विमल कुमार की कविता- मुबारक हो

कविता

मुबारक हो

विमल कुमार

 

तुम्हारा संसार

तुमको ही मुबारक हो

मुबारक हो

आत्म प्रदर्शन

मुबारक हो

तुम्हारा अहंकार

तुम्हारा छद्म

तुम्हारा पाखंड

तुम्हारा फोटो सेशन

नहीं चाहिए तुम्हारा संसार

जिसमें करनी पड़े

किसी की खुशामद

जिसमें हिलानी पड़े दूम

जिसमें लेन देन हो शामिल

जिसमें नकली मुस्कान हो

मुझे मेरे ही संसार में रहने दो

रह लूंगा मैँ

झरते पत्तों के साथ

शाम की उदासी के साथ

चीखती हुई रातों के साथ

मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा चाँद

रह लूंगा

चलते हुए जर्जर पुल पर अकेले

क्यों रहूं झूठ बोलकर समंदर के किनारे

क्यों करूँ तुम्हारी तरह छल मैं

क्यों डंस लूँ मैँ बिच्छु की तरह किसी को

मुझे रहने दो पत्थरों और रेतों के साथ

तुम रहो गुलाब के साथ अपने संसार में

मैँ रह लूंगा सीलन और काई के साथ

अपनी नैतिकता और स्वाभिमान को बचाये

प्यार करते हुए

सबको हाथ हिलाए