कोटा/राजस्थान से अनियतकालीन पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ के संपादक श्री ‘महेन्द्र नेह’ की कवि ‘जयपाल’ के कविता संग्रह– ‘कविता भी तुम्हें देखती है ‘ पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी
“कविता भी तुम्हें देखती हैं”
यथार्थ के आरपार देखतीं और पाठकों से संवाद करतीं कवि जयपाल की कविताएं
पिछले साल प्रकाशित हुए कवि जयपाल के कविता संग्रह “बंद दरवाज़े” की कविताएं मुझे लीक से हट कर लगीं थीं और मैंने उस संग्रह की कुछ कविताएं मित्रों के साथ साझा की थीं। मैंने उनसे संग्रह की 10 प्रतियां मंगवा कर मित्रों और साथियों तक भी पहुंचाई थीं।
उन कविताओं की ऊष्मा कम नहीं हुई थी कि हाल ही में उनका ताज़ा कविता संग्रह “कविता तुम्हें देखती है” भी छप कर मेरे पास पहुंच गया।
किताब के पृष्ठ खोलते ही मुझे यह अहसास हो गया कि इस बार न केवल संग्रह के आकार में अपितु गुणधर्मिता में भी बढ़ोत्तरी हुई है। बल्कि कहना चाहिए उनकी मारक क्षमता और अंदरुनी असर भी हमें अपनी ओर खींचता है। वर्तमान दौर में हम विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़े हो कर हवाओं में बमों, मिसाइलों,बारूद के धमाकों और ग़ुबारों के बीच सांस ले रहे हैं। संग्रह में युद्ध को ले कर कई कविताएं हैं, उनमें से एक है _ ” युद्ध की घोषणा”:
” बच्चे भूल गए थे बाहर जाकर खेलना/समय पर पहुंच जाना स्कूल/मांएं भूल गई थीं बच्चों के लिए खिलौने खरीदना/भाई बहिन भूल गए थे आपस में झगड़ना/पिता भूल गए थे काम पर जाना/शहर भूल गया था/अपनी ही सड़कों और चौराहों के नाम/एक शहर गर्क हो रहा था/ युद्ध से पहले.
संग्रह में धर्म के नाम पर हमारे देश और दुनिया में बहाए जा रहे बेगुनाहों के लहू को देख कर कवि बेहद क्षुब्ध और बेचैन है,”हंसी हंसी में ” शीर्षक कविता में वह लिखता है:
” हिंदू मारा गया/मुस्लिम हंसता रहा/मुस्लिम मारा गया/हिंदू हंसता रहा/ हंसी हंसी में दोनों मारे गए.” उन्हें बहुत दुख होता है जब एक पड़ौसी गर्व करते हुए अपने पड़ोसी की हत्या कर देता है:
“अच्छी बात नहीं है/अपने पड़ोसी को मार देना/मैं अपने धर्म ओर जाति पर/गर्व की ऐसी अनुभूति कार रहा था/मुझे आज से पहले कभी महसूस नहीं हुई/गर्व करते करते/एक दिन मेरा पड़ोसी मेरे ही हाथों मारा गया/भीड़ में उसका घर जला दिया/शर्म नहीं आई? मां ने सवाल किया. शर्म किस बात की! मैंने गर्व से कहा.”
कवि जयपाल की चिंता उन करोड़ों देशवासियों की चिंता से एकाकार होती है, जिनके लिए पेट में सुलगती आग आज भी बुझाए जाने का रास्ता ढूंढती है:
” चूल्हे में सुलगती आग/ आग पर रखे खाली तवा/पतीले में उबलता पानी/सामने पड़ी खाली परात/बच्चे मां को देखते हैं/ मां बच्चों को/ इस तरह भी भरता है पेट ” इस कविता से गुजरते हुई एक सिहरन पैदा होती है और नागार्जुन की कविता _” धुंआ उठा आंगन के अंदर बहुत दिनों के बाद ” और प्रेमचंद की कहानी” कफ़न ” का परिवेश बरबस ही मानस में उमड़ने घुमड़ने लगता है.
कवि को महसूस होता है कि संस्कृति और धर्म जो एक जमाने में बहुत पवित्र शब्द लगते थे आज अपने अर्थ खो चुके हैं और अब आम इंसान को उनका नाम सुन कर भय लगने लगता है:
” संस्कृति निकल पड़ी है/ भेड़िए की खाल ओढ़ कर/सिकंदर के घोड़े पर सवार हो कर/ निकला है धर्म/संविधान को घेर लिया गया है/इंसाफ कटघरे में खड़ा है/इंसानियत को होना पड़ा है भूमिगत.” इन कविताओं में अखंड राष्ट्र के नारे के पीछे छुपी उन दुरभि संधियों का भी खुलासा किया गया है जो राष्ट्र की संपदा को विदेशी पूंजी के हाथों में बेचने की राष्ट्र विरोधी, मनुष्य विरोधी गतिविधियों में सक्रिय हैं:
” अखंड राष्ट्र, आर्यावर्त और रामराज्य की/ भारी भरकम गठरियां/ हमारे सिरों पर लाद दी गई हैं/खंड खंड हो कर/ बिखर जाना है/अखंड राष्ट्र के लिए.”
इन कविताओं में केवल वस्तु स्थिति का वर्णन नहीं है. वस्तु स्थिति का मुकाबला करने और इस कैदखाने को तोड़ देने की तजवीजें भी हैं, जिन्हें मौजूदा सत्ता _ व्यवस्था ने हमारे चारों ओर छल और बल पूर्वक निर्मित कर दिया है. संग्रह में एक कविता का शीर्षक है _ ,’ आ रही हैं बेटियां” यह कविता राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में, जेल में बंद डॉ . नरवाल की बेटी नताशा के नाम है, जिसे अंतिम समय में अपने पिता से भी मिलने की अनुमति नहीं दी गई. नताशा दिल्ली कॉलेज की छात्राओं के एक संगठन” पिंजरा तोड़ ” की सदस्य थी, जिन्होंने इस मनुष्य भक्षी दासता के किलों को ध्वस्त करने का अहद लिया है:
“नताशा जैसी बेटियां/ तोड़ रही हैं मठ और गढ़ सब/ उठा रही है अभिव्यक्ति के सारे खतरे/ वे देख रही हैं ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है ?” इस तरह हम देखते हैं कि ये कविताएं एक और मुक्तिबोध के अंधेरे में से निकल कर मठ और गढ़ तोड़ने की दिशा में उन्मुख हैं तो दूसरी ओर शहीद अशफाकुल्ला और भगत सिंह की राह पर बढ़ने की क्रांतिकारी दिशा की ओर भी संकेत करती हैं।
संग्रह में _नक़ाब, ईश्वर और खुदा के नाम, डर लगता है, लाशें, कामरेड का संदूक, धृतराष्ट्र,ज़िंदगी का सूरज जैसी कविताएं हैं तो दादी मां, बहनें,औरत और पतंग जैसी कुछ कविताएं भी हैं जो हमें संवेदना के आत्मिक धरातलों से भी जोड़ती हैं। प्रखर मार्क्सवादी समीक्षक आनंद प्रकाश ने इन कविताओं को”सामाजिक _राजनीतिक बदलाव की संभावना तलाशती कविताओं की संज्ञा देते हुए कहा है कि ” संकलन में शामिल जयपाल की हर कविता अपने आप में मुकम्मल है.,,… किसान आंदोलन पर लिखी गई एक कविता पर अपनी टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं ” कवि अपने तर्क पर जोर देते हुए किसान आंदोलन की तपिश को शहीद ए आजम भगत सिंह के प्रतीक से बखूबी जोड़ता है और इस तरह वह कविता की अर्थवत्ता में इज़ाफ़ा करता है.”
डॉ. संदीप मील ने संग्रह की भूमिका में नोट किया है _” ईश्वरीय सत्ता के पाखंड और उसके कारण पैदा होने वाली समस्याओं को इन कविताओं में हार जगह देखा जा सकता है. एक तरह से ये कविताएं वैज्ञानिक नज़रिए का विस्तार करने वाली हैं। कुल मिला कर इस संग्रह की कविताएं हमारे समय का सच है जो साफ साफ कहा गया है ‘
15अप्रैल 1962 को दुराना _अंबाला में जन्मे कवि जयपाल एक अध्यापक रहे हैं और हरियाणा _पंजाब शिक्षा विभाग से सेवा निवृत्त हो कर लेखन कार्य में जुटे हैं, देस हरियाणा पत्रिका के सह संपादक हैं और जलेस , हरियाणा के अध्यक्ष होने की जिम्मेदारी भी उठा रहे हैं।
