना चाहते हैं। दुनिया भर का पूंजीपति वर्ग, किसानों मजदूरों के राज्य, सरकार और समाजवादी व्यवस्था को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते, इसीलिए पूंजीवाद और समाजवाद में लड़ाई और संघर्ष विद्यमान हैं।

दुनिया भर में पूंजीवादी व्यवस्था समाजवादी मुल्कों को सही तरह से काम नहीं करने देना चाहती, वह समाजवादी व्यवस्था को फलने फूलने से रोकती हैं, समाजवादी मुल्कों को आजादी से नहीं रहने देना चाहती, क्यूबा, वेनेजुएला चीन नोर्थ कोरिया और पूरे समाजवादी मुल्क, इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। समाजवादी देशों में रोजी-रोटी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की मुकम्मल व्यवस्था होती है, महंगाई, भ्रष्टाचार और बेईमानी नहीं होती, अतः पूंजीवाद का विकल्प केवल और केवल वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था ही हो सकती है।

दुनिया में अमन-चैन कायम रखने के लिए, पूंजीवादी दुनिया का सर्वविनाश सबसे ज्यादा जरूरी है और इसके स्थान पर किसानों मजदूरों और मेहनतकशों का राज्य और सरकार और वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था, सोच और मानसिकता में ही देश दुनिया का उदय और सबका विकास संभव है।

अब हमारा काम है कि जनमुक्ति के कार्यक्रम यानी रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सबका विकास, को जनता के विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा बनाएं और उसे उसके बीच ले जाएं और इस कार्यक्रम के चारों तरफ उसको लामबंद करें और उसको क्रांति के रास्ते पर ले जाएं। वर्तमान में यही है हमारा असली काम। यही हमारे देश, दुनिया और समाज को वैश्विक प्रभुत्वकारीऔर शोषणकारी मुनाफाखोर प्रभुत्ववादी लूट, झूठ, हिंसा, असत्य और युद्ध से बचा सकता है। आइए इस क्रांतिकारी, पवित्र और पुनीत कार्य को पूरा करने के लिए अभी से इस काम में जुटें।

समाजवाद के अलावा दुनिया का भविष्य बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।

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