जसवीर त्यागी की पांच कविताएं

जसवीर त्यागी की पांच कविताएं

पेड़

घर में एक पुराना पेड़ है
जिसे माँ ने लगाया था कभी
जब ब्याहकर आयी थी नये घर में

माँ को संसार से गये सालों हो गये हैं
आज भी हरा-भरा है पेड़
नयी आँखों में
बदरंग दिखता है पुराना पेड़

घर में चर्चा है जोरों पर आजकल
पेड़ कट जाये तो
चार दुकानें निकल आयेंगी आराम से

फालतू के परिंदे आकर
शोर-शराबा करते हैं सुबह-शाम
कुछेक ने तो अपने
घोसलें भी बना लिए हैं

जब तक रहेगा पेड़
पंछी आकर
घर की शांति भंग करते रहेंगे

दुकानें होंगी तो
नये-नये ग्राहक आया करेंगे
चकाचौंध से सराबोर होगा घर
चहलपहल की चाँदनी
चमकेगी अगल-बगल

माँ अब कौन-सा दुनिया में आने वाली है
जो आकर पूछेगी
कहाँ है मेरा लगाया हुआ पेड़?

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रूठना

नील नभ के कोने में
एक शुभ्र मेघ मौन अकेला है

दूर-दूर तक
अगल-बगल भी कुछ नहीं

लगता है माँ से रूठकर कोई बालक
घर के किसी एकांत कोने में बैठा है।

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काल

कितनी शीघ्रता से
करवट बदलता है काल

पलक झपकते ही
बगल खड़ा ‘है’

‘था’ रूप में
दूर जाता हुआ दिखता है।

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नये सौंदर्य-साधक

मनीप्लांट की बेल में
पीला पड़ गया एक पत्ता
हरे नये चिकने पत्तों के बीच
दूर से ही बदरंग लगता था पीला-पात

सौंदर्य-साधकों को
आँख की किरकिरी की तरह चुभता था

फिर एक दिन
झटके से तोड़कर विलगा दिया उसे

मनीप्लांट में
अब चारों ओर नव-पल्लवित मोहक-मुस्कान थी

आगुन्तकों को भी
तीव्रता से लुभाती थी
मनीप्लांट की शाश्वती छटा

देखने वाले देखते थे
चारों ओर बिखरी सरसराती-सुंदरता

कोई जान नहीं सकता
डाल से बिछुड़े पीले पत्ते की पीड़ा।

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साधारण-असाधारण

गुड़हल के पौधे पर
लाल रंग के दो फूल खिले हैं
मन चाव की चाशनी में मग्न है

कितनी साधारण-सी बात है
किसी पौधे पर फूल का खिलना

कितनी असाधारण बात है
खिले फूल का
हमारी सोच की डाल पर बचा रहना।

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5 thoughts on “जसवीर त्यागी की पांच कविताएं”

  1. सहज, सरल, मानवीय संवेदनाओं से भरपूर, सूक्ष्म भावों से ओत प्रोत होती हैं आपकी कविताएँ।

    1. सादर नमस्कार, हार्दिक आभार
      बना रहे आपका सहयोगी-व्यवहार

  2. साधारण असाधारण गज़ब
    काल वाली तो दो बार पढ़ने पर समझ आई
    पर रूठना कविता सबसे उम्दा

  3. बहुत सुन्दर एवं भावप्रवण कविताएँ!

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