ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

फिर कौन बोलेगा?

 

आज हम बोले नहीं तो कल कौन बोलेगा!

ये बेड़िया गुलामी की हमारी कौन खोलेगा!

 

आजादी कभी किसी को भीख में मिलती नहीं,

लहू बराबर आजादी के कौन तौलेगा!

 

ये कसती हुई बेड़िया जब और कसी जाएंगीं,

उलझ चुकी उस गांठ को भला कौन खोलेगा!

 

सुभाष बोस वीर भगतसिंह अब ना लौट आएंगे,

फांसी के फंदे हमारे सोचो कौन खोलेगा!

 

हम-तुम-सब-मिल बोले नहीं तो फिर कौन बोलेगा,

मेहनतकशों का खून फिर तो गलियों में डोलेगा!

 

यूं जीना ठीक तो नहीं!

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घुट घुट के यूं जीना ठीक तो नहीं!

ये बेबसी के आंसू पीना ठीक तो नहीं।

 

बारिश में फिसल जाना मुमकिन तो है,

पर गिरकर नहीं संभलना ठीक तो नहीं!

 

कभी निजी स्वारथ भी जकड़ तो सकता है,

पर पकड़ से उसकी नहीं निकलना ठीक तो नहीं!

 

हक के लिए लड़ना नियामत ही तो है,

हक मांगना अपना कोई भीख तो नहीं!

 

सदियों लड़े हैं लोग,अपने हक के वास्ते

छीन लेना हक उनका संविधान की सीख तो नहीं!

 

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