मन्नू भंडारी ने सिखाया साहित्य
रत्ना भदौरिया
मन्नू भंडारी—एक ऐसा नाम, जिसे साहित्य पढ़ने वाला हर व्यक्ति और हिंदी का हर विद्यार्थी जानता है। लेकिन मैं हिंदी की छात्रा नहीं रही, इसलिए उनसे परिचित नहीं थी।
उत्तर प्रदेश के स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति ऐसी नहीं रही कि बच्चों में पाठ्यपुस्तकों से आगे पढ़ने की आदत विकसित हो सके। कॉलेजों में पुस्तकालय थे भी तो अक्सर बंद मिलते, और खुलते भी तो विषय से इतर किताबों तक पहुँच सहज नहीं थी। सबसे विडंबनापूर्ण बात यह थी कि पढ़ाने वाले अध्यापक भी अधिकांशतः पाठ्यक्रम पूरा कराने और बच्चों से उसे रटवाने में ही वर्ष गुजार देते। पाठ्यक्रम के बाहर कुछ पढ़ने की प्रेरणा न बच्चों को मिलती, न उसके लिए कोई वातावरण बनता।
मैं भी उन्हीं बच्चों में थी। विषय की किताबें पढ़ती गई, कक्षाएँ पार करती गई और पढ़ाई पूरी हो गई। साहित्य से मेरा कोई आत्मीय परिचय नहीं बन पाया।
फिर नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आई और एक अस्पताल में मन्नू भंडारी से मिलने का अवसर मिला। उनके साथ काम करते हुए धीरे-धीरे जाना कि वे केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण हस्ती हैं। हमारे बीच का नर्स और मरीज का संबंध कब आत्मीयता की उस दीवार को पार कर गया, पता ही नहीं चला। वह रिश्ता माँ-बेटी में बदल गया। मैं उन्हें हमेशा ‘मम्मी’ कहती और वे मुझे ‘गुड़िया बिटिया’।
उनकी भूलने की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ रही थी और कलम भी जैसे उनका साथ छोड़ने लगी थी। मैं उन्हें कोई कहानी पढ़कर सुनाती। फिर उस पर हमारी लंबी चर्चा होती। इन्हीं चर्चाओं के बीच मुझे किताबें पढ़ने का चस्का लगा और धीरे-धीरे मैं साहित्य की ओर मुड़ती चली गई।
उनकी स्मृति के धुंधलाने और लेखन के रुक जाने का दुख मुझे भीतर तक छूता था। इसलिए मैं हर दिन उन्हें कोई विषय देती। वे उसे लिखने की कोशिश करतीं, लेकिन साथ ही बार-बार कहतीं—“तू लिख, तू लिख सकती है।”
उनके ये शब्द मेरे भीतर कहीं गहरे उतर गए। शायद उन्होंने स्वयं भी नहीं जाना होगा कि उनके कहे दोहराए जाते ये छोटे-से वाक्य मेरे भीतर लेखन की एक राह खोल रहे थे। मैं लिखने की ओर खिंचती चली गई।
मेरी पहली लघुकथा ‘संडास’ जून 2021 के ‘हंस’ में प्रकाशित हुई। उसके बाद आड़ा-तिरछा ही सही, लेखन का सिलसिला चल पड़ा।
लेकिन नियति को शायद यही मंजूर था। नवंबर में मन्नू जी ने अपनी कलम हमेशा के लिए थमा दीं और चली गईं।
मेरे लिए उनका जाना केवल एक साहित्यकार का जाना नहीं था। वह उस स्त्री का जाना था, जिसने मुझे किताबों से मिलाया, फिर शब्दों से, और अंततः मेरे भीतर छिपे उस लेखक से, जिसे मैं स्वयं नहीं पहचानती थी।
